दिल्ली दंगों की साजिश: हाईकोर्ट ने अतहर खान की जमानत याचिका खारिज, फरार होने और गवाहों को प्रभावित करने का जोखिम
सारांश
मुख्य बातें
दिल्ली हाईकोर्ट ने 7 जुलाई 2026 को 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से जुड़े बड़े षड्यंत्र मामले में आरोपी अतहर खान की जमानत याचिका खारिज कर दी। अदालत ने माना कि उसके विरुद्ध प्रथमदृष्टया पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं, और यदि उसे जमानत मिलती है तो वह फरार हो सकता है तथा अभियोजन पक्ष के गवाहों को प्रभावित करने की आशंका है।
अदालत का निर्णय और आधार
जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस मधु जैन की डिवीजन बेंच ने अतहर खान की वह अपील खारिज की, जिसमें उसने गैर-कानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत ट्रायल कोर्ट के जमानत-अस्वीकृति आदेश को चुनौती दी थी। बेंच ने स्पष्ट किया कि दंगों के दौरान हुई जानमाल की क्षति में अतहर खान की कथित भूमिका प्रथमदृष्टया सिद्ध होती है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने मौखिक रूप से टिप्पणी की थी कि रिकॉर्ड में उपलब्ध व्हाट्सएप चैट कथित षड्यंत्र में अतहर खान की सक्रिय भागीदारी का प्रथमदृष्टया संकेत देते हैं। बेंच ने कहा था, 'सच कहूं तो तीसरे पक्ष के लोगों के तौर पर ये संदेश वास्तव में साजिश को साबित करते हैं। वे साबित करते हैं कि ये सभी लोग एक साथ थे। जब आप इस तरह की साजिश रचते हैं, तो चीजें हाथ से निकल सकती हैं और हम सभी 2020 में हुई घटनाओं के गवाह हैं। ये संदेश साबित करते हैं कि आप एक सक्रिय भागीदार थे। यह चौंकाने वाला है।'
बचाव पक्ष के तर्क
अतहर खान की ओर से पेश वकील अर्जुन दीवान ने दलील दी कि व्हाट्सएप संदेश केवल शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन की योजनाओं को दर्शाते हैं और उनमें हिंसा भड़काने का कोई इरादा नहीं था। उन्होंने कहा, 'मेरे संदेश स्पष्ट रूप से संकेत देते हैं कि हम कोई सड़क जाम नहीं चाहते हैं।' बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि अभियोजन पक्ष द्वारा उद्धृत डिलीट किए गए संदेश का गलत अर्थ निकाला जा रहा है।
इसके अलावा बचाव पक्ष ने कहा कि अतहर खान के पास से कोई हथियार, धनराशि या आपत्तिजनक सामग्री बरामद नहीं हुई और उसे किसी हिंसक कृत्य से सीधे जोड़ने वाला कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं है। बचाव ने यह भी तर्क दिया कि वह केवल स्थानीय स्तर के सुविधाप्रदाता थे और उनकी कथित षड्यंत्र में कोई निर्णायक भूमिका नहीं थी। साथ ही, सह-आरोपी शादाब अहमद और गुलफिशा फातिमा को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जमानत दिए जाने का हवाला देते हुए समान व्यवहार की माँग की गई।
अभियोजन पक्ष का पक्ष
दिल्ली पुलिस की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू पेश हुए। उन्होंने तर्क दिया कि अतहर खान की भूमिका उमर खालिद और शरजील इमाम जैसी थी, न कि उन सह-आरोपियों जैसी जिन्हें जमानत मिली। उन्होंने कहा, 'वह कोई मामूली सहयोगी नहीं था। उसकी भूमिका की तुलना उमर खालिद और शरजील इमाम से की जा सकती है। 100-200 लोगों को मारने का आह्वान किया गया था। उसका मामला अलग स्तर का है।'
व्यापक संदर्भ: उमर खालिद और शरजील इमाम का मामला
गौरतलब है कि इसी महीने दिल्ली की एक अदालत ने उमर खालिद और शरजील इमाम की नियमित जमानत याचिकाएँ भी खारिज की थीं। उस अदालत ने कहा कि वह सर्वोच्च न्यायालय के 5 जनवरी के उस आदेश से बंधी है जिसमें दोनों को जमानत देने से इनकार किया गया था और उनकी नई याचिकाएँ सुनवाई योग्य नहीं थीं। यह ऐसे समय में आया है जब 2020 दिल्ली दंगों से जुड़े यूएपीए मामलों की न्यायिक प्रक्रिया वर्षों से जारी है और कई आरोपी लंबे समय से न्यायिक हिरासत में हैं।
अतहर खान के मामले में अगली सुनवाई ट्रायल कोर्ट स्तर पर जारी रहेगी। यूएपीए के तहत जमानत मिलना अत्यंत कठिन माना जाता है, क्योंकि इसमें अदालत को यह संतुष्टि होनी चाहिए कि आरोपी के विरुद्ध प्रथमदृष्टया कोई मामला नहीं बनता।