एफसीआरए बिल जेपीसी को भेजा गया: संसद में तीखी बहस, विपक्ष ने पारदर्शिता पर उठाए सवाल
सारांश
मुख्य बातें
लोकसभा में विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) संशोधन विधेयक को संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के पास भेजे जाने के निर्णय ने 12 अगस्त को सदन में तीखी नोकझोंक को जन्म दिया। सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने इसे व्यापक विचार-विमर्श की दिशा में सकारात्मक कदम बताया, जबकि विपक्षी दलों ने प्रक्रिया में अपनाई गई जल्दबाजी और पारदर्शिता की कमी पर कड़ी आपत्ति जताई।
सरकार का पक्ष: जेपीसी से बिल और मजबूत होगा
BJP सांसद तेजस्वी सूर्या ने जेपीसी को विधेयक भेजे जाने का बचाव करते हुए कहा कि यह कदम व्यापक बातचीत और आम सहमति सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है। उन्होंने कहा, 'एफसीआरए एक अहम बिल है। इस पर व्यापक बातचीत हो सके और संबंधित लोगों की राय ली जा सके। मुझे यकीन है कि जेपीसी की प्रक्रिया से यह बिल और भी मजबूत और बेहतर बनेगा, क्योंकि इसमें संबंधित लोगों से बातचीत होगी, ज्यादा आम सहमति बनेगी और बिल को और व्यापक बनाने के लिए विशेषज्ञों से भी सलाह ली जाएगी।'
बीजू जनता दल (BJD) सांसद सस्मित पात्रा ने भी सरकार के इस फैसले का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि दो दिन पहले उन्होंने स्वयं जेपीसी को विधेयक भेजने की माँग की थी, क्योंकि ईसाई समुदाय और अल्पसंख्यक समुदायों ने विधेयक को जल्दबाजी में पारित किए जाने पर चिंता जताई थी।
विपक्ष की आपत्ति: आखिरी समय में पेश, प्रक्रिया पर सवाल
कांग्रेस सांसद के.सी. वेणुगोपाल ने सरकार पर प्रक्रियागत पारदर्शिता न बरतने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, 'यह बिल आखिरी समय में लाया गया है, गुरुवार को सत्र खत्म होने वाला है। बुधवार दोपहर 12 बजे हमें लोकसभा सचिवालय से संदेश मिला कि अमित शाह यह बिल पेश कर रहे हैं। लेकिन अमित शाह आज मौजूद भी नहीं हैं। राज्य मंत्री ने इसे जेपीसी को भेजने का प्रस्ताव रखा। हंगामे के बीच बिल को जेपीसी को भेज रहे हैं।'
यह ऐसे समय में आया है जब संसद सत्र के समापन में महज एक दिन शेष था, जिससे विपक्ष को विधेयक की विषयवस्तु पर गहन चर्चा का अवसर नहीं मिल सका।
तृणमूल कांग्रेस के गंभीर आरोप
तृणमूल कांग्रेस (TMC) सांसद महुआ मोइत्रा ने विधेयक पर सबसे तीखे आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि सभी विपक्षी पार्टियाँ एकमत होकर इस बिल का विरोध कर रही हैं। मोइत्रा ने आरोप लगाया कि विधेयक का उद्देश्य गैर-सरकारी संगठनों (NGO) और धार्मिक अल्पसंख्यकों से जुड़े चैरिटेबल संगठनों की विदेशी फंडिंग को बाधित करना है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) पंजीकृत नहीं है, फिर भी उसके पास दिल्ली के हर जिले में हजारों करोड़ रुपये की संपत्ति है, जिसका न कोई ऑडिट होता है और न जाँच। राष्ट्र प्रेस इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करता।
एफसीआरए विधेयक: पृष्ठभूमि
विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम विदेशी स्रोतों से मिलने वाले धन को भारतीय संगठनों तक पहुँचने की प्रक्रिया को नियंत्रित करता है। गौरतलब है कि पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने एफसीआरए के तहत कई NGO के पंजीकरण रद्द किए हैं, जिससे यह विधेयक राजनीतिक रूप से संवेदनशील बना हुआ है। यह पहली बार नहीं है जब इस कानून में बदलाव को लेकर संसद में टकराव हुआ हो — 2020 में भी एफसीआरए संशोधन पर व्यापक विरोध हुआ था।
आगे क्या होगा
जेपीसी अब विधेयक की धाराओं की जाँच करेगी, विशेषज्ञों और हितधारकों से राय लेगी, और अपनी रिपोर्ट संसद में पेश करेगी। समिति की समयसीमा और सदस्यता अभी घोषित नहीं की गई है। विपक्ष की माँग है कि जेपीसी में सभी दलों को उचित प्रतिनिधित्व मिले और चर्चा की प्रक्रिया पारदर्शी हो।