27 सितंबर 2026
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फॉर्म-6 में बदलाव गैरकानूनी, एसआईआर प्रक्रिया भी अवैध — कांग्रेस सांसद पवन खेड़ा का चुनाव आयोग पर बड़ा हमला

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फॉर्म-6 में बदलाव गैरकानूनी, एसआईआर प्रक्रिया भी अवैध — कांग्रेस सांसद पवन खेड़ा का चुनाव आयोग पर बड़ा हमला

सारांश

फॉर्म-6 में बदलाव और एसआईआर प्रक्रिया को गैरकानूनी करार देते हुए कांग्रेस के पवन खेड़ा ने चुनाव आयोग को कटघरे में खड़ा किया। गोवा में 97 मतदाताओं का मामला, बिहार-बंगाल के जनादेश पर सवाल, और एनडीए के भीतर भी उठती आवाज़ें बताती हैं कि यह विवाद अब बहुत बड़ा हो चुका है।

मुख्य बातें

कांग्रेस सांसद पवन खेड़ा ने 26 सितंबर 2026 को आरोप लगाया कि फॉर्म-6 में बदलाव संसदीय संशोधन के बिना किया गया, इसलिए यह गैरकानूनी है।
खेड़ा के अनुसार, अवैध फॉर्म-6 पर आधारित एसआईआर (SIR) प्रक्रिया भी कानूनी रूप से अमान्य है, जिससे बिहार और पश्चिम बंगाल के चुनावी जनादेश पर सवाल उठते हैं।
गोवा में 97 मतदाताओं के मामले में 82 को दबाव के बाद दुरुस्त किए जाने का हवाला देते हुए खेड़ा ने राष्ट्रव्यापी विसंगतियों की आशंका जताई।
ईसीआई-नेट के ज़रिए मतदाता सूची प्रबंधन के केंद्रीकरण और स्थानीय ईआरओ की भूमिका समाप्त होने पर पारदर्शिता को लेकर सवाल उठाए गए।
चिराग पासवान और चंद्रबाबू नायडू की पार्टी TDP से भी इस मुद्दे पर आवाज़ें उठने लगी हैं, जो विवाद को विपक्ष से परे ले जाती हैं।
कांग्रेस ने कहा कि वह देश की 60 प्रतिशत जनता का प्रतिनिधित्व करने वाले विपक्ष के रूप में यह अभियान जारी रखेगी।

कांग्रेस सांसद पवन खेड़ा ने 26 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में स्पष्ट रूप से आरोप लगाया कि फॉर्म-6 में किया गया बदलाव पूरी तरह गैरकानूनी है, क्योंकि इसके लिए संसद के माध्यम से संबंधित नियमों में संशोधन आवश्यक था जो कि नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि 23 सितंबर को सामने आए इस विवाद पर भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) ने अब तक मूल प्रश्न का कोई सीधा उत्तर नहीं दिया है।

मुख्य आरोप: फॉर्म-6 और एसआईआर प्रक्रिया पर कानूनी सवाल

पवन खेड़ा ने तर्क दिया कि फॉर्म-6 एक वैधानिक दस्तावेज़ है और इसमें किसी भी संशोधन के लिए संसद की स्वीकृति अनिवार्य है। उनके अनुसार, चूँकि यह संशोधन विधायी प्रक्रिया से नहीं गुज़रा, इसलिए विशेष सारांश पुनरीक्षण (SIR) की पूरी प्रक्रिया — यानी मतदाता सूची से नाम हटाने और जोड़ने की कार्रवाई — भी कानूनी रूप से अमान्य हो जाती है।

खेड़ा ने चेताया कि इसका सीधा असर बिहार और पश्चिम बंगाल के चुनावों पर पड़ता है। उनके शब्दों में, 'यदि फॉर्म-6 में बदलाव ही वैध नहीं था, तो उसके आधार पर हुई एसआईआर की प्रक्रिया भी गैरकानूनी है और वहाँ के जनादेश पर सवाल खड़े होते हैं।'

केंद्रीकरण पर आपत्ति: ईआरओ से ईसीआई-नेट तक

खेड़ा ने मतदाता सूची प्रबंधन के केंद्रीकरण पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि पहले स्थानीय निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) अपने क्षेत्र के मतदाताओं की स्थानीय जानकारी के आधार पर काम करते थे। अब ईसीआई-नेट के ज़रिए यह प्रक्रिया केंद्रीय स्तर पर होने से पारदर्शिता को लेकर गंभीर प्रश्न उठ रहे हैं।

उन्होंने निर्वाचन आयोग की नई समिति बनाने की घोषणा को अपर्याप्त बताया। खेड़ा के अनुसार, समिति में डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर, आईआईटी और आईआईएम के विशेषज्ञों को शामिल करने की बात भले ही कही जा रही हो, लेकिन 'इससे मूल समस्या का समाधान नहीं होगा।'

गोवा का मामला: देशभर में फैले विसंगतियों का संकेत

खेड़ा ने गोवा में 97 मतदाताओं से जुड़े मामले का हवाला दिया, जिनमें से कथित तौर पर 82 मामलों को दबाव के बाद दुरुस्त किया गया। उन्होंने सवाल उठाया कि जब गोवा जैसे छोटे राज्य में मीडिया की नज़र पड़ने पर इतने मामले सामने आए, तो देश के बाकी हिस्सों में मतदाता सूची से जुड़ी विसंगतियों की संख्या कितनी बड़ी हो सकती है। खेड़ा ने माँग की कि निर्वाचन आयोग इस पर विस्तृत सफाई दे।

युवा मतदाता और वीआईपी-नॉन-वीआईपी विभाजन पर एतराज

कांग्रेस सांसद ने चुनाव आयोग द्वारा कॉलेजों में काउंटर लगाने की व्यवस्था पर भी सवाल खड़े किए। उनके अनुसार, यदि यह सुविधा पहले से होती तो युवा मतदाताओं को कठिनाइयों का सामना नहीं करना पड़ता। उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी मतदाता को वीआईपी और नॉन-वीआईपी की श्रेणी में बाँटना 'संविधान की भावना के विरुद्ध' है।

विपक्ष का दायरा विस्तृत, एनडीए के भीतर भी उठी आवाज़ें

खेड़ा ने बताया कि यह मुद्दा अब केवल विपक्ष तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने कहा कि चिराग पासवान समेत कई नेताओं ने इस पर आवाज़ उठाई है और चंद्रबाबू नायडू की पार्टी तेलुगु देशम पार्टी (TDP) की ओर से भी सवाल उठने लगे हैं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी के हालिया एक्स पोस्ट के बाद पार्टी के अगले कदम पर उन्होंने कहा कि कांग्रेस पिछले दो वर्षों से 'वोट चोरी' का मुद्दा उठा रही है और आगे भी अपने कार्यक्रम के अनुसार अभियान जारी रखेगी। विपक्ष, जो देश की करीब 60 प्रतिशत जनता का प्रतिनिधित्व करता है, अपना दबाव बनाए रखेगा।

दिल्ली में प्रस्तावित इंडिया गठबंधन की बैठक के बारे में खेड़ा ने कहा कि इसकी जानकारी उचित समय पर दी जाएगी। गौरतलब है कि यह विवाद ऐसे समय में तेज हुआ है जब देश में कई महत्त्वपूर्ण राज्य चुनाव नज़दीक हैं और मतदाता सूची की विश्वसनीयता एक केंद्रीय राजनीतिक मुद्दा बन चुकी है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसका असली परीक्षण अदालत में होगा, न प्रेस कॉन्फ्रेंस में। चिंताजनक यह है कि चुनाव आयोग ने 23 सितंबर से अब तक मूल प्रश्न का सीधा जवाब नहीं दिया — यह चुप्पी विपक्ष के आरोपों को और पुष्टि देती है। गोवा के 97 मतदाताओं वाला मामला एक बड़े हिमखंड की नोक हो सकती है। जब चिराग पासवान और TDP जैसी सत्तारूढ़ गठबंधन की पार्टियाँ भी सवाल उठाने लगें, तो यह संकेत है कि मामला अब राजनीतिक ध्रुवीकरण से आगे जाकर संस्थागत विश्वसनीयता का प्रश्न बन चुका है।
RashtraPress
27 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

फॉर्म-6 में बदलाव को गैरकानूनी क्यों बताया जा रहा है?
कांग्रेस सांसद पवन खेड़ा के अनुसार, फॉर्म-6 एक वैधानिक दस्तावेज़ है और इसमें किसी भी बदलाव के लिए संसद के ज़रिए संबंधित नियमों में संशोधन अनिवार्य है। चूँकि ऐसा कोई संसदीय संशोधन नहीं हुआ, इसलिए 23 सितंबर 2026 को सामने आया यह बदलाव कानूनी रूप से अमान्य माना जा रहा है।
एसआईआर प्रक्रिया पर सवाल क्यों उठ रहे हैं?
खेड़ा का तर्क है कि चूँकि फॉर्म-6 में बदलाव ही अवैध था, इसलिए उसी आधार पर संचालित विशेष सारांश पुनरीक्षण (SIR) — यानी मतदाता सूची से नाम हटाने और जोड़ने की पूरी प्रक्रिया — भी कानूनी रूप से अमान्य हो जाती है। इसका सीधा असर बिहार और पश्चिम बंगाल के चुनावी परिणामों की वैधता पर पड़ता है।
गोवा के मतदाताओं वाला मामला क्या है?
गोवा में 97 मतदाताओं की जानकारी में त्रुटियाँ सामने आईं, जिनमें से कथित तौर पर 82 मामलों को दबाव के बाद सुधारा गया। खेड़ा ने सवाल उठाया कि यदि एक छोटे राज्य में मीडिया की नज़र पड़ने पर इतने मामले आए, तो देश के अन्य हिस्सों में ऐसी विसंगतियाँ कितनी बड़ी हो सकती हैं।
ईसीआई-नेट और ईआरओ के केंद्रीकरण पर क्या आपत्ति है?
पहले स्थानीय निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) अपने क्षेत्र की जानकारी के आधार पर मतदाता सूची का प्रबंधन करते थे। अब ईसीआई-नेट के ज़रिए यह प्रक्रिया केंद्रीय स्तर पर होने से स्थानीय जवाबदेही कम हो गई है और पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं।
क्या यह मुद्दा सिर्फ विपक्षी दलों तक सीमित है?
नहीं। खेड़ा के अनुसार चिराग पासवान और चंद्रबाबू नायडू की पार्टी TDP जैसे सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन के घटक दलों ने भी इस मुद्दे पर आवाज़ उठाई है। इससे यह विवाद विशुद्ध विपक्षी राजनीति से आगे जाकर व्यापक संस्थागत चिंता का विषय बन गया है।
राष्ट्र प्रेस
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