बड़ा फैसला: दिल्ली हाईकोर्ट ने इशरत जहां की जमानत रद्द करने से किया इनकार, पुलिस की अपील खारिज
सारांश
Key Takeaways
- दिल्ली हाईकोर्ट ने शुक्रवार को दिल्ली पुलिस की वह अपील खारिज की जिसमें इशरत जहां की जमानत रद्द करने की मांग की गई थी।
- जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर डुडेजा की पीठ ने जमानत में हस्तक्षेप करने से इनकार किया।
- इशरत जहां को 14 मार्च 2022 को कड़कड़डूमा कोर्ट से नियमित जमानत मिली थी, यानी चार साल से अधिक समय से वह जमानत पर हैं।
- जनवरी 2024 में ट्रायल कोर्ट ने इशरत जहां पर दंगा, गैर-कानूनी जमावड़ा और हत्या के प्रयास के आरोप तय किए।
- हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस आदेश से मामले के गुण-दोष पर कोई राय नहीं दी गई है।
- फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों की कथित साजिश में इशरत जहां को गिरफ्तार किया गया था।
नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने 2020 उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगा मामले में पूर्व कांग्रेस पार्षद इशरत जहां की जमानत रद्द करने की दिल्ली पुलिस की याचिका को शुक्रवार को खारिज कर दिया। जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर डुडेजा की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि जमानत मिले चार साल से अधिक समय बीत चुका है और शर्तों के उल्लंघन का कोई मामला सामने नहीं आया।
मामले की पृष्ठभूमि
इशरत जहां को फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में भड़के सांप्रदायिक दंगों से जुड़ी कथित बड़ी साजिश के मामले में गिरफ्तार किया गया था। यह दंगे उस समय हुए थे जब तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत दौरे पर थे। पुलिस का आरोप था कि इस यात्रा के दौरान बड़े पैमाने पर हिंसा भड़काने की 'पहले से सोची-समझी साजिश' रची गई थी।
लंबी कानूनी लड़ाई के बाद 14 मार्च 2022 को कड़कड़डूमा कोर्ट ने इशरत जहां को नियमित जमानत प्रदान की थी। इसके बाद दिल्ली पुलिस ने इस जमानत को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
हाईकोर्ट का निर्णय और तर्क
जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर डुडेजा की पीठ ने दिल्ली पुलिस की दलीलों को अस्वीकार करते हुए कहा कि इशरत जहां को जमानत मिले चार साल से अधिक का समय बीत चुका है। इस पूरी अवधि में ट्रायल कोर्ट द्वारा लगाई गई किसी भी शर्त के उल्लंघन का कोई आरोप नहीं है।
खंडपीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि इस आदेश के माध्यम से अदालत ने मामले के गुण-दोष पर कोई राय नहीं दी है, यानी मुकदमे की सुनवाई अपने सामान्य क्रम में जारी रहेगी।
पुलिस की दलीलें और अदालत का रुख
दिल्ली पुलिस ने अपनी अपील में तर्क दिया था कि कड़कड़डूमा कोर्ट ने महत्वपूर्ण साक्ष्यों को नजरअंदाज किया और जमानत देने में कानूनी सिद्धांतों की अनदेखी की। पुलिस ने यह भी कहा था कि इशरत जहां ने उन विरोध प्रदर्शनों को संगठित करने में सक्रिय भूमिका निभाई जो कथित तौर पर दंगों में परिवर्तित हो गए।
हालांकि, दिल्ली हाईकोर्ट ने इन सभी तर्कों को अपर्याप्त मानते हुए जमानत में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
आरोप और ट्रायल की स्थिति
जनवरी 2024 में ट्रायल कोर्ट ने इशरत जहां सहित कई अन्य अभियुक्तों के विरुद्ध औपचारिक रूप से आरोप तय किए। इनमें दंगा भड़काना, गैर-कानूनी जमावड़ा और हत्या का प्रयास जैसे गंभीर अपराध शामिल हैं।
इसके अतिरिक्त, अप्रैल 2024 में एक स्थानीय अदालत ने इशरत जहां की जमानत शर्तों में संशोधन करते हुए उन्हें राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) से बाहर भी कानूनी पैरवी करने की अनुमति प्रदान की थी।
व्यापक संदर्भ और आगे की राह
2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगे भारत की हालिया सांप्रदायिक हिंसा की सबसे बड़ी घटनाओं में से एक रहे हैं, जिनमें 53 से अधिक लोगों की मौत और सैकड़ों लोग घायल हुए थे। इस मामले में दर्जनों अभियुक्त अभी भी न्यायिक प्रक्रिया से गुजर रहे हैं।
यह उल्लेखनीय है कि इस मामले में उमर खालिद जैसे अन्य अभियुक्त अभी भी जमानत के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जबकि इशरत जहां को राहत मिले चार साल हो चुके हैं। यह विरोधाभास इस मामले की कानूनी जटिलताओं को उजागर करता है।
आने वाले समय में ट्रायल कोर्ट में मुकदमे की सुनवाई निर्णायक दौर में प्रवेश करेगी, जिसमें आरोप तय हो चुके हैं। इस मामले का अंतिम फैसला 2020 दिल्ली दंगों की कानूनी विरासत को परिभाषित करने में अहम भूमिका निभाएगा।