दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: मेडिकल बोर्ड UDID कार्ड की दिव्यांगता प्रतिशत नहीं बदल सकते, दो NEET-UG उम्मीदवारों को राहत
सारांश
मुख्य बातें
दिल्ली हाईकोर्ट ने 25 सितंबर 2026 को एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया कि एमबीबीएस पाठ्यक्रम में प्रवेश के लिए उम्मीदवारों का मूल्यांकन करने वाले मेडिकल असेसमेंट बोर्ड, वैध यूनीक डिसएबिलिटी आइडेंटिटी (UDID) कार्ड में दर्ज दिव्यांगता प्रतिशत में न तो हस्तक्षेप कर सकते हैं और न ही उसे कम कर सकते हैं। न्यायालय ने कहा कि इन बोर्डों का एकमात्र दायित्व उम्मीदवार की कार्यात्मक क्षमता (फंक्शनल कॉम्पिटेंसी) का आकलन करना है।
मामले की पृष्ठभूमि
जस्टिस जसमीत सिंह की एकल पीठ ने यह निर्णय नीट-यूजी 2026 के दो उम्मीदवारों की याचिकाओं पर सुनाया, जिनकी दिव्यांगता प्रतिशत को प्रवेश प्रक्रिया के दौरान मेडिकल असेसमेंट बोर्डों ने घटा दिया था। इस कटौती के परिणामस्वरूप दोनों उम्मीदवारों को बेंचमार्क दिव्यांग व्यक्तियों (PwBD) की श्रेणी से बाहर कर दिया गया था और वे काउंसलिंग के पहले दौर में भाग नहीं ले सकीं।
दोनों याचिकाकर्ताओं का विवरण
पहली याचिकाकर्ता, 18 वर्षीया स्थायी दृष्टिबाधित उम्मीदवार के UDID कार्ड और प्रमाण पत्र में 60 प्रतिशत स्थायी दिव्यांगता दर्ज थी। उनके नीट-यूजी 2026 के एडमिट कार्ड में भी दिव्यांगता को 'अंधापन' के रूप में दर्ज किया गया था और उन्हें क्षतिपूर्ति समय दिया गया था। उन्होंने परीक्षा में 720 में से 398 अंक प्राप्त किए और PwBD श्रेणी में 409वीं रैंक हासिल की। हालांकि, लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज के चिकित्सा मूल्यांकन बोर्ड ने उनकी दिव्यांगता को घटाकर 30 प्रतिशत आँक दिया, जिससे वे PwBD श्रेणी से बाहर हो गईं।
दूसरी याचिकाकर्ता आशिया के UDID कार्ड में 61 प्रतिशत स्थायी चलने-फिरने की विकलांगता दर्ज है। उन्होंने नीट-यूजी 2026 में 720 में से 363 अंक प्राप्त किए और दिव्यांग श्रेणी में 638वीं रैंक प्राप्त की। प्राथमिक मूल्यांकन बोर्ड ने उनकी दिव्यांगता को घटाकर 16 प्रतिशत कर दिया, जिसे अपीलीय बोर्ड ने भी बाद में सही ठहराया, जिससे वे दिव्यांग श्रेणी के आरक्षण के लिए अपात्र हो गईं।
अदालत की प्रमुख टिप्पणियाँ
उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के अंतर्गत जारी UDID कार्ड, दिव्यांगता के अस्तित्व, प्रकृति और सीमा का प्राथमिक दस्तावेजी प्रमाण है। जस्टिस सिंह ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मेडिकल बोर्ड को दिए गए दिशानिर्देश उन्हें 'UDID कार्ड में दर्ज दिव्यांगता प्रतिशत पर पुनर्विचार करने का अधिकार नहीं देते।'
न्यायालय ने यह भी कहा कि यदि कोई प्रतिवादी UDID कार्ड में दर्ज प्रतिशत से असंतुष्ट है, तो प्रमाणन प्राधिकारी के निर्णय के विरुद्ध अपीलीय मार्ग उपलब्ध है — प्रवेश के समय चिकित्सा मूल्यांकन बोर्ड द्वारा उस प्रतिशत को अनदेखा करना या घटाना उचित नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय के 'ओम राठौड़ बनाम डायरेक्टर जनरल ऑफ हेल्थ सर्विसेज' निर्णय का हवाला देते हुए अदालत ने दोहराया कि बोर्डों का ध्यान दिव्यांगता की मात्रा तय करने पर नहीं, बल्कि उम्मीदवार की कार्यात्मक क्षमता पर होना चाहिए।
अदालत का आदेश
दिल्ली हाईकोर्ट ने दोनों मामलों में जारी मूल्यांकन और पात्रता प्रमाण पत्रों को रद्द कर दिया। अधिकारियों को निर्देश दिया गया कि दोनों याचिकाकर्ताओं को उनके UDID कार्ड में दर्ज दिव्यांगता के आधार पर, PwBD श्रेणी की उनकी रैंक के अनुसार, नीट-यूजी 2026 काउंसलिंग के तीसरे दौर और यदि कोई मॉप-अप राउंड हो, उसमें भाग लेने की अनुमति दी जाए। हालांकि, अदालत ने अतिरिक्त (सुपरन्यूमेरेरी) सीटें बनाने की मांग अस्वीकार कर दी।
आगे की राह
यह निर्णय उन तमाम दिव्यांग उम्मीदवारों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल स्थापित करता है जो भविष्य में मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं में आवेदन करेंगे। दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 की धारा 56, 57 और 59 के प्रावधानों की व्याख्या करते हुए अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि प्रमाणन और अपील का वैधानिक ढाँचा ही एकमात्र उचित मार्ग है। काउंसलिंग का तीसरा दौर और संभावित मॉप-अप राउंड इन दोनों उम्मीदवारों के लिए अगला निर्णायक चरण होगा।