तमिलनाडु में मुस्लिम आरक्षण 3.5% से 5% करने की मांग पर भाजपा का कड़ा विरोध, IUML ने CM को सौंपा प्रस्ताव
सारांश
मुख्य बातें
तमिलनाडु में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) द्वारा पिछड़ा वर्ग (बीसी) कोटे के भीतर मुस्लिम आरक्षण को 3.5% से बढ़ाकर 5% करने की मांग ने राज्य की राजनीति में नया विवाद खड़ा कर दिया है। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष नैनार नागेंद्रन ने 15 जून 2026 को इस प्रस्ताव का कड़ा विरोध करते हुए राज्य सरकार से इसे अस्वीकार करने की अपील की। वहीं, अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री एवं IUML नेता ए.एम. शाहजहां ने पुष्टि की कि उनकी पार्टी ने लगभग 10 दिन पहले मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के समक्ष यह मांग औपचारिक रूप से रखी थी।
मुख्य घटनाक्रम
IUML नेता ए.एम. शाहजहां ने पत्रकारों से बातचीत में बताया कि उनकी पार्टी ने मुख्यमंत्री को एक औपचारिक प्रस्ताव सौंपा है, जिसमें शिक्षा संस्थानों और सरकारी सेवाओं में मुस्लिम समुदाय की भागीदारी बढ़ाने के लिए आरक्षण में वृद्धि की माँग की गई है। शाहजहां के अनुसार, मुख्यमंत्री ने आश्वासन दिया है कि प्रस्ताव पर विचार किया जाएगा और आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।
शाहजहां ने कहा, 'हमने मुख्यमंत्री को अपना प्रस्ताव सौंप दिया है। उन्होंने आश्वासन दिया है कि इस पर विचार किया जाएगा और आवश्यक कार्रवाई की जाएगी। हमें विश्वास है कि आने वाले दिनों में मुस्लिम आरक्षण बढ़ाया जाएगा।'
भाजपा की प्रतिक्रिया
नैनार नागेंद्रन ने तर्क दिया कि मौजूदा 3.5% आरक्षण से भी पिछड़ा वर्ग के कुछ हिंदू समुदायों की हिस्सेदारी पहले से प्रभावित है। उनके अनुसार इसे 5% करने पर अन्य पिछड़े वर्गों के लिए उपलब्ध अवसर और सिकुड़ जाएंगे।
नागेंद्रन ने कहा, 'मुसलमानों को मौजूदा 3.5 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने से ही पिछड़ा वर्ग के कुछ हिंदू समुदायों की हिस्सेदारी प्रभावित हुई है। यदि इसे बढ़ाकर 5 प्रतिशत किया गया तो अन्य पिछड़े वर्गों के लिए उपलब्ध अवसर और कम हो जाएंगे।' उन्होंने राज्य सरकार से सभी पिछड़ा वर्ग समुदायों के हितों की रक्षा करते हुए इस प्रस्ताव को अस्वीकार करने की माँग की।
IUML का पक्ष
IUML का कहना है कि उच्च शिक्षा संस्थानों और सरकारी सेवाओं में मुस्लिम समुदाय की भागीदारी अभी भी अपेक्षाकृत कम है और आरक्षण में वृद्धि समान अवसर सुनिश्चित करने की दिशा में अनिवार्य कदम है। पार्टी के अनुसार यह मांग कई वर्षों से उठाई जा रही है और इसे समुदाय के व्यापक सामाजिक-आर्थिक उत्थान से जोड़कर देखा जाना चाहिए।
आम जनता और राजनीतिक दलों पर असर
यह विवाद ऐसे समय में उभरा है जब तमिलनाडु में पिछड़ा वर्ग आरक्षण की सीमाओं और उसके वितरण को लेकर पहले से ही संवेदनशीलता बनी हुई है। गौरतलब है कि सत्तारूढ़ गठबंधन की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है, लेकिन इस प्रस्ताव के सार्वजनिक होने के बाद विभिन्न सामाजिक संगठनों और राजनीतिक दलों के बीच व्यापक बहस तेज होने की संभावना है।
क्या होगा आगे
फिलहाल मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के कार्यालय की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। आलोचकों का कहना है कि बीसी कोटे के भीतर किसी एक समुदाय का हिस्सा बढ़ाना संवैधानिक और न्यायिक जाँच के दायरे में आ सकता है, विशेष रूप से सर्वोच्च न्यायालय के आरक्षण सीमा संबंधी निर्णयों के परिप्रेक्ष्य में। आने वाले हफ्तों में राज्य सरकार का रुख इस विवाद की दिशा तय करेगा।