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एसआईआर विवाद: पूर्व CEC ओपी रावत बोले — 'मताधिकार छिनना लोकतंत्र के लिए शर्म की बात'

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एसआईआर विवाद: पूर्व CEC ओपी रावत बोले — 'मताधिकार छिनना लोकतंत्र के लिए शर्म की बात'

सारांश

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने एसआईआर को 'राजनीतिक नहीं' बताते हुए भी माना कि इसने लाखों नागरिकों का मताधिकार छीना — यह स्वीकारोक्ति किसी पूर्व CEC की ओर से बड़ी बात है। साथ ही कांग्रेस ने मुख्य चुनाव आयुक्त का इस्तीफा माँगकर विवाद को संवैधानिक संकट का रंग दे दिया है।

मुख्य बातें

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने 27 सितंबर 2026 को भोपाल में कहा कि एसआईआर प्रक्रिया से बड़ी संख्या में नागरिक मताधिकार से वंचित हुए।
रावत ने पश्चिम बंगाल में अपील पर आए न्यायिक फैसले को प्रमाण के रूप में उद्धृत किया।
उन्होंने स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग के फैसले सर्वसम्मति या बहुमत से होते हैं — अकेले मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार एकतरफा निर्णय नहीं ले सकते।
कांग्रेस विधायक अमीन पटेल ने मुंबई में मुख्य चुनाव आयुक्त का तत्काल इस्तीफा माँगा और एसआईआर को संविधान पर 'सीधा हमला' बताया।
पटेल ने महाराष्ट्र सूखा प्रभावित किसानों के लिए तत्काल राहत पैकेज की माँग भी उठाई।

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने 27 सितंबर 2026 को भोपाल में मीडिया से बातचीत के दौरान विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया पर गहरी चिंता जताते हुए कहा कि इस प्रक्रिया के कारण बड़ी संख्या में आम नागरिक अपने मताधिकार से वंचित हो गए, जो किसी भी लोकतंत्र के लिए गहरी शर्म की बात है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह मामला राजनीतिक प्रेरणा से नहीं, बल्कि नागरिकों के मूलभूत संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा है।

मुख्य घटनाक्रम

रावत ने कहा कि बिहार से लेकर अब तक एसआईआर की प्रक्रिया ने आम जनता को अनेक कठिनाइयों में डाला है। उन्होंने पश्चिम बंगाल में अपील पर आए न्यायिक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि इससे यह प्रमाणित होता है कि मतदाता सूची पुनरीक्षण की इस प्रक्रिया में भारी चूक हुई और बड़ी संख्या में नागरिक वोट देने के अधिकार से वंचित रह गए।

उन्होंने कहा, 'किसी भी लोकतंत्र के लिए इससे बड़ी शर्म की बात क्या हो सकती है कि आपकी प्रक्रिया के कारण लोगों को वोट देने से रोक दिया जाए?' यह ऐसे समय में आया है जब एसआईआर की संवैधानिक वैधता को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों और नागरिक समाज में बहस तेज हो गई है।

चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल

रावत ने चुनाव आयोग की निर्णय-प्रक्रिया पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उनके अनुसार, आयोग के फैसले सर्वसम्मति या बहुमत के आधार पर लिए जाते हैं। यदि किसी मामले में बहुमत किसी एक पक्ष के साथ होता, तो अकेले मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार कोई स्वतंत्र निर्णय नहीं ले सकते थे — ऐसी स्थिति में आयोग के अन्य सदस्यों का मत भी समान रूप से मान्य होता।

गौरतलब है कि यह पहला अवसर नहीं है जब किसी पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ने एसआईआर की कार्यप्रणाली पर सार्वजनिक रूप से आपत्ति दर्ज कराई हो। इससे पहले भी कई संवैधानिक विशेषज्ञों ने मतदाता सूची शुद्धिकरण की प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी पर चिंता व्यक्त की है।

कांग्रेस विधायक अमीन पटेल के गंभीर आरोप

मुंबई में कांग्रेस विधायक अमीन पटेल ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और एसआईआर को लेकर चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए। पटेल ने आरोप लगाया कि इस पूरे मामले में सच्चाई छिपाने की कोशिश की जा रही है और मुख्य चुनाव आयुक्त को तत्काल इस्तीफा देना चाहिए।

पटेल ने कहा कि एसआईआर के तहत नागरिकों के नाम मतदाता सूची से हटाना और उन्हें मतदान के अधिकार से वंचित करना 'संविधान पर सीधा हमला' है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह केवल कांग्रेस या इंडी गठबंधन का मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे देश की चिंता का विषय है।

महाराष्ट्र सूखे पर भी उठाई आवाज़

पटेल ने महाराष्ट्र में सूखे की गंभीर स्थिति का भी उल्लेख किया और राज्य सरकार से तत्काल राहत पैकेज घोषित करने की माँग की। उन्होंने कहा कि महज़ राहत की घोषणा पर्याप्त नहीं है — यह सुनिश्चित करना भी ज़रूरी है कि सहायता वास्तव में प्रभावित किसानों तक पहुँचे। पटेल ने किसान आत्महत्याओं का मुद्दा उठाते हुए सूखा प्रभावित क्षेत्रों में युद्धस्तर पर राहत पहुँचाने की अपील की।

आगे क्या होगा

एसआईआर विवाद अब केवल चुनाव आयोग की प्रशासनिक प्रक्रिया का मामला नहीं रहा — यह संवैधानिक अधिकारों और चुनावी पारदर्शिता की बड़ी बहस बन चुका है। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जैसे संवैधानिक पदों पर रहे व्यक्तियों की टिप्पणियाँ इस विवाद को और अधिक वज़न देती हैं। आने वाले दिनों में सर्वोच्च न्यायालय में लंबित याचिकाओं और विभिन्न उच्च न्यायालयों में सुनवाई से इस मामले की दिशा स्पष्ट होने की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बाहर आ रही है। रावत ने मामले को 'राजनीतिक नहीं' कहा, लेकिन स्वीकारा कि प्रक्रिया ने नागरिकों का मताधिकार छीना — यह अपने आप में एक बड़ी स्वीकारोक्ति है जिसे मुख्यधारा की कवरेज पर्याप्त महत्व नहीं दे रही। असली सवाल यह है कि मतदाता सूची शुद्धिकरण की जल्दबाज़ी में किन समुदायों को सबसे अधिक नुकसान हुआ और क्या इसकी कोई जवाबदेही तय होगी। न्यायपालिका की सक्रियता — खासकर पश्चिम बंगाल का फैसला — इकलौती उम्मीद की किरण है, लेकिन तब तक जो मताधिकार छिन गया, वह लौटाया नहीं जा सकता।
RashtraPress
27 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

एसआईआर (विशेष गहन पुनरीक्षण) क्या है और इसे लेकर विवाद क्यों है?
एसआईआर यानी विशेष गहन पुनरीक्षण चुनाव आयोग की वह प्रक्रिया है जिसके तहत मतदाता सूचियों की जाँच और अद्यतन की जाती है। विवाद इसलिए है क्योंकि पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत समेत कई संवैधानिक विशेषज्ञों ने माना है कि इस प्रक्रिया में बड़ी संख्या में पात्र नागरिकों के नाम सूची से हट गए और वे मतदान से वंचित रह गए।
ओपी रावत ने एसआईआर पर क्या कहा?
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने 27 सितंबर 2026 को भोपाल में कहा कि एसआईआर की प्रक्रिया के कारण बिहार से लेकर अन्य राज्यों तक आम नागरिकों को मताधिकार से वंचित होना पड़ा, जो किसी भी लोकतंत्र के लिए शर्मनाक है। उन्होंने पश्चिम बंगाल में अपील पर आए न्यायिक फैसले को इसका प्रमाण बताया।
कांग्रेस ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा क्यों माँगा?
मुंबई में कांग्रेस विधायक अमीन पटेल ने आरोप लगाया कि एसआईआर के तहत नागरिकों के नाम मतदाता सूची से हटाना संविधान पर सीधा हमला है और इस पूरे मामले में सच्चाई छिपाने की कोशिश हो रही है। इसी आधार पर उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का तत्काल इस्तीफा माँगा।
चुनाव आयोग में निर्णय-प्रक्रिया कैसे काम करती है?
ओपी रावत के अनुसार चुनाव आयोग के फैसले सर्वसम्मति या बहुमत के आधार पर होते हैं। अकेले मुख्य चुनाव आयुक्त किसी मामले में एकतरफा निर्णय नहीं ले सकते — अन्य आयुक्त सदस्यों का मत भी समान रूप से मान्य होता है।
महाराष्ट्र सूखे पर अमीन पटेल ने क्या माँग की?
कांग्रेस विधायक अमीन पटेल ने महाराष्ट्र सरकार से तत्काल राहत पैकेज घोषित करने और यह सुनिश्चित करने की माँग की कि सहायता वास्तव में सूखा प्रभावित किसानों तक पहुँचे। उन्होंने किसान आत्महत्याओं का मुद्दा भी उठाया और युद्धस्तर पर राहत पहुँचाने की अपील की।
राष्ट्र प्रेस
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