दिव्यांग छात्रों के लिए UGC के नए दिशा-निर्देश: उच्च शिक्षा में समावेश और समान अवसर पर जोर
सारांश
मुख्य बातें
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने 12 जुलाई 2026 को उच्च शिक्षा संस्थानों में दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए शिक्षण, मूल्यांकन और परीक्षा प्रक्रियाओं को अधिक समावेशी बनाने हेतु व्यापक दिशा-निर्देश जारी करने पर बल दिया है। आयोग का स्पष्ट मत है कि दिव्यांग छात्रों को परीक्षा में अतिरिक्त समय, सुलभ मूल्यांकन व्यवस्था और निरंतर शैक्षणिक सहयोग मिलना चाहिए, जिससे वे अन्य विद्यार्थियों के समान अवसरों का उपयोग कर सकें।
दिव्यांगता और शिक्षा: आँकड़ों की ज़मीनी हकीकत
नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गनाइजेशन (NSSO) की 2011 की रिपोर्ट के अनुसार, देश की कुल आबादी का 2.2 प्रतिशत हिस्सा दिव्यांग है। यह आँकड़ा तत्कालीन दिव्यांगजन अधिकार कानून, 1995 के अंतर्गत मान्यता प्राप्त सात प्रकार की दिव्यांगताओं पर आधारित था। ग्रामीण क्षेत्रों में दिव्यांगता की दर 2.3 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 2 प्रतिशत दर्ज की गई थी।
लिंग के आधार पर देखें तो पुरुषों में यह दर 2.4 प्रतिशत और महिलाओं में 1.9 प्रतिशत रही। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि दिव्यांग आबादी में से केवल 1.46 करोड़ लोग ही साक्षर पाए गए। उच्च शिक्षा में दिव्यांग विद्यार्थियों का नामांकन कुल छात्र संख्या का मात्र 0.56 प्रतिशत रहा — एक आँकड़ा जो नीति-निर्माताओं के लिए गंभीर चेतावनी है।
UGC के नए दिशा-निर्देशों का दायरा
इन्हीं विषमताओं को दूर करने के लिए UGC ने क्रेडिट आधारित पाठ्यक्रमों के शैक्षणिक पहलुओं पर विशेष दिशा-निर्देश तैयार किए हैं। इनका उद्देश्य शिक्षण पद्धति, मूल्यांकन और परीक्षा प्रणाली को दिव्यांग-अनुकूल बनाना है। विकल्प आधारित क्रेडिट प्रणाली (CBCS) के तहत विद्यार्थियों को मुख्य, वैकल्पिक और कौशल-आधारित विषयों के चयन में लचीलापन दिया जाएगा, जिससे दिव्यांग छात्र अपनी आवश्यकता और क्षमता के अनुसार पाठ्यक्रम तय कर सकेंगे।
क्रेडिट ढाँचे के अंतर्गत प्रमाणपत्र के लिए 40, डिप्लोमा के लिए 84, स्नातक डिग्री के लिए 120 तथा ऑनर्स या शोध डिग्री के लिए 160 क्रेडिट निर्धारित किए गए हैं। अकादमिक बैंक ऑफ क्रेडिट की व्यवस्था से स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर के विद्यार्थियों को निर्धारित अवधि में कई बार प्रवेश और निकास की सुविधा मिलेगी।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 से जुड़ाव
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 में उच्च शिक्षा में समानता और समावेशन को प्रमुख लक्ष्य बनाया गया है। नीति में खुली और दूरस्थ शिक्षा, ऑनलाइन माध्यमों और तकनीक के व्यापक उपयोग के ज़रिए सभी विद्यार्थियों तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पहुँचाने का संकल्प है। यह ऐसे समय में आया है जब ग्रामीण क्षेत्रों में दिव्यांग महिलाओं की साक्षरता दर अभी भी राष्ट्रीय औसत से काफी नीचे है।
NEP 2020 में सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित समूहों, महिलाओं, भौगोलिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों के विद्यार्थियों तथा दिव्यांग छात्रों के लिए समान शैक्षणिक पहुँच सुनिश्चित करने पर विशेष ज़ोर दिया गया है। गौरतलब है कि नीति में गुणवत्तापूर्ण विश्वविद्यालयों की स्थापना, वंचित विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्ति और सभी शैक्षणिक सामग्री को दिव्यांग-अनुकूल बनाने की सिफारिश भी शामिल है।
आम जनता और दिव्यांग समुदाय पर असर
UGC का मानना है कि शिक्षा ही सामाजिक और आर्थिक समानता का सबसे प्रभावी माध्यम है। इसलिए उच्च शिक्षा संस्थानों में ऐसी समावेशी शिक्षण पद्धति विकसित करना ज़रूरी है, जिससे दिव्यांग विद्यार्थी न केवल शिक्षा प्राप्त कर सकें बल्कि देश के विकास में सक्रिय और सम्मानजनक भूमिका निभा सकें। आँकड़ों के अनुसार, उच्च शिक्षा में नामांकन का 0.56 प्रतिशत का आँकड़ा बताता है कि अभी लंबा रास्ता तय करना है।
आगे की राह
मूल्यांकन प्रणाली को विद्यार्थियों के सीखने के परिणामों, पाठ्यभार और शिक्षण घंटों के आधार पर अधिक प्रभावी बनाने का प्रयास जारी है। विभिन्न संस्थानों के बीच क्रेडिट हस्तांतरण को सरल बनाने और पाठ्यक्रमों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के अनुकूल आधुनिक बनाने की दिशा में UGC के ये दिशा-निर्देश एक महत्वपूर्ण कदम माने जा रहे हैं। अब देखना यह होगा कि विश्वविद्यालय और महाविद्यालय इन्हें ज़मीनी स्तर पर कितनी तेज़ी और ईमानदारी से लागू करते हैं।