चुनाव आयोग के हलफनामे का स्वागत करें: पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत
सारांश
मुख्य बातें
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने 27 अक्टूबर 2026 को भोपाल में कहा कि सर्वोच्च न्यायालय में चुनाव आयोग की ओर से एसआईआर (विशेष गहन पुनरीक्षण) और फॉर्म-6 को लेकर दाखिल किए गए हलफनामे का स्वागत होना चाहिए। उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने 5 अक्टूबर को आयोग से संबंधित फैसलों और उनकी प्रक्रिया से जुड़े सभी तथ्य माँगे थे, और ऐसे में हलफनामा दाखिल करना एक सकारात्मक कदम है।
हलफनामे की मुख्य बातें
रावत ने बताया कि फॉर्म-6 को लेकर आम लोगों के बीच कई तरह की भ्रांतियाँ थीं। चुनाव आयोग ने अपने हलफनामे में स्पष्ट किया है कि नामांकन की प्रक्रिया में कोई बदलाव नहीं किया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि कानून के अनुसार आयोग अपने फैसले सर्वसम्मति या बहुमत के आधार पर ले सकता है।
हलफनामे से यह स्पष्ट होता है कि एसआईआर से जुड़े फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे। हालाँकि, इस पूरे मामले में 14 आपत्तियाँ दर्ज होने की बात भी सामने आई है, जो विवाद का एक बिंदु बनी हुई है।
पुराने विवादों का संदर्भ
रावत ने एक निजी समाचार पत्र में 23 सितंबर को प्रकाशित खबरों का उल्लेख करते हुए कहा कि उनमें चुनाव आयोग के दो आयुक्तों द्वारा कई आपत्तियाँ दर्ज कराने और कैबिनेट सचिव को पत्र लिखने जैसे दावे किए गए थे। साथ ही, करीब 10 महीने तक आंतरिक बैठक न होने का भी आरोप लगाया गया था।
उन्होंने कहा कि जब तक हलफनामे का पूरा विवरण सार्वजनिक नहीं हो जाता, इन दावों पर कोई निश्चित राय देना उचित नहीं होगा।
बीएलओ की एफआईआर — संस्थागत विश्वास पर सवाल
रावत ने बूथ लेवल अधिकारियों (बीएलओ) से जुड़े एक गंभीर मामले पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि परंपरागत रूप से बीएलओ और चुनाव आयोग के कर्मचारी किसी गड़बड़ी की जानकारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों को देते हैं, लेकिन अब कुछ मामलों में कर्मचारी सीधे पुलिस में शिकायत दर्ज करा रहे हैं।
प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार, ओडिशा के धामपुर में 10 बीएलओ ने एफआईआर दर्ज कराई है। उनका आरोप है कि उनके ही वरिष्ठ अधिकारियों ने उनके पहचान पत्रों और ओटीपी का उपयोग करके कई मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए।
रावत की चेतावनी और आगे का रास्ता
रावत ने इस स्थिति को बेहद चिंताजनक बताया। उन्होंने कहा कि यदि इस तरह की घटनाएँ एक-दो जगहों से भी सामने आ रही हैं, तो यह दर्शाता है कि बीएलओ के बीच यह भरोसा कमज़ोर हो रहा है कि विभाग के भीतर उनकी शिकायतों को गंभीरता से सुना जाएगा।
उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि चुनाव आयोग को इस मामले की गंभीरता से जाँच करनी चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता और कर्मचारियों का संस्थागत व्यवस्था पर विश्वास बना रहे। यह मामला आने वाले समय में चुनाव आयोग की आंतरिक जवाबदेही की कसौटी बनेगा।