फरक्का बराज हटा तो बांग्लादेश को सबसे बड़ा फायदा, बिहार के हित खतरे में: राजद सांसद सुधाकर सिंह
सारांश
मुख्य बातें
राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के सांसद सुधाकर सिंह ने 24 अगस्त को पटना में फरक्का बराज, भारत-बांग्लादेश जल समझौते, बिहार में परीक्षा सुधार, झारखंड के छात्र आंदोलन और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) समेत कई अहम मुद्दों पर केंद्र सरकार को कटघरे में खड़ा किया। उन्होंने चेताया कि इन मसलों को अलग-थलग देखने की बजाय इनके व्यापक और परस्पर जुड़े प्रभावों को समझना ज़रूरी है।
फरक्का बराज और बांग्लादेश को फायदे का सवाल
सुधाकर सिंह ने कहा कि एक ओर करीब 30 साल बाद भारत-बांग्लादेश जल संधि की समीक्षा या नवीनीकरण की चर्चा हो रही है, और दूसरी ओर फरक्का बराज को हटाने की बात चल रही है — जबकि ये दोनों विषय एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि फरक्का बराज का निर्माण 1961 में शुरू हुआ था, जबकि बांग्लादेश के साथ जल समझौता 1996 में हुआ।
उन्होंने सवाल उठाया कि यदि आज फरक्का बराज को हटा दिया जाए तो इसका सबसे बड़ा लाभ बांग्लादेश को मिलेगा और पानी का बड़ा हिस्सा सीधे बांग्लादेश की ओर बह जाएगा। उनके अनुसार, फरक्का के माध्यम से अभी करीब 40 हजार क्यूसेक पानी हुगली नदी में भेजा जाता है, जिससे कोलकाता और हल्दिया बंदरगाहों का संचालन सुचारु रहता है। उन्होंने कहा कि हल्दिया बिहार के लिए एक महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है और इस व्यवस्था के बाधित होने पर बिहार को अन्य बंदरगाहों पर निर्भर होना पड़ेगा।
नेपाल की समुद्र तक पहुँच और कोसी हाई डैम
सांसद ने नेपाल का जिक्र करते हुए कहा कि नेपाल को समुद्र तक सीधी पहुँच दिलाने के लिए कोसी, गंगा और हुगली के माध्यम से जलमार्ग की आवश्यकता है। उनका तर्क था कि फरक्का बराज की व्यवस्था समाप्त होने से प्रस्तावित कोसी हाई डैम जैसे समझौतों पर भी प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
उन्होंने सुझाव दिया कि यदि सरकार भारत-बांग्लादेश जल समझौते में बदलाव करना चाहती है, तो पहले सोनपुर-कंदवन क्षेत्र में एक परियोजना और कोसी के बराह क्षेत्र में कोसी हाई डैम का निर्माण किया जाए, ताकि बिहार के हिस्से का पानी सुरक्षित रहे। उन्होंने कहा — 'लोग उस डाल को ही काट रहे हैं, जिस पर वे बैठे हैं।'
परीक्षा सुधार और नई कमेटी पर सवाल
बिहार में परीक्षाओं को निष्पक्ष कराने के लिए गठित नई कमेटी पर सुधाकर सिंह ने कहा कि राज्य में पहले से ही प्रशासनिक आयोग मौजूद है, जिसमें आईएएस अधिकारी, नौकरशाह और विशेषज्ञ शामिल हैं। उनके अनुसार, इसके बावजूद यदि परीक्षाओं में गड़बड़ी होती है, तो केवल नई कमेटी बनाने से समस्या का समाधान नहीं होगा। उन्होंने कहा कि सरकार की नीयत साफ हो तो मौजूदा संस्थागत व्यवस्था पर्याप्त है, अन्यथा कमेटी पर कमेटी बनती रहेगी और बच्चों का भविष्य प्रभावित होता रहेगा।
झारखंड छात्र आंदोलन और युवाओं की निराशा
झारखंड के छात्र आंदोलन पर सांसद ने कहा कि यह मसला किसी एक राज्य या राजनीतिक दल तक सीमित नहीं है — देशभर के युवा अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि रोजगार संकट और परीक्षा प्रणाली की खामियों से उपजी यह निराशा 'आगे चलकर विस्फोटक स्थिति पैदा कर सकती है।' 1974 के छात्र आंदोलन का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि देश में उससे भी बड़ा छात्र आंदोलन खड़ा हो सकता है।
एसआईआर और वंचित वर्गों की चिंता
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पर सुधाकर सिंह ने कहा कि यह प्रक्रिया उन वर्गों के लिए गंभीर समस्या बन सकती है जो आर्थिक और शैक्षणिक रूप से कमजोर हैं और जिनके पास जन्म, जमीन या पहचान से जुड़े दस्तावेज नहीं हैं। उन्होंने डोम, मुसहर और नट जैसी वंचित बिरादरियों तथा आदिवासी समुदायों का उदाहरण दिया। साथ ही, उन्होंने साधु-संन्यासियों का भी जिक्र किया जिनके पास पारंपरिक दस्तावेज प्रायः उपलब्ध नहीं होते। उन्होंने माँग की कि दस्तावेजों से वंचित और कमजोर वर्गों की वास्तविक समस्याओं का व्यावहारिक समाधान निकाला जाए।
यह बयान ऐसे समय में आया है जब भारत-बांग्लादेश संबंधों में उथल-पुथल और बिहार में शिक्षा व्यवस्था को लेकर सार्वजनिक बहस तेज है। आगे देखना होगा कि सरकार इन मुद्दों पर क्या ठोस कदम उठाती है।