1 अक्टूबर 2026
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एफसीआरए संशोधन विधेयक 2026: कांग्रेस ने जेपीसी के 'समस्याग्रस्त कामकाज' पर लोकसभा अध्यक्ष से हस्तक्षेप माँगा

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एफसीआरए संशोधन विधेयक 2026: कांग्रेस ने जेपीसी के 'समस्याग्रस्त कामकाज' पर लोकसभा अध्यक्ष से हस्तक्षेप माँगा

सारांश

कांग्रेस ने एफसीआरए संशोधन विधेयक 2026 की जेपीसी समीक्षा को लेकर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखा। आरोप है कि हितधारकों से कोई सार्थक परामर्श नहीं हो रहा और शीतकालीन सत्र में विधेयक को जल्दबाज़ी में पारित करने की तैयारी है — जो संसदीय प्रक्रिया को महज औपचारिकता बना देगा।

मुख्य बातें

कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने 1 अक्टूबर 2026 को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर जेपीसी के कामकाज पर आपत्ति जताई।
एफसीआरए (संशोधन) विधेयक 2026 को 25 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश किया गया था और 12 अगस्त 2026 को 31 सदस्यीय जेपीसी को भेजा गया था।
कांग्रेस का आरोप है कि NGOs, धार्मिक निकायों और कानूनी विशेषज्ञों सहित प्रमुख हितधारकों से कोई सार्थक परामर्श नहीं किया जा रहा।
पार्टी ने माँग की कि विधेयक को शीतकालीन सत्र में तब तक न उठाया जाए जब तक जेपीसी की निष्पक्ष जाँच पूरी न हो।
वेणुगोपाल ने जेपीसी की जल्दबाज़ी को 'संसद के साथ धोखा' करार दिया।

कांग्रेस ने 1 अक्टूबर 2026 को विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 की समीक्षा के लिए गठित संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के 'समस्याग्रस्त कामकाज' को लेकर औपचारिक शिकायत दर्ज कराई। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को लिखे पत्र में पार्टी ने माँग की कि जेपीसी को विधेयक की व्यापक और निष्पक्ष जाँच का पूरा अवसर मिले। कांग्रेस का आरोप है कि हितधारकों से कोई सार्थक परामर्श नहीं हो रहा और आगामी शीतकालीन सत्र में विधेयक को जल्दबाज़ी में पारित करने की तैयारी है।

कांग्रेस की मुख्य आपत्तियाँ

कांग्रेस महासचिव (संगठन) केसी वेणुगोपाल ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर लिखा कि 'जेपीसी से पारित होने वाला कोई भी विधेयक त्रुटिरहित होना चाहिए और संसद को आश्वस्त होना चाहिए कि यह एक कठोर परामर्श प्रक्रिया से गुजरा है।' उन्होंने आगे कहा, 'ऐसा सुनिश्चित किए बिना, जेपीसी एक अर्थहीन अभ्यास और संसद के साथ एक धोखा है।'

लोक लेखा समिति के प्रमुख के रूप में भी उत्तरदायित्व सँभाल रहे वेणुगोपाल ने अपने पत्र में तीन स्पष्ट अनुरोध रखे। पहला — जेपीसी सार्वजनिक सूचना के माध्यम से लिखित ज्ञापन आमंत्रित करे और सभी प्रभावित हितधारकों से मौखिक साक्ष्य सुने। दूसरा — समिति को पर्याप्त समय दिया जाए, जिसमें आवश्यकता पड़ने पर रिपोर्टिंग की समय-सीमा का विस्तार भी शामिल हो। तीसरा — विधेयक को सदन में तब तक न उठाया जाए जब तक समिति की निष्पक्ष और व्यापक जाँच पूरी न हो जाए।

विधेयक की पृष्ठभूमि

एफसीआरए (संशोधन) विधेयक 2026 को 25 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश किया गया था। सांसदों द्वारा उठाई गई विभिन्न चिंताओं के मद्देनज़र 12 अगस्त 2026 को इसे 31 सदस्यीय जेपीसी के पास समीक्षा के लिए भेजा गया। यह ऐसे समय में आया है जब एफसीआरए कानून पहले से ही गैर-सरकारी संगठनों, धार्मिक निकायों और नागरिक समाज संस्थाओं के बीच विवाद का केंद्र रहा है।

गौरतलब है कि विदेशी अंशदान कानून में पिछले संशोधन — विशेषकर 2020 में — भी विपक्ष और स्वैच्छिक संगठनों के कड़े विरोध का सामना कर चुके थे। आलोचकों का कहना है कि हर बार संसदीय समिति की प्रक्रिया को औपचारिकता की तरह निपटाया जाता है।

हितधारकों की चिंताएँ

वेणुगोपाल ने अपने पत्र में स्पष्ट किया कि जेपीसी का गठन गैर-सरकारी संगठनों, धर्मार्थ संस्थाओं, धार्मिक निकायों, स्वयंसेवी संगठनों, कानूनी विशेषज्ञों और राज्य सरकारों सहित सभी हितधारकों की राय लेने के उद्देश्य से किया गया था। उन्होंने आरोप लगाया कि 'हालांकि, यह पता चला है कि हितधारकों के साथ कोई सार्थक परामर्श नहीं हो रहा है।'

उनके अनुसार, यदि विधेयक को जल्दबाज़ी में पारित किया गया तो यह उस उद्देश्य को ही विफल कर देगा जिसके लिए सदन ने विधेयक को समिति को भेजा था और 'एक महत्वपूर्ण संसदीय प्रक्रिया को महज औपचारिकता बना देगा।'

संसदीय विश्वसनीयता का सवाल

वेणुगोपाल ने अपने पत्र में लिखा, 'हमारे संसदीय संस्थानों में जनता का विश्वास इस आश्वासन पर टिका है कि उनके जीवन को प्रभावित करने वाले कानून उचित विचार-विमर्श के बाद ही बनाए जाते हैं।' उन्होंने अध्यक्ष बिरला से अपेक्षा जताई कि वे अपने पद की उच्च परंपराओं का पालन करते हुए यह सुनिश्चित करेंगे कि जेपीसी अपने गठन के उद्देश्य को पूरा करे।

आगे क्या होगा

अब सभी की निगाहें लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की प्रतिक्रिया और जेपीसी की अगली बैठक की कार्यसूची पर टिकी हैं। यदि कांग्रेस की माँगें मानी जाती हैं तो शीतकालीन सत्र में विधेयक को प्रस्तुत करने की समय-सीमा प्रभावित हो सकती है। विपक्ष के इस कदम से संसद में विधेयक पर बहस और भी तीखी होने के संकेत मिलते हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

फिर भी उसे लागू किया गया और अनेक संगठनों के लाइसेंस रद्द हुए। विडंबना यह है कि विपक्ष की माँगें — लिखित ज्ञापन, मौखिक साक्ष्य, धारा-दर-धारा चर्चा — वास्तव में जेपीसी की न्यूनतम प्रक्रियागत अपेक्षाएँ हैं, न कि कोई असाधारण राजनीतिक शर्त। यदि सरकार इन्हें भी अस्वीकार करती है, तो यह संसदीय जवाबदेही की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाएगा।
RashtraPress
1 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

एफसीआरए संशोधन विधेयक 2026 क्या है?
विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 भारत में विदेशी धन प्राप्त करने वाले NGOs, धार्मिक निकायों और स्वैच्छिक संगठनों पर लागू कानून में बदलाव का प्रस्ताव है। इसे 25 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश किया गया और सांसदों की चिंताओं के बाद 12 अगस्त 2026 को 31 सदस्यीय जेपीसी को भेजा गया।
कांग्रेस ने जेपीसी पर क्या आरोप लगाए हैं?
कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने आरोप लगाया है कि जेपीसी हितधारकों — जैसे NGOs, धर्मार्थ संस्थाएँ, कानूनी विशेषज्ञ और राज्य सरकारें — से कोई सार्थक परामर्श नहीं कर रही। उनका कहना है कि आगामी शीतकालीन सत्र में विधेयक को जल्दबाज़ी में पारित करने की तैयारी हो रही है, जो जेपीसी के उद्देश्य को ही विफल कर देगी।
कांग्रेस ने लोकसभा अध्यक्ष से क्या माँगें रखी हैं?
कांग्रेस ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से तीन माँगें रखी हैं: पहली — जेपीसी सार्वजनिक सूचना से लिखित ज्ञापन आमंत्रित करे और मौखिक साक्ष्य सुने; दूसरी — समिति को पर्याप्त समय दिया जाए और ज़रूरत पड़ने पर समय-सीमा बढ़ाई जाए; तीसरी — विधेयक को सदन में तब तक न लाया जाए जब तक जाँच पूरी न हो।
विधेयक को जेपीसी को कब और क्यों भेजा गया था?
एफसीआरए संशोधन विधेयक 2026 को 12 अगस्त 2026 को 31 सदस्यीय जेपीसी को भेजा गया था। लोकसभा में इसकी प्रस्तुति के बाद विभिन्न सांसदों ने इसके प्रावधानों पर गंभीर चिंताएँ जताई थीं, जिसके बाद सरकार को इसे समिति के पास भेजना पड़ा।
इस विवाद का शीतकालीन सत्र पर क्या असर पड़ सकता है?
यदि लोकसभा अध्यक्ष कांग्रेस की माँगों को स्वीकार कर जेपीसी को अधिक समय देते हैं, तो शीतकालीन सत्र में विधेयक को प्रस्तुत करने की संभावना टल सकती है। इस विवाद से संसद में विधेयक पर बहस और तीखी होने के संकेत मिलते हैं, खासकर NGO और नागरिक समाज समुदाय के बीच इस कानून को लेकर पहले से मौजूद तनाव के मद्देनज़र।
राष्ट्र प्रेस
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