3 अगस्त 2026
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सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की अनुराग ठाकुर-प्रवेश वर्मा के खिलाफ पुनर्विचार याचिका, वृंदा करात को झटका

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सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की अनुराग ठाकुर-प्रवेश वर्मा के खिलाफ पुनर्विचार याचिका, वृंदा करात को झटका

सारांश

सर्वोच्च न्यायालय ने सीपीएम नेता वृंदा करात की पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी, जिसमें BJP सांसद अनुराग ठाकुर और दिल्ली मंत्री प्रवेश वर्मा के खिलाफ एफआईआर की माँग थी। जनवरी 2020 के सीएए-विरोधी प्रदर्शनों से जुड़े इस मामले में अब सभी न्यायिक विकल्प समाप्त हो गए हैं।

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय ने 3 अगस्त को वृंदा करात की पुनर्विचार याचिका खारिज की।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा — 29 अप्रैल के फैसले पर पुनर्विचार का कोई आधार नहीं।
मामला जनवरी 2020 के सीएए-विरोधी प्रदर्शनों के दौरान दिए गए भाषणों से जुड़ा था।
अप्रैल में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था — 2020 दिल्ली विधानसभा चुनाव प्रचार भाषणों पर कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता।
पुलिस, ट्रायल कोर्ट, दिल्ली उच्च न्यायालय और अब सर्वोच्च न्यायालय — सभी स्तरों पर एफआईआर की माँग अस्वीकार।

सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार, 3 अगस्त को भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सांसद अनुराग ठाकुर और दिल्ली सरकार में मंत्री प्रवेश वर्मा के खिलाफ दायर पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया। यह याचिका भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) — सीपीएम — की नेता वृंदा करात ने दाखिल की थी, जो जनवरी 2020 के सीएए-विरोधी प्रदर्शनों के दौरान दिए गए भाषणों को लेकर दोनों नेताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराना चाहती थीं।

क्या था पुनर्विचार याचिका का आधार

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि न्यायालय को 29 अप्रैल के अपने पूर्व फैसले पर पुनर्विचार का कोई उचित आधार नहीं मिला। वृंदा करात ने उसी अप्रैल के निर्णय की वैधता पर सवाल उठाते हुए यह पुनर्विचार याचिका दायर की थी।

गौरतलब है कि 29 अप्रैल को सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा था कि 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान दिए गए भाषणों के आधार पर अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा के खिलाफ कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता, और इसलिए एफआईआर दर्ज करने का आदेश देने से इनकार किया था।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद जनवरी 2020 में सीएए-विरोधी प्रदर्शनों के दौरान दिए गए उन भाषणों से जुड़ा है, जिन्हें लेकर वृंदा करात ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी। पुलिस द्वारा शिकायत पर कार्रवाई से इनकार के बाद उन्होंने ट्रायल कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। ट्रायल कोर्ट ने भी एफआईआर का निर्देश देने से यह कहते हुए मना कर दिया कि इसके लिए पूर्व मंजूरी आवश्यक है।

इस फैसले को वृंदा करात ने दिल्ली उच्च न्यायालय में चुनौती दी, परंतु उच्च न्यायालय ने भी निचली अदालत के दृष्टिकोण को सही ठहराया। इसके बाद वे सर्वोच्च न्यायालय पहुँचीं, जहाँ अप्रैल के फैसले में न्यायालय ने पूर्व मंजूरी संबंधी कानूनी स्थिति को स्पष्ट करते हुए भी एफआईआर का आदेश देने से इनकार किया।

न्यायिक प्रक्रिया का क्रम

इस मामले में न्यायिक प्रक्रिया कई चरणों से गुज़री — पुलिस से शिकायत, ट्रायल कोर्ट, दिल्ली उच्च न्यायालय, सर्वोच्च न्यायालय का अप्रैल फैसला और अब पुनर्विचार याचिका का खारिज होना। यह ऐसे समय में आया है जब नई दिल्ली में राजनीतिक भाषणों और चुनाव प्रचार के दौरान दिए गए बयानों पर कानूनी जवाबदेही को लेकर बहस जारी है।

सर्वोच्च न्यायालय के इस ताज़े आदेश के साथ, वृंदा करात की एफआईआर दर्ज कराने की कानूनी कोशिश अब सभी अदालती विकल्पों के समाप्त होने के साथ व्यावहारिक रूप से अंत पर पहुँच गई है।

आगे की स्थिति

पुनर्विचार याचिका खारिज होने के बाद अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा के खिलाफ इस मामले में एफआईआर दर्ज होने की संभावना अब न्यायिक दृष्टि से समाप्त मानी जा रही है। यह फैसला उन मामलों की बढ़ती सूची में जुड़ता है जहाँ चुनाव प्रचार के दौरान दिए गए भाषणों पर आपराधिक कार्रवाई की सीमाएँ न्यायालय ने परिभाषित की हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

यह सवाल विवादास्पद बना रहेगा। पुलिस से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक हर स्तर पर एफआईआर की माँग अस्वीकार होना दर्शाता है कि भड़काऊ माने जाने वाले राजनीतिक भाषणों पर आपराधिक मुकदमा चलाने की सीमाएँ न्यायिक व्याख्या में बेहद संकरी हैं। आलोचकों का कहना है कि यह स्थिति चुनाव प्रचार में जिम्मेदार भाषण की संस्कृति को कमज़ोर करती है, जबकि समर्थकों का तर्क है कि राजनीतिक भाषण को आपराधिक दायरे में लाना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए खतरनाक मिसाल बन सकता है।
RashtraPress
3 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुप्रीम कोर्ट ने वृंदा करात की पुनर्विचार याचिका क्यों खारिज की?
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि 29 अप्रैल के फैसले पर पुनर्विचार का कोई उचित आधार नहीं मिला। अप्रैल के उस फैसले में न्यायालय पहले ही यह तय कर चुका था कि 2020 के चुनाव प्रचार भाषणों पर कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता।
अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा के खिलाफ यह मामला क्या था?
यह मामला जनवरी 2020 में सीएए-विरोधी प्रदर्शनों के दौरान दिए गए भाषणों से जुड़ा है, जिन्हें लेकर सीपीएम नेता वृंदा करात ने दोनों BJP नेताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की माँग की थी। पुलिस ने शिकायत पर कार्रवाई से इनकार किया, जिसके बाद मामला ट्रायल कोर्ट से होते हुए सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचा।
सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 2025 में क्या फैसला दिया था?
29 अप्रैल को सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान दिए गए भाषणों के आधार पर अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा के खिलाफ कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता। न्यायालय ने पूर्व मंजूरी संबंधी कानूनी स्थिति स्पष्ट की, लेकिन एफआईआर का आदेश देने से इनकार किया।
इस मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय की क्या भूमिका रही?
दिल्ली उच्च न्यायालय ने ट्रायल कोर्ट के उस दृष्टिकोण को सही ठहराया जिसमें एफआईआर दर्ज करने के लिए पूर्व मंजूरी की आवश्यकता बताई गई थी। इस फैसले के बाद वृंदा करात ने सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया।
अब इस मामले में आगे क्या होगा?
पुनर्विचार याचिका खारिज होने के साथ इस मामले में एफआईआर दर्ज कराने के सभी न्यायिक विकल्प व्यावहारिक रूप से समाप्त हो गए हैं। अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा के खिलाफ इस विशेष मामले में आगे कोई कानूनी कार्रवाई की संभावना अब नहीं बचती।
राष्ट्र प्रेस
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