13 अक्टूबर 2026
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यूपी चुनाव आयोग का खंडन: 85,854 फॉर्म-7 स्वतः तैयार कर नाम हटाने का दावा भ्रामक

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यूपी चुनाव आयोग का खंडन: 85,854 फॉर्म-7 स्वतः तैयार कर नाम हटाने का दावा भ्रामक

सारांश

यूपी चुनाव आयोग ने 85,854 फॉर्म-7 स्वतः बनाकर मतदाता नाम हटाने के दावे को भ्रामक करार दिया है। लेकिन सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के फर्जी वोट और भेदभावपूर्ण प्रक्रिया के आरोप 2027 विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।

मुख्य बातें

उत्तर प्रदेश मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने 13 अक्टूबर 2026 को 85,854 फॉर्म-7 स्वतः तैयार कर नाम हटाने के दावे को भ्रामक बताया।
आयोग के अनुसार सभी मामलों में नोटिस, सुनवाई, जाँच और आदेश की निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया गया।
6 मार्च के बाद लंबित मामलों का निस्तारण भी नियमानुसार होने का दावा।
सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने आयोग की कार्यप्रणाली को भेदभावपूर्ण बताते हुए लाखों फर्जी वोट दर्ज होने का आरोप लगाया।
यादव का दावा — कई विधानसभा क्षेत्रों में एक व्यक्ति के नाम पर दो से दस तक प्रविष्टियाँ मतदाता सूची में हैं।

उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने 13 अक्टूबर 2026 को स्पष्ट किया कि विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान 85,854 फॉर्म-7 स्वतः तैयार कर बिना किसी कारण मतदाताओं के नाम हटाए जाने का दावा पूरी तरह भ्रामक है। आयोग के अनुसार, संबंधित सभी मामलों में निर्धारित प्रक्रिया — नोटिस, सुनवाई, जाँच और आदेश — के बाद ही कार्रवाई की गई।

आयोग का आधिकारिक स्पष्टीकरण

मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने सोशल मीडिया मंच एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर अपना पक्ष रखते हुए कहा, 'यूपी एसआईआर में 85,854 फॉर्म-7 स्वतः बनाकर बिना कारण मतदाताओं के नाम हटाने का दावा भ्रामक है। संबंधित मामलों में नोटिस, सुनवाई, जाँच और आदेश के बाद कार्रवाई हुई। 6 मार्च के बाद लंबित मामलों पर निर्णय भी नियमानुसार हुए। सही जानकारी के लिए आधिकारिक स्रोतों पर भरोसा करें।' आयोग ने आम जनता से अपील की कि वे अफवाहों पर ध्यान न दें और केवल आधिकारिक माध्यमों से जानकारी प्राप्त करें।

अखिलेश यादव के आरोप और सपा का रुख

समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को भेदभावपूर्ण बताते हुए एसआईआर प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका दावा है कि उत्तर प्रदेश में एसआईआर को व्यावहारिक रूप से शून्य कर दिया गया और अब दोबारा मतदाता बनाने का अभियान शुरू किया जा रहा है।

यादव के अनुसार, इस पूरी प्रक्रिया पर करोड़ों रुपये खर्च हुए, व्यापक प्रचार किया गया और पूरा प्रशासनिक तंत्र लगाया गया — और अब उसे निष्फल कर दिया गया है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि मतदाता सूची में लाखों फर्जी वोट जुड़ गए हैं और कई विधानसभा क्षेत्रों में एक ही व्यक्ति के नाम पर दो से दस तक प्रविष्टियाँ दर्ज हैं।

एसआईआर प्रक्रिया की पृष्ठभूमि

गौरतलब है कि विशेष गहन पुनरीक्षण मतदाता सूचियों को अद्यतन और त्रुटिमुक्त बनाने के लिए चुनाव आयोग द्वारा समय-समय पर चलाई जाने वाली प्रक्रिया है। इस दौरान मृत, स्थानांतरित या अपात्र मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जाते हैं। यह ऐसे समय में आया है जब उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनावों की तैयारियाँ तेज़ होने लगी हैं और विपक्षी दल मतदाता सूची की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने लगे हैं।

आलोचकों का कहना है कि फॉर्म-7 की बड़ी संख्या और उसके स्वचालित निर्माण की प्रक्रिया को लेकर पारदर्शिता की आवश्यकता है, जबकि आयोग का तर्क है कि हर मामले में विधिसम्मत प्रक्रिया का पालन किया गया।

विशेषज्ञ क्या कहते हैं

चुनाव प्रक्रिया के जानकारों का मानना है कि मतदाता सूची पुनरीक्षण में पारदर्शिता और जनभागीदारी दोनों ज़रूरी हैं। यदि किसी मतदाता का नाम गलत तरीके से हटाया गया हो, तो उसे सूचित करने और अपील का अधिकार मिलना चाहिए। इस विवाद ने एक बार फिर मतदाता सूची प्रबंधन में डिजिटल पारदर्शिता की माँग को सामने ला दिया है।

आगे क्या होगा

आयोग के स्पष्टीकरण के बाद भी विपक्ष की आपत्तियाँ कम होती नहीं दिख रहीं। अखिलेश यादव ने चुनाव आयोग से अपनी विश्वसनीयता साबित करने और निष्पक्ष रूप से कार्य करने की माँग दोहराई है। अब देखना होगा कि क्या आयोग इस विवाद को सुलझाने के लिए कोई अतिरिक्त कदम उठाता है, या यह मसला न्यायिक मंच तक पहुँचता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि 2027 विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची की विश्वसनीयता का है। चुनाव आयोग का 'नियमानुसार प्रक्रिया' का तर्क तब तक अधूरा लगता है, जब तक वह फॉर्म-7 के प्रत्येक मामले का जिलावार डेटा सार्वजनिक न करे। दूसरी ओर, सपा के फर्जी मतदाता वाले दावों की स्वतंत्र जाँच भी ज़रूरी है — क्योंकि बिना सत्यापन के दोनों पक्षों के बयान राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप बनकर रह जाते हैं। असली ज़रूरत यह है कि आयोग एक पारदर्शी, सार्वजनिक डैशबोर्ड बनाए जहाँ कोई भी नागरिक अपनी मतदाता प्रविष्टि की स्थिति जाँच सके।
RashtraPress
13 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

85,854 फॉर्म-7 का मामला क्या है?
फॉर्म-7 वह दस्तावेज़ है जिसके ज़रिये किसी मतदाता का नाम सूची से हटाया जाता है। यूपी एसआईआर के दौरान 85,854 ऐसे फॉर्म तैयार होने के दावे पर विवाद उठा था। चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि यह प्रक्रिया नोटिस, सुनवाई और जाँच के बाद ही पूरी की गई।
विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) क्या होता है?
एसआईआर चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूचियों को अद्यतन और सटीक बनाने के लिए चलाई जाने वाली विशेष प्रक्रिया है, जिसमें मृत, स्थानांतरित या अपात्र मतदाताओं के नाम हटाए जाते हैं और नए पात्र नागरिकों को जोड़ा जाता है। यह प्रक्रिया चुनाव से पहले नियमित अंतराल पर की जाती है।
अखिलेश यादव ने चुनाव आयोग पर क्या आरोप लगाए?
सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने आरोप लगाया कि एसआईआर प्रक्रिया भेदभावपूर्ण रही और मतदाता सूची में लाखों फर्जी वोट दर्ज हो गए। उन्होंने यह भी दावा किया कि कई क्षेत्रों में एक व्यक्ति के नाम पर दो से दस तक प्रविष्टियाँ हैं।
चुनाव आयोग ने दावों का जवाब कैसे दिया?
मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने एक्स पर पोस्ट के ज़रिये स्पष्ट किया कि सभी फॉर्म-7 मामलों में विधिसम्मत प्रक्रिया अपनाई गई और 6 मार्च के बाद के लंबित मामलों का निस्तारण भी नियमों के अनुसार हुआ। आयोग ने जनता से आधिकारिक स्रोतों पर भरोसा करने की अपील की।
यह विवाद आगे कहाँ जा सकता है?
विपक्ष की आपत्तियों और आयोग के खंडन के बीच यह मामला न्यायिक मंच तक पहुँच सकता है। 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची की निष्पक्षता एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकती है।
राष्ट्र प्रेस
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