दिल्ली हाईकोर्ट ने 2020 दंगों की 'बड़ी साजिश' केस में सलीम मलिक को जमानत दी, सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला

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दिल्ली हाईकोर्ट ने 2020 दंगों की 'बड़ी साजिश' केस में सलीम मलिक को जमानत दी, सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला

सारांश

दिल्ली उच्च न्यायालय ने 2020 दंगों की बड़ी साजिश केस में सलीम मलिक को पाँच साल दस महीने की हिरासत के बाद जमानत दी। कोर्ट ने उनकी भूमिका को स्थानीय-स्तर का मददगार माना, न कि मुख्य साजिशकर्ता — सर्वोच्च न्यायालय के 'गुलफिशा फातिमा' फैसले की कसौटी पर।

मुख्य बातें

दिल्ली उच्च न्यायालय ने 21 मई 2026 को सलीम मलिक उर्फ मुन्ना को 2020 दिल्ली दंगों की बड़ी साजिश केस में जमानत दी।
सिंह और जस्टिस मधु जैन की बेंच ने मलिक को 'स्थानीय-स्तर का मददगार' माना, न कि मुख्य साजिशकर्ता।
मलिक पाँच साल और दस महीने से अधिक समय से हिरासत में थे; ट्रायल कोर्ट में आरोपों पर बहस अभी जारी है।
कोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय के 'गुलफिशा फातिमा बनाम राज्य' फैसले का हवाला दिया, जिसमें मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को जमानत मिली थी।
जमानत शर्तों में ₹2 लाख का बॉन्ड, पासपोर्ट जमा, दिल्ली से बाहर न जाना और सप्ताह में दो बार क्राइम ब्रांच के समक्ष उपस्थिति शामिल है।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने 21 मई 2026 को 2020 के दिल्ली दंगों से जुड़े बड़ी साजिश के मामले में सलीम मलिक उर्फ मुन्ना को जमानत दे दी। न्यायालय ने पाया कि मलिक की भूमिका उन सह-आरोपियों से अलग नहीं है, जिन्हें सर्वोच्च न्यायालय पहले ही जमानत दे चुका है।

मुख्य घटनाक्रम

जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस मधु जैन की डिवीजन बेंच ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि मलिक पर लगे आरोप उन्हें स्थानीय-स्तर के मददगार की श्रेणी में रखते हैं, न कि उस मुख्य साजिशकर्ता की श्रेणी में जिसने कथित बड़ी साजिश की योजना बनाने में भूमिका निभाई हो। बेंच ने कहा कि मलिक की भूमिका और मोहम्मद सलीम खान तथा शादाब अहमद की भूमिका में कोई उल्लेखनीय अंतर नहीं है।

गौरतलब है कि मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को इसी वर्ष की शुरुआत में सर्वोच्च न्यायालय ने 'गुलफिशा फातिमा बनाम राज्य (दिल्ली सरकार)' मामले में जमानत दी थी। उस फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने कथित साजिश के मुख्य वैचारिक सूत्रधारों और स्थानीय-स्तर के परिचालन मददगारों के बीच स्पष्ट विभाजन रेखा खींची थी।

हिरासत की अवधि और ट्रायल की स्थिति

जस्टिस सिंह की अध्यक्षता वाली बेंच ने यह भी दर्ज किया कि सलीम मलिक पाँच साल और दस महीने से अधिक समय से न्यायिक हिरासत में हैं, जबकि ट्रायल कोर्ट में अभी भी आरोपों पर बहस जारी है। न्यायालय ने कहा कि ट्रायल पूरा होने में अभी और समय लगेगा, और इस परिस्थिति में जमानत देना उचित है।

अभियोजन पक्ष के तर्क

जमानत याचिका का विरोध करते हुए दिल्ली पुलिस की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू ने दलील दी कि मलिक ने साजिश में सक्रिय रूप से भाग लिया था। उन्होंने कहा कि गैर-कानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) की धारा 43डी(5) के तहत जमानत पर लगी रोक अभी भी लागू होती है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, मलिक ने फरवरी 2020 के मध्य में हुई बैठकों में भाग लिया था और उन पर विरोध प्रदर्शनों की योजना बनाने, भड़काऊ भाषण देने तथा पत्थरबाज़ी और पुलिस से झड़प के लिए लोगों को उकसाने के आरोप हैं।

जमानत की शर्तें

दिल्ली उच्च न्यायालय ने मलिक को कड़ी शर्तों के साथ जमानत दी है। इनमें ₹2 लाख का व्यक्तिगत बॉन्ड भरना और दो जमानतदार प्रस्तुत करना, बिना पूर्व अनुमति के दिल्ली से बाहर न जाना, पासपोर्ट जमा करना, और सप्ताह में दो बार क्राइम ब्रांच के एसएचओ के समक्ष उपस्थित होना शामिल है। इसके अलावा, उन्हें गवाहों से संपर्क करने, रैलियों या सार्वजनिक सभाओं में भाग लेने, मामले से जुड़ी कोई सामग्री प्रकाशित करने, या एफआईआर से संबंधित किसी भी समूह से जुड़ने से तब तक प्रतिबंधित किया गया है, जब तक ट्रायल पूरा नहीं हो जाता।

क्या होगा आगे

यह आदेश 2020 के दिल्ली दंगों के बड़ी साजिश मामले में न्यायिक रुख के क्रमिक विकास का हिस्सा है। सर्वोच्च न्यायालय के 'गुलफिशा फातिमा' फैसले की व्याख्या अब निचले स्तर के आरोपियों की जमानत याचिकाओं पर असर डाल रही है। ट्रायल कोर्ट में मामले की सुनवाई जारी रहेगी और आरोपों पर बहस का अंतिम निर्णय अभी बाकी है।

संपादकीय दृष्टिकोण

वह यह है कि यह आदेश अकेला नहीं है — यह उस न्यायिक प्रवृत्ति की कड़ी है जो बड़ी साजिश के मामलों में व्यक्तिगत भूमिका के सत्यापन की माँग बढ़ा रही है।
RashtraPress
22 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सलीम मलिक को दिल्ली हाईकोर्ट से जमानत क्यों मिली?
दिल्ली उच्च न्यायालय ने पाया कि सलीम मलिक की भूमिका मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद जैसी ही थी, जिन्हें सर्वोच्च न्यायालय 'गुलफिशा फातिमा' मामले में जमानत दे चुका है। कोर्ट ने उन्हें मुख्य साजिशकर्ता नहीं, बल्कि स्थानीय-स्तर का मददगार माना।
सलीम मलिक पर क्या आरोप हैं?
अभियोजन पक्ष के अनुसार, मलिक ने फरवरी 2020 के मध्य में बैठकों में भाग लिया, विरोध प्रदर्शनों की योजना बनाई, भड़काऊ भाषण दिए और पत्थरबाज़ी तथा पुलिस से झड़प के लिए लोगों को उकसाया। उन पर यूएपीए सहित अन्य धाराओं के तहत मामला दर्ज है।
'गुलफिशा फातिमा बनाम राज्य' मामला क्या है और इसका यहाँ क्या महत्व है?
यह सर्वोच्च न्यायालय का वह फैसला है जिसमें 2020 दंगों के बड़ी साजिश मामले में मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को जमानत दी गई थी। इस फैसले में कोर्ट ने साजिश के मुख्य वैचारिक सूत्रधारों और स्थानीय-स्तर के परिचालन मददगारों के बीच अंतर स्पष्ट किया था, जिसे दिल्ली उच्च न्यायालय ने मलिक के मामले में आधार बनाया।
जमानत पर रिहा होने के बाद सलीम मलिक पर क्या पाबंदियाँ हैं?
उन्हें ₹2 लाख का व्यक्तिगत बॉन्ड भरना होगा, पासपोर्ट जमा करना होगा, बिना अनुमति दिल्ली से बाहर नहीं जाना होगा और सप्ताह में दो बार क्राइम ब्रांच के एसएचओ के सामने उपस्थित होना होगा। इसके अलावा गवाहों से संपर्क, सार्वजनिक सभाओं में भागीदारी और मामले से जुड़ी सामग्री प्रकाशित करने पर भी प्रतिबंध है।
2020 दिल्ली दंगों की बड़ी साजिश ट्रायल अभी किस चरण में है?
दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में दर्ज किया कि ट्रायल कोर्ट में अभी भी आरोपों पर बहस चल रही है और मामले के निपटारे में अभी और समय लगेगा। मलिक पाँच साल दस महीने से अधिक समय से हिरासत में थे।
राष्ट्र प्रेस
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