दिल्ली हाईकोर्ट ने परवेश वर्मा, कपिल मिश्रा के खिलाफ भड़काऊ भाषण याचिकाएँ खारिज कीं
सारांश
मुख्य बातें
दिल्ली उच्च न्यायालय ने सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 को 2019 जामिया हिंसा और 2020 उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से जुड़े कथित भड़काऊ भाषण मामले में दिल्ली सरकार के मंत्री परवेश वर्मा और भारतीय जनता पार्टी (BJP) नेता कपिल मिश्रा के खिलाफ दाखिल याचिकाओं को खारिज कर दिया। इन याचिकाओं में उक्त नेताओं पर प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज कराने की माँग की गई थी।
मुख्य फैसला और पीठ
न्यायमूर्ति विवेक चौधरी और न्यायमूर्ति मनोज जैन की खंडपीठ ने यह निर्णय सुनाया। याचिकाकर्ता शेख मुजतबा फारूक ने BJP नेताओं कपिल मिश्रा, अनुराग ठाकुर, परवेश वर्मा और अभय वर्मा के भाषणों को उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों की वजह बताते हुए उनके खिलाफ कार्रवाई की माँग उठाई थी। आरोप है कि इन दंगों में 50 से अधिक लोगों की जान गई थी।
अन्य याचिकाओं की माँगें
खारिज की गई याचिकाओं में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) नेता वृंदा करात और जमीयत उलेमा-ए-हिंद की ओर से दायर याचिकाएँ भी शामिल थीं। इनमें दंगों में दिल्ली पुलिस की भूमिका की अदालत की निगरानी में विशेष जाँच दल (SIT) से जाँच कराने की माँग की गई थी। इसके अलावा, याचिकाकर्ताओं ने कुछ मामलों में जाँच को दिल्ली पुलिस से किसी बाहरी स्वतंत्र एजेंसी को सौंपने की भी अपील की थी।
जामिया मामला और पुलिस पर आरोप
दिसंबर 2019 में नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) विरोधी मार्च के दौरान जामिया मिलिया इस्लामिया परिसर में पुलिस पर कथित ज्यादती के आरोप लगाए गए थे। छात्रों का कहना था कि विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने उनके साथ मारपीट की। एक याचिकाकर्ता ने इस मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) का भी रुख किया था।
विपक्षी नेताओं के खिलाफ माँग भी खारिज
उधर, 'लॉयर्स वॉइस' की ओर से दाखिल एक अलग याचिका में कांग्रेस नेता राहुल गांधी, सोनिया गांधी, पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी सहित कई विपक्षी नेताओं और एक सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के खिलाफ मुकदमा चलाने की माँग की गई थी, जिसे भी अदालत ने खारिज कर दिया। यह ऐसे समय में आया है जब 2020 दिल्ली दंगों से जुड़े विभिन्न मामले वर्षों से न्यायिक प्रक्रिया में हैं।
आगे क्या होगा
हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद याचिकाकर्ताओं के पास सर्वोच्च न्यायालय में अपील का विकल्प उपलब्ध है। गौरतलब है कि यह मामला जामिया हिंसा और दिल्ली दंगों की न्यायिक समीक्षा से जुड़ी कई परतों में से एक है, और उच्च न्यायालय का यह निर्णय इन मामलों की दिशा पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है।