29 सितंबर 2026
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एफसीआरए बिल पर जेपीसी: सदस्यों ने 12 अक्टूबर की बैठक टालने और 4 सप्ताह का अतिरिक्त समय माँगा

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एफसीआरए बिल पर जेपीसी: सदस्यों ने 12 अक्टूबर की बैठक टालने और 4 सप्ताह का अतिरिक्त समय माँगा

सारांश

एफसीआरए संशोधन विधेयक की समीक्षा कर रही जेपीसी में तनाव — सदस्यों ने 12 अक्टूबर की बैठक टालने और चार सप्ताह का समय माँगा। कांग्रेस सांसद एंटो एंटनी समेत विपक्षी सदस्यों का कहना है कि व्यापक असर वाले इस कानून की गहन और समावेशी समीक्षा के लिए पर्याप्त समय जरूरी है।

मुख्य बातें

जेपीसी सदस्यों ने अध्यक्ष संजय जायसवाल को 29 सितंबर 2026 को पत्र लिखकर 12 अक्टूबर की बैठक स्थगित करने की माँग की।
कांग्रेस सांसद एंटो एंटनी समेत सदस्यों ने कम से कम 4 सप्ताह का अतिरिक्त समय और उतनी ही अवधि तक सार्वजनिक टिप्पणी अवधि खुली रखने की अपील की।
एफसीआरए संशोधन विधेयक को 25 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश किया गया था और 12 अगस्त को जेपीसी के पास भेजा गया।
जेपीसी में 31 सदस्य हैं और इसकी अध्यक्षता BJP सांसद संजय जायसवाल कर रहे हैं।
विपक्ष का आरोप है कि विधेयक के कुछ प्रावधान अल्पसंख्यक संगठनों की विदेशी फंडिंग पर प्रतिकूल असर डाल सकते हैं; सरकार ने इसे खारिज किया है।

फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन अमेंडमेंट बिल (एफसीआरए बिल) की जाँच कर रही संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के सदस्यों ने 29 सितंबर 2026 को समिति के अध्यक्ष और भारतीय जनता पार्टी (BJP) सांसद संजय जायसवाल को पत्र लिखकर 12 अक्टूबर को निर्धारित बैठक स्थगित करने की माँग की है। सदस्यों ने विधेयक के व्यापक प्रभाव का हवाला देते हुए कम से कम चार सप्ताह का अतिरिक्त समय दिए जाने की अपील की है।

मुख्य घटनाक्रम

पत्र में कांग्रेस (INC) सांसद एंटो एंटनी समेत कई विपक्षी सदस्यों ने तर्क दिया कि प्रस्तावित विदेशी अंशदान विनियमन (संशोधन) अधिनियम (एफसीआरएए) की प्रकृति और उसके दूरगामी असर को देखते हुए बिल एवं उससे जुड़े दस्तावेजों का गहन अध्ययन अनिवार्य है। सदस्यों का कहना है कि जाँच-पड़ताल शुरू करने से पहले पर्याप्त तैयारी का समय मिलना चाहिए।

पत्र में यह भी अनुरोध किया गया है कि हितधारकों (स्टेकहोल्डर्स) से सार्वजनिक टिप्पणियाँ, सुझाव और विचार आमंत्रित करने की अवधि कम से कम चार सप्ताह तक खुली रखी जाए। इससे संगठन, विशेषज्ञ और आम जनता अपनी राय समिति तक पहुँचा सकेंगे।

एफसीआरए विधेयक की पृष्ठभूमि

विदेशी अंशदान (विनियमन) विधेयक, 2006 का मूल उद्देश्य विदेशी चंदे और विदेशी आतिथ्य की प्राप्ति एवं उपयोग को विनियमित करना है, तथा राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध उपयोग पर प्रतिबंध लगाना है। विदेशी वित्तीय सहायता प्राप्त करने वाले सभी संगठनों और गैर-सरकारी संगठनों (NGO) के लिए एफसीआरए के तहत पंजीकरण अनिवार्य है तथा उनकी निगरानी गृह मंत्रालय करता है, जो इस कानून का नोडल प्राधिकरण है।

संशोधन विधेयक को इसी वर्ष 25 मार्च को लोकसभा में पेश किया गया था। विपक्षी दलों की माँग पर 12 अगस्त को इसे जेपीसी के पास भेजा गया, क्योंकि विपक्ष ने विधेयक के कुछ प्रावधानों पर आपत्ति दर्ज कराई थी।

विपक्ष के आरोप और सरकार की प्रतिक्रिया

विपक्षी दलों का आरोप है कि यह विधेयक कथित तौर पर अल्पसंख्यकों को निशाना बनाता है। उनका कहना है कि इसके कुछ प्रावधान ईसाई NGO तथा अल्पसंख्यक समुदायों द्वारा संचालित सामाजिक कल्याण और शैक्षणिक संस्थाओं को मिलने वाली वैध विदेशी फंडिंग पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं।

सरकार ने इन आरोपों को खारिज किया है। सरकार का कहना है कि प्रस्तावित कानून किसी धर्म-विशेष से जुड़ा नहीं है और इसका उद्देश्य केवल विदेशी योगदान में पारदर्शिता सुनिश्चित करना और विदेशी फंड का सही उपयोग सुनिश्चित करना है। सरकार ने विदेशी योगदान के दुरुपयोग के उदाहरण के तौर पर जबरन धर्म-परिवर्तन की घटनाओं का उल्लेख किया है।

समिति की संरचना और कार्य-विस्तार

रिपोर्ट तैयार करने से पहले एफसीआरए कानून के प्रावधानों की विस्तृत समीक्षा के लिए BJP सांसद संजय जायसवाल की अध्यक्षता में 31 सदस्यों की यह समिति गठित की गई थी। गौरतलब है कि यह समिति एक ऐसे संवेदनशील कानून की समीक्षा कर रही है जो देश में कार्यरत हजारों NGO और सामाजिक संगठनों के वित्तपोषण को सीधे प्रभावित करती है।

क्या होगा आगे

अभी यह स्पष्ट नहीं है कि जेपीसी अध्यक्ष संजय जायसवाल सदस्यों की माँग स्वीकार करते हैं या नहीं। यदि बैठक स्थगित होती है तो हितधारकों के लिए सार्वजनिक टिप्पणी देने का दरवाजा लंबे समय तक खुला रहेगा, जो विधेयक की समीक्षा को और अधिक व्यापक बना सकता है। विधेयक पर जेपीसी की अंतिम रिपोर्ट संसद के अगले सत्र में पेश किए जाने की संभावना है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

एफसीआरए संशोधन विधेयक क्या है और यह विवादास्पद क्यों है?
एफसीआरए संशोधन विधेयक विदेशी अंशदान के उपयोग को विनियमित करने वाले मौजूदा कानून में बदलाव का प्रस्ताव करता है, जिसे 25 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश किया गया। विपक्ष का आरोप है कि इसके कुछ प्रावधान अल्पसंख्यक समुदायों के NGO और शैक्षणिक संस्थाओं की वैध विदेशी फंडिंग पर असर डाल सकते हैं, जबकि सरकार इसे पारदर्शिता बढ़ाने का कदम बताती है।
जेपीसी सदस्यों ने बैठक टालने की माँग क्यों की?
सदस्यों का कहना है कि विधेयक के व्यापक असर को देखते हुए इसके दस्तावेजों का गहन अध्ययन जरूरी है। उन्होंने हितधारकों को सार्वजनिक टिप्पणी देने का पर्याप्त अवसर देने के लिए भी कम से कम 4 सप्ताह की अतिरिक्त अवधि माँगी है।
एफसीआरए जेपीसी की अध्यक्षता कौन कर रहे हैं और इसमें कितने सदस्य हैं?
जेपीसी की अध्यक्षता BJP सांसद संजय जायसवाल कर रहे हैं और इसमें कुल 31 सदस्य हैं। यह समिति एफसीआरए कानून के प्रावधानों की विस्तृत समीक्षा के बाद संसद में रिपोर्ट पेश करेगी।
विधेयक के बारे में विपक्ष की मुख्य आपत्तियाँ क्या हैं?
विपक्षी दलों का आरोप है कि विधेयक के कुछ प्रावधान ईसाई NGO और अल्पसंख्यक समुदायों द्वारा संचालित संस्थाओं को मिलने वाली विदेशी फंडिंग को प्रभावित कर सकते हैं। यही कारण है कि 12 अगस्त को विपक्ष की माँग पर इसे जेपीसी के पास भेजा गया था।
सरकार का इस विधेयक पर क्या पक्ष है?
सरकार का कहना है कि यह विधेयक किसी धर्म या समुदाय-विशेष को लक्षित नहीं करता। इसका उद्देश्य विदेशी अंशदान में पारदर्शिता लाना और उसके दुरुपयोग को रोकना है। सरकार ने जबरन धर्म-परिवर्तन जैसी घटनाओं को विदेशी फंड के दुरुपयोग के उदाहरण के रूप में उद्धृत किया है।
राष्ट्र प्रेस
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