पश्चिम बंगाल में शिक्षकों पर चुनाव रोक के फैसले का सीपीएम ने विरोध किया, कलकत्ता हाईकोर्ट जाने की चेतावनी
सारांश
मुख्य बातें
पश्चिम बंगाल में नए भर्ती होने वाले शिक्षकों को चुनाव लड़ने से रोकने के राज्य सरकार के फैसले के खिलाफ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानी सीपीएम ने कड़ा विरोध जताया है। पार्टी ने स्पष्ट कर दिया है कि जैसे ही यह प्रावधान पश्चिम बंगाल केंद्रीय स्कूल सेवा आयोग (WBSSC) के भर्ती नियमों में आधिकारिक रूप से शामिल होगा, वह इसे कलकत्ता उच्च न्यायालय में चुनौती देगी।
सीपीएम नेता का कानूनी चेतावनी
सीपीएम के पूर्व राज्यसभा सदस्य और वरिष्ठ अधिवक्ता विकास रंजन भट्टाचार्य ने इस फैसले को असंवैधानिक करार देते हुए कहा, "आम लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों को दबाना आसान नहीं होगा। ऐसा करने की किसी भी कोशिश का कानूनी रूप से विरोध किया जाएगा।" कोलकाता नगर निगम (KMC) के पूर्व मेयर रहे भट्टाचार्य ने आगे कहा, "इस फैसले को आधिकारिक तौर पर लागू होने दीजिए — मैं इस मामले को कलकत्ता उच्च न्यायालय में ले जाऊंगा।"
मुख्यमंत्री ने लिया था फैसला
गौरतलब है कि बुधवार, 29 अक्टूबर 2026 को राज्य कैबिनेट की बैठक में एक प्रस्ताव को मंजूरी दी गई, जिसके तहत WBSSC के भर्ती नियमों में नई शर्त जोड़ी जाएगी। इस शर्त के अनुसार, भविष्य में भर्ती होने वाले शिक्षक कोई भी चुनाव नहीं लड़ सकेंगे। हालांकि, स्रोत में उल्लिखित नाम 'मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी' के संदर्भ में यह स्पष्ट किया गया कि यह नियम उन मौजूदा शिक्षकों पर लागू नहीं होगा जो पहले से निर्वाचित जनप्रतिनिधि हैं।
सेवारत शिक्षकों ने भी जताई आपत्ति
सीपीएम के अलावा, सेवारत शिक्षकों के एक वर्ग ने भी इस फैसले पर सवाल उठाए हैं। उनका तर्क है कि मुख्यमंत्री का यह दावा कि यह कदम शिक्षा क्षेत्र को राजनीति से मुक्त करने के लिए उठाया गया है, एकतरफा और भ्रामक है।
एक सरकारी उच्च माध्यमिक विद्यालय के प्रधानाध्यापक ने कहा, "अगर मुख्यमंत्री इस क्षेत्र को राजनीति से मुक्त करने को लेकर गंभीर होते, तो उन्होंने शिक्षा से जुड़ी विभिन्न समितियों से राजनीतिक लोगों को पहले हटा दिया होता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।" उन्होंने यह भी कहा कि पश्चिम बंगाल में शिक्षा से जुड़े मौजूदा कानून शिक्षकों को सक्रिय राजनीति से नहीं रोकते — यदि उस कानून में बदलाव किए बिना यह फैसला लागू होता है, तो कानूनी दृष्टिकोण से बाधाएं अवश्यंभावी हैं।
संवैधानिक और कानूनी पेच
यह ऐसे समय में आया है जब पश्चिम बंगाल में शिक्षक भर्ती पहले से ही न्यायिक जांच के दायरे में रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) और चुनाव लड़ने के मौलिक अधिकार के संदर्भ में इस प्रकार का प्रतिबंध अदालत में टिकाऊ नहीं हो सकता। सीपीएम का कहना है कि यह न केवल भावी शिक्षकों के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन है, बल्कि राज्य सरकार की राजनीतिक मंशा पर भी सवाल उठाता है।
आगे क्या होगा
फिलहाल यह प्रावधान प्रस्ताव के स्तर पर है और WBSSC के भर्ती नियमों में औपचारिक अधिसूचना जारी होने का इंतजार है। जैसे ही अधिसूचना जारी होगी, विकास रंजन भट्टाचार्य के नेतृत्व में सीपीएम की कानूनी टीम इसे कलकत्ता उच्च न्यायालय में चुनौती देगी। यह मामला राज्य में शिक्षा और राजनीति के बीच के रिश्ते पर एक बड़ी बहस को जन्म दे सकता है।