13 अगस्त 2026
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एफसीआरए संशोधन विधेयक 2026 जेपीसी को भेजा गया: एनसीसीआई ने किया स्वागत, पर अपील-रहित प्रावधानों पर जताई आपत्ति

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एफसीआरए संशोधन विधेयक 2026 जेपीसी को भेजा गया: एनसीसीआई ने किया स्वागत, पर अपील-रहित प्रावधानों पर जताई आपत्ति

सारांश

एनसीसीआई ने एफसीआरए संशोधन विधेयक 2026 को जेपीसी भेजे जाने का स्वागत तो किया, लेकिन असली सवाल यह है — बिना अपील और न्यायिक समीक्षा के पंजीकरण रद्द करने और संपत्ति तीसरे पक्ष को सौंपने का प्रावधान क्या आस्था-आधारित संगठनों के लिए उचित प्रक्रिया है?

मुख्य बातें

एनसीसीआई के महासचिव असिर एबेनेजर ने 13 अगस्त 2026 को एफसीआरए संशोधन विधेयक 2026 को जेपीसी भेजे जाने का स्वागत किया।
विधेयक में नियम उल्लंघन पर संस्था का पंजीकरण रद्द करने का प्रावधान है, लेकिन अपील या न्यायिक समीक्षा का कोई विकल्प नहीं।
कार्रवाई होने पर संस्था की सारी संपत्ति विजिटिंग अथॉरिटी के पास जाएगी, जो उसे बेच या सरकार को सौंप सकती है।
नए संशोधन में एफआईआर दर्ज होने पर ट्रस्टी को अयोग्य घोषित करने का प्रावधान, जो भारतीय कानूनी परंपरा से अलग है।
एनसीसीआई ने जेपीसी से माँग की कि 2010 के एफसीआरए की निष्पक्ष और पारदर्शी समीक्षा हो, और कार्रवाई केवल दोषी संस्थाओं तक सीमित रहे।

नेशनल काउंसिल ऑफ चर्च्स इन इंडिया (एनसीसीआई) ने एफसीआरए संशोधन विधेयक 2026 को संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के पास समीक्षा के लिए भेजे जाने का स्वागत किया है, हालाँकि संगठन ने विधेयक के कई प्रावधानों पर गंभीर आपत्तियाँ भी दर्ज कराई हैं। एनसीसीआई के महासचिव असिर एबेनेजर ने 13 अगस्त 2026 को नागपुर में अपनी बात रखते हुए कहा कि विधेयक में अपील और न्यायिक समीक्षा के प्रावधानों का अभाव उनकी मुख्य चिंता है।

विधेयक के किन प्रावधानों पर है आपत्ति

एबेनेजर ने स्पष्ट किया कि एफसीआरए संशोधन विधेयक 2026 में यह प्रावधान किया गया है कि नियमों के किसी भी उल्लंघन पर संस्था का पंजीकरण रद्द किया जा सकता है। उन्होंने कहा, 'लाइसेंस रद्द करने से पहले मेरे लिए ऐसा कोई मंच नहीं है जहाँ मैं अपनी नुमाइंदगी कर सकूँ।' विधेयक में न अपील की सुविधा है और न ही न्यायिक समीक्षा का कोई विकल्प।

उन्होंने यह भी बताया कि संशोधन के तहत किसी संस्था के विरुद्ध कार्रवाई होने पर उसकी सारी संपत्ति स्वतः विजिटिंग अथॉरिटी के पास चली जाएगी, जिसके पास उन संपत्तियों को बेचने या सरकार को सौंपने का पूरा अधिकार होगा। एबेनेजर ने सवाल उठाया कि समुदाय को प्राप्त धन किसी तीसरे पक्ष को कैसे हस्तांतरित किया जा सकता है — यह पैसा या तो समुदाय को, या दानकर्ता को, या संगठन में ही रहना चाहिए।

2010 एफसीआरए और नए संशोधन में अंतर

एबेनेजर के अनुसार, 2010 के एफसीआरए में डिसक्वालिफिकेशन का प्रावधान था, लेकिन नए संशोधन में यह जोड़ा गया है कि यदि किसी ट्रस्टी के विरुद्ध एफआईआर दर्ज हो, तो उसे अयोग्य घोषित किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि भारत में ऐसा कोई कानून नहीं है जिसमें महज एफआईआर दर्ज होने पर किसी को अयोग्य ठहराया जाए। यह ऐसे समय में आया है जब देश भर के कई आस्था-आधारित संगठन विदेशी अनुदान पर निर्भर होकर स्वास्थ्य, शिक्षा और गरीबी उन्मूलन जैसे क्षेत्रों में कार्यरत हैं।

सरकार की जाँच के अधिकार पर एनसीसीआई का रुख

एबेनेजर ने स्पष्ट किया कि एनसीसीआई सरकार के जाँच के अधिकार को नकारती नहीं है। उनका कहना था, 'अगर कोई विदेशी अनुदान का सहारा लेकर किसी उपद्रव में संलिप्त है, तो निश्चित रूप से उसकी जाँच होनी चाहिए और उसके विरुद्ध कड़ी कार्रवाई भी।' हालाँकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि यदि कोई 1, 10 या 20 प्रतिशत संस्थाएँ नियम तोड़ रही हैं, तो उनके आधार पर सभी एनजीओ और आस्था-आधारित संगठनों को निशाना बनाना उचित नहीं है।

उन्होंने यह भी कहा कि वे इस स्थिति को सरकार द्वारा किसी अल्पसंख्यक समुदाय को दबाने की कोशिश के रूप में नहीं देखते। उनके अनुसार, एनसीसीआई कई क्षेत्रों में सरकार के साथ मिलकर काम कर रही है और कुछ संशोधनों को वे प्रासंगिक भी मानते हैं।

जेपीसी से क्या अपेक्षाएँ

एबेनेजर ने जेपीसी से माँग की कि 2010 के एफसीआरए की विधिवत और निष्पक्ष समीक्षा की जाए। उन्होंने कहा कि नियमन ज़रूरी है, लेकिन पूरी प्रक्रिया पारदर्शी और स्वतंत्र होनी चाहिए। उनकी स्पष्ट माँग यह है कि यदि लाइसेंस रद्द किया जाए, तो कार्रवाई की सीमा उसी तक सीमित रहे और संपत्ति तीसरे पक्ष को न सौंपी जाए। जेपीसी की समीक्षा के बाद इस विधेयक का स्वरूप क्या होगा, यह आने वाले सप्ताहों में स्पष्ट होगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन 'सभी को निशाना' बनाने की प्रक्रिया पर आपत्ति है — यह एक महत्वपूर्ण विभाजन-रेखा है जिसे मुख्यधारा की बहस अक्सर नज़रअंदाज़ करती है। जेपीसी के पास अब अवसर है कि वह विनियमन और उचित प्रक्रिया के बीच संतुलन स्थापित करे।
RashtraPress
13 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

एफसीआरए संशोधन विधेयक 2026 क्या है और इसे जेपीसी को क्यों भेजा गया?
एफसीआरए संशोधन विधेयक 2026 विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम 2010 में बदलाव का प्रस्ताव है, जो एनजीओ और आस्था-आधारित संगठनों के विदेशी अनुदान पर नियंत्रण को और कड़ा करता है। इसे संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के पास इसलिए भेजा गया ताकि विधेयक के विभिन्न प्रावधानों की विस्तृत समीक्षा हो सके।
एनसीसीआई की विधेयक से मुख्य आपत्तियाँ क्या हैं?
एनसीसीआई की दो प्रमुख आपत्तियाँ हैं — पहली, पंजीकरण रद्द करने से पहले संस्था को सुनवाई का कोई अवसर नहीं और न ही अपील या न्यायिक समीक्षा का विकल्प है। दूसरी, कार्रवाई होने पर संस्था की सारी संपत्ति विजिटिंग अथॉरिटी को सौंप दी जाएगी, जो उसे बेच या सरकार को हस्तांतरित कर सकती है।
एफआईआर पर डिसक्वालिफिकेशन का प्रावधान क्यों विवादास्पद है?
नए संशोधन में यह प्रावधान है कि किसी ट्रस्टी के विरुद्ध एफआईआर दर्ज होने पर उसे अयोग्य घोषित किया जा सकता है। असिर एबेनेजर के अनुसार, भारत में ऐसा कोई कानून नहीं है जिसमें महज एफआईआर — जो आरोप है, सिद्धदोष नहीं — के आधार पर किसी को अयोग्य ठहराया जाए।
क्या एनसीसीआई सरकार की जाँच का विरोध करती है?
नहीं। असिर एबेनेजर ने स्पष्ट कहा कि यदि कोई संस्था विदेशी अनुदान का दुरुपयोग कर रही है, तो उसकी जाँच और कार्रवाई होनी चाहिए। उनकी आपत्ति प्रक्रिया को लेकर है — कि दोषी संस्थाओं की आड़ में सभी एनजीओ और आस्था-आधारित संगठनों को निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए।
जेपीसी समीक्षा से एनसीसीआई को क्या उम्मीद है?
एनसीसीआई चाहती है कि जेपीसी 2010 के एफसीआरए की विधिवत और पारदर्शी समीक्षा करे। संगठन की माँग है कि नियमन निष्पक्ष हो, अपील का अधिकार सुनिश्चित हो, और लाइसेंस रद्द होने पर कार्रवाई की सीमा उसी संस्था तक सीमित रहे — संपत्ति तीसरे पक्ष को न सौंपी जाए।
राष्ट्र प्रेस
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