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एसआईआर में शुरू से गलतियाँ, चुनाव आयोग की साख दाँव पर: पूर्व CEC ओपी रावत

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एसआईआर में शुरू से गलतियाँ, चुनाव आयोग की साख दाँव पर: पूर्व CEC ओपी रावत

सारांश

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने खुलकर कहा कि एसआईआर में बिहार से ही गलतियाँ हुईं, पश्चिम बंगाल में 93% हटाए गए मतदाता योग्य निकले, और फॉर्म 6 में बदलाव गैर-कानूनी हैं। यह बयान चुनावी वैधता की बहस को नई धार देता है।

मुख्य बातें

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने 23 सितंबर 2026 को कहा कि एसआईआर प्रक्रिया में बिहार चुनाव के समय से ही गंभीर गलतियाँ हुई हैं।
अपीलेट ट्रिब्यूनल ने पश्चिम बंगाल मामले में फैसला दिया कि वोटर लिस्ट से हटाए गए 93 प्रतिशत मतदाता योग्य थे।
रावत ने फॉर्म 6 में किए गए बदलावों को 'पूरी तरह गलत और गैर-कानूनी' बताया।
रावत ने तीनों चुनाव आयुक्तों से मिलकर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर स्थिति स्पष्ट करने की अपील की।
पूर्व संयुक्त निदेशक डॉ.
मोहम्मद अमीन ने आयोग में मतभेद की बात को खारिज किया।

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने 23 सितंबर 2026 को भोपाल में कहा कि विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया में बिहार चुनाव के समय से ही गंभीर खामियाँ रही हैं, और हालिया विवादों ने चुनाव आयोग जैसी संस्था की विश्वसनीयता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। उन्होंने तीनों चुनाव आयुक्तों से मिलकर सार्वजनिक रूप से स्थिति स्पष्ट करने की अपील की।

मुख्य घटनाक्रम

रावत ने कहा, 'इस बारे में अलग-अलग राय हैं। सबसे अच्छा यही होगा कि तीनों साथ बैठें और प्रेस कॉन्फ्रेंस करके साफ करें कि मामला क्या था। अगर असहमति होती तो फैसला नहीं लिया जा सकता था, क्योंकि चुनाव आयोग का फैसला या तो आम सहमति से या बहुमत से ही लिया जा सकता है, किसी और तरह से नहीं।'

उन्होंने यह भी कहा कि 'यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। ऐसा कभी नहीं होना चाहिए, क्योंकि चुनाव आयोग एक ऐसी संस्था है, जिसकी दुनिया भर में यह प्रतिष्ठा है कि वह हमेशा निष्पक्ष चुनाव कराती है।'

एसआईआर प्रक्रिया में खामियाँ

रावत ने पश्चिम बंगाल के उस मामले का विशेष उल्लेख किया जिसमें अपीलेट ट्रिब्यूनल ने फैसला सुनाया कि वोटर लिस्ट से हटाए गए 93 प्रतिशत मतदाता वास्तव में योग्य थे और उन्हें सूची में वापस जोड़ा जाना चाहिए। उन्होंने इसे 'एक गंभीर गड़बड़ी' बताते हुए कहा कि इन लोगों को मतदान के अधिकार से वंचित रखा गया।

गौरतलब है कि एसआईआर प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर पहले भी विपक्षी दलों ने सवाल उठाए हैं, लेकिन किसी पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त का इस तरह खुलकर सामने आना संस्था के भीतर गहरी बेचैनी का संकेत देता है।

फॉर्म 6 में बदलाव पर आपत्ति

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ने वोटर रजिस्ट्रेशन के लिए अनिवार्य फॉर्म 6 में किए गए संशोधनों को 'पूरी तरह से गलत और गैर-कानूनी' करार दिया। उनके अनुसार ये बदलाव न केवल प्रक्रियागत दृष्टि से त्रुटिपूर्ण हैं, बल्कि कानूनी आधार पर भी खड़े नहीं उतरते।

चुनाव आयोग में मतभेद पर विरोधाभासी दृष्टिकोण

वहीं, चुनाव आयोग के पूर्व संयुक्त निदेशक एवं प्रोटोकॉल प्रमुख डॉ. मोहम्मद अमीन ने इस विवाद पर अलग राय रखी। उन्होंने कहा, 'चुनाव आयुक्तों के बीच कोई मतभेद नहीं है। वे हमेशा मिलकर काम करते हैं और एक-दूसरे का सहयोग करते हैं।'

डॉ. अमीन ने यह भी स्पष्ट किया कि ई-वोटर्स एवं वोटर लिस्ट से जुड़ी आपत्तियाँ सार्वजनिक नहीं की जातीं और सभी फैसले आंतरिक चर्चा के बाद लिए जाते हैं। एसआईआर में उपयोग किए जाने वाले सॉफ्टवेयर के बारे में उन्होंने बताया कि यह हमेशा दिल्ली से ही संचालित किया गया है और इसका उद्देश्य दोहरे नामांकन के मामलों की पहचान करना था।

आगे क्या होगा

यह ऐसे समय में आया है जब कई राज्यों में विधानसभा चुनावों की तैयारी चल रही है और मतदाता सूची की शुद्धता सीधे तौर पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया की निष्पक्षता से जुड़ी है। विशेषज्ञों का मानना है कि चुनाव आयोग को पारदर्शी तरीके से इन मुद्दों का समाधान करना होगा ताकि संस्था की साख बरकरार रहे।

संपादकीय दृष्टिकोण

महज आलोचना नहीं — यह संस्थागत विफलता की स्वीकृति है। पश्चिम बंगाल में 93% हटाए गए मतदाताओं का योग्य पाया जाना बताता है कि खामी तकनीकी नहीं, संरचनात्मक थी। मुख्यधारा की कवरेज इसे 'विवाद' के रूप में पेश करती है, लेकिन असली सवाल यह है कि लाखों वैध मतदाताओं के अधिकार छीने जाने की जवाबदेही कौन तय करेगा और फॉर्म 6 में 'गैर-कानूनी' बदलावों को किसकी मंजूरी से लागू किया गया।
RashtraPress
23 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

एसआईआर (विशेष गहन पुनरीक्षण) प्रक्रिया क्या है और इसमें क्या गड़बड़ी हुई?
एसआईआर मतदाता सूची को अद्यतन करने की एक विशेष प्रक्रिया है जिसमें अयोग्य या दोहरे नामों को हटाया जाता है। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत के अनुसार इस प्रक्रिया में बिहार चुनाव के समय से ही गंभीर गलतियाँ हुई हैं, जिनकी परिणति पश्चिम बंगाल में 93% योग्य मतदाताओं को सूची से हटाए जाने के रूप में सामने आई।
पश्चिम बंगाल में अपीलेट ट्रिब्यूनल ने क्या फैसला दिया?
अपीलेट ट्रिब्यूनल ने पश्चिम बंगाल के एक मामले में फैसला सुनाया कि एसआईआर प्रक्रिया के तहत वोटर लिस्ट से हटाए गए 93 प्रतिशत मतदाता वास्तव में योग्य थे और उन्हें सूची में वापस जोड़ा जाना चाहिए। ओपी रावत ने इसे 'एक गंभीर गड़बड़ी' बताते हुए कहा कि इन मतदाताओं को मताधिकार से वंचित रखा गया।
फॉर्म 6 में क्या बदलाव किए गए और ओपी रावत ने उन्हें गैर-कानूनी क्यों बताया?
फॉर्म 6 वोटर रजिस्ट्रेशन के लिए अनिवार्य दस्तावेज है। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने इसमें किए गए संशोधनों को 'पूरी तरह गलत और गैर-कानूनी' करार दिया। हालाँकि उन्होंने विशिष्ट धाराओं का उल्लेख नहीं किया, उनका तर्क था कि ये बदलाव कानूनी प्रावधानों के अनुरूप नहीं हैं।
चुनाव आयोग के भीतर मतभेदों को लेकर अलग-अलग राय क्यों हैं?
ओपी रावत ने चुनाव आयोग के भीतर मतभेदों को 'बहुत गंभीर और दुर्भाग्यपूर्ण' बताया और तीनों आयुक्तों से प्रेस कॉन्फ्रेंस कर स्थिति स्पष्ट करने की अपील की। दूसरी ओर, पूर्व संयुक्त निदेशक डॉ. मोहम्मद अमीन ने इन मतभेदों को खारिज करते हुए कहा कि सभी फैसले सामूहिक चर्चा के बाद लिए जाते हैं।
इस विवाद का आम मतदाताओं पर क्या असर पड़ सकता है?
यदि एसआईआर प्रक्रिया में गड़बड़ियाँ सुधारी नहीं गईं तो आगामी विधानसभा चुनावों में लाखों योग्य मतदाता मतदान से वंचित रह सकते हैं। अपीलेट ट्रिब्यूनल का पश्चिम बंगाल फैसला एक मिसाल है, लेकिन हर पीड़ित मतदाता के पास ट्रिब्यूनल तक पहुँचने के साधन नहीं होते।
राष्ट्र प्रेस
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