27 जुलाई 2026
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करूर भगदड़: मद्रास हाई कोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति पर तमिलनाडु सरकार का आदेश रद्द किया

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करूर भगदड़: मद्रास हाई कोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति पर तमिलनाडु सरकार का आदेश रद्द किया

सारांश

मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै पीठ ने करूर भगदड़ पीड़ितों के परिजनों को दी गई अनुकंपा नियुक्तियाँ रद्द कर दीं। अदालत ने कहा — संवेदना संविधान से बड़ी नहीं हो सकती। अनुच्छेद 14 और 16 की गारंटियाँ किसी भी कार्यकारी आदेश से ऊपर हैं।

मुख्य बातें

मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै पीठ ने 27 जुलाई 2026 को तमिलनाडु सरकार का अनुकंपा नियुक्ति आदेश रद्द किया।
आदेश सितंबर 2025 की करूर भगदड़ में मृतकों के परिजनों को सरकारी नौकरी देने से संबंधित था।
पीठ ने माना कि यह निर्णय अनुच्छेद 14 (समानता) और अनुच्छेद 16 (समान अवसर) का उल्लंघन करता है।
अनुकंपा नियुक्ति की प्रतीक्षा कर रहे हजारों पात्र आवेदकों के अधिकारों की अनदेखी का हवाला दिया गया।
कार्तिकेयन और न्यायमूर्ति आर.
शक्तिवेल की पीठ ने कहा कि अनुच्छेद 162 के तहत कार्यकारी शक्तियाँ असीमित नहीं हैं।
तमिलनाडु सरकार के पास अब सर्वोच्च न्यायालय में अपील का विकल्प उपलब्ध है।

मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै पीठ ने 27 जुलाई 2026 को तमिलनाडु सरकार के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत सितंबर 2025 में हुई करूर भगदड़ में मारे गए लोगों के परिजनों को अनुकंपा के आधार पर सरकारी नौकरी दी गई थी। पीठ ने स्पष्ट किया कि यह निर्णय संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 16 के तहत प्रदत्त समानता और सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन करता है।

मुख्य घटनाक्रम

न्यायमूर्ति सी.वी. कार्तिकेयन और न्यायमूर्ति आर. शक्तिवेल की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि अनुकंपा नियुक्तियाँ केवल उस स्थिति के लिए बनाई गई हैं जब किसी सरकारी कर्मचारी की सेवाकाल के दौरान मृत्यु होने से उसके परिवार पर तत्काल आर्थिक संकट आ जाए। इन्हें किसी सार्वजनिक त्रासदी के बाद सामान्य राहत उपाय के रूप में नहीं बरता जा सकता।

पीठ ने यह भी रेखांकित किया कि संविधान के अनुच्छेद 162 के अंतर्गत राज्य की कार्यकारी शक्तियाँ असीमित नहीं हैं और उन्हें संवैधानिक सीमाओं के भीतर ही संचालित होना चाहिए।

अदालत की मुख्य टिप्पणियाँ

न्यायालय ने कहा कि सरकार के इस निर्णय से विभिन्न सरकारी विभागों में अनुकंपा नियुक्ति की प्रतीक्षा कर रहे हजारों पात्र आवेदकों के अधिकारों की अनदेखी हुई है। भगदड़ पीड़ितों के परिजनों को इस तरह नियुक्ति देना उन्हें नीतिगत ढाँचे के तहत विचाराधीन अन्य आवेदकों से अनुचित रूप से आगे रखना होगा।

पीठ ने तमिलनाडु सरकार के इस तर्क को भी खारिज किया कि ये नियुक्तियाँ उसकी प्रशासनिक शक्तियों के अंतर्गत की गई थीं। अदालत ने कहा, 'यदि कार्यपालिका को अनियंत्रित छोड़ दिया जाए और उसे मनमानी करने की छूट दे दी जाए, तो अराजकता फैल जाएगी।'

संवैधानिक आधार

न्यायाधीशों ने माना कि अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता) और अनुच्छेद 16 (सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर) की संवैधानिक गारंटियाँ प्रशासनिक आदेशों के माध्यम से कमजोर नहीं की जा सकतीं। पीठ ने यह स्वीकार करते हुए कि राज्य को त्रासदी और शोकसंतप्त परिवारों की पीड़ा की चिंता है, स्पष्ट किया कि संवैधानिक सुरक्षा उपाय कार्यकारी निर्णयों पर सर्वोपरि रहते हैं।

पृष्ठभूमि: करूर भगदड़

यह मामला सितंबर 2025 में करूर में हुई उस भगदड़ से जुड़ा है जिसमें कई लोगों की जान गई थी। त्रासदी के बाद तमिलनाडु सरकार ने मृतकों के परिजनों को सरकारी नौकरी देने का आदेश जारी किया था, जिसे बाद में न्यायालय में चुनौती दी गई। यह ऐसे समय में आया है जब देशभर में अनुकंपा नियुक्ति नीतियों को लेकर विभिन्न उच्च न्यायालयों में बहस जारी है।

आगे क्या होगा

न्यायालय के इस फैसले के बाद तमिलनाडु सरकार के पास सर्वोच्च न्यायालय में अपील का विकल्प खुला है। वहीं, भगदड़ पीड़ितों के परिजनों को अब वैकल्पिक राहत के लिए अन्य कानूनी या प्रशासनिक रास्ते तलाशने होंगे। यह फैसला राज्य सरकारों के लिए एक महत्त्वपूर्ण मिसाल स्थापित करता है कि आपदा राहत के नाम पर संवैधानिक मानदंडों से विचलन स्वीकार्य नहीं होगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

न कि सार्वजनिक त्रासदियों के पीड़ितों के लिए — और इस अंतर को अदालत ने बिल्कुल सही रेखांकित किया है। साथ ही यह फैसला उन हजारों आवेदकों की आवाज़ भी है जो वर्षों से वैध दावों के साथ प्रतीक्षा सूची में हैं। असली सवाल यह है कि तमिलनाडु सरकार अब भगदड़ पीड़ितों के परिजनों को वैध संवैधानिक दायरे में रहकर किस प्रकार की राहत दे सकती है।
RashtraPress
27 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मद्रास हाई कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार का अनुकंपा नियुक्ति आदेश क्यों रद्द किया?
मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै पीठ ने यह आदेश इसलिए रद्द किया क्योंकि यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत सार्वजनिक रोजगार में समानता और समान अवसर की गारंटियों का उल्लंघन करता था। अदालत ने कहा कि अनुकंपा नियुक्तियाँ केवल सेवाकाल में मृत सरकारी कर्मचारियों के परिवारों के लिए होती हैं, न कि सार्वजनिक त्रासदियों के पीड़ितों के लिए।
करूर भगदड़ क्या थी और यह मामला कब से चल रहा था?
करूर भगदड़ सितंबर 2025 में तमिलनाडु के करूर में हुई थी, जिसमें कई लोगों की जान गई थी। इसके बाद तमिलनाडु सरकार ने मृतकों के परिजनों को अनुकंपा के आधार पर सरकारी नौकरी देने का आदेश जारी किया, जिसे न्यायालय में चुनौती दी गई और 27 जुलाई 2026 को मदुरै पीठ ने इसे रद्द कर दिया।
अनुकंपा नियुक्ति किसे मिल सकती है और किसे नहीं?
अनुकंपा नियुक्ति का प्रावधान उस स्थिति के लिए है जब किसी सरकारी कर्मचारी की सेवाकाल के दौरान मृत्यु हो जाए और उसके परिवार पर तत्काल आर्थिक संकट आ जाए। मद्रास हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इसे सार्वजनिक त्रासदी में मृत आम नागरिकों के परिजनों पर लागू नहीं किया जा सकता।
इस फैसले का उन लोगों पर क्या असर होगा जिन्हें पहले ही नियुक्ति मिल चुकी थी?
अदालत ने सरकार के आदेश को रद्द कर दिया है, जिससे उन नियुक्तियों की कानूनी वैधता समाप्त हो जाती है। भगदड़ पीड़ितों के परिजनों को अब वैकल्पिक राहत के लिए अन्य कानूनी या प्रशासनिक रास्ते तलाशने होंगे, जबकि तमिलनाडु सरकार के पास सर्वोच्च न्यायालय में अपील का विकल्प है।
क्या तमिलनाडु सरकार इस फैसले को चुनौती दे सकती है?
हाँ, तमिलनाडु सरकार मद्रास हाई कोर्ट के इस फैसले के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपील कर सकती है। हालाँकि, अदालत ने संवैधानिक आधार पर बहुत स्पष्ट टिप्पणियाँ की हैं, जो उच्चतम न्यायालय में भी सरकार की स्थिति को चुनौतीपूर्ण बना सकती हैं।
राष्ट्र प्रेस
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