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एसआईआर पर विपक्ष के आरोपों पर ओपी राजभर का पलटवार: 'जनता वोट नहीं दे रही, इसलिए आयोग पर निशाना'

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एसआईआर पर विपक्ष के आरोपों पर ओपी राजभर का पलटवार: 'जनता वोट नहीं दे रही, इसलिए आयोग पर निशाना'

सारांश

2027 के यूपी चुनाव से पहले एसआईआर विवाद तेज — ओपी राजभर का दो टूक जवाब: जनता ने अखिलेश और राहुल को नकारा है, इसलिए वे चुनाव आयोग पर निशाना साध रहे हैं। अपनी विधानसभा में 16,000 मृतक नामों का हवाला देकर राजभर ने आयोग की प्रक्रिया को पूरी तरह वैध ठहराया।

मुख्य बातें

ओपी राजभर ने 27 सितंबर 2026 को लखनऊ में एसआईआर पर विपक्ष के आरोपों को निराधार बताया।
राजभर के अनुसार एसआईआर 1952 से चली आ रही प्रक्रिया है; उनकी अपनी विधानसभा में 16,000 मृतक मतदाताओं के नाम हटाए गए।
अखिलेश यादव पर आरोप — 2017 , 2019 और 2022 में हारे; 2027 में भी हारेंगे।
राजभर ने यादव समाज में विभाजन का दावा किया — एक वर्ग कथित तौर पर प्रधानमंत्री मोदी के साथ।
चुनाव आयोग पर सवाल उठाना भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि को नुकसान पहुँचाना — राजभर ने अखिलेश यादव और राहुल गांधी से माफी माँगने की माँग की।

योगी सरकार के मंत्री और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर ने 27 सितंबर 2026 को लखनऊ में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पर विपक्ष के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर कड़ा प्रहार किया। राजभर ने कहा कि जब जनता ने इन दलों को वोट देना बंद कर दिया है, तब ये नेता संवैधानिक संस्थाओं पर निराधार आरोप लगा रहे हैं।

एसआईआर पर राजभर का पक्ष

राजभर ने स्पष्ट किया कि एसआईआर कोई नई या असाधारण प्रक्रिया नहीं है। उन्होंने कहा, 'एसआईआर का काम 1952 से हो रहा है — 1965, 1966 और 2003 में भी हुआ था। मतदाता सूची में जो मृतक हैं उनके नाम हटाए जा रहे हैं और जिन्होंने कई जगह नाम दर्ज करा रखे हैं, उनका नाम एक ही स्थान पर रखा जा रहा है।' उन्होंने यह भी बताया कि चुनाव आयोग ने नाम जुड़वाने के लिए फॉर्म 6 और नाम कटवाने के लिए फॉर्म 7 का विकल्प सबके लिए खुला रखा है।

राजभर ने अपनी खुद की विधानसभा का हवाला देते हुए कहा कि वहाँ 16,000 मतदाता मृतक पाए गए और उनके नाम सूची से हटाए गए। उन्होंने अनुमान लगाया कि उत्तर प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों में यह संख्या कहीं 10,000, कहीं 12,000 और कहीं 20,000 तक है।

अखिलेश यादव की चुनावी हार और राजभर का तंज

राजभर ने अखिलेश यादव की लगातार चुनावी पराजयों को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि अखिलेश 2017 का विधानसभा चुनाव, 2019 का लोकसभा चुनाव और 2022 का चुनाव भी हारे, और उनके अनुसार वे 2027 का चुनाव भी हारेंगे। राजभर का आरोप था कि अखिलेश यादव की सरकार में उन्होंने अपनी जाति को ही सरकारी विभागों, थानों, तहसीलों और ब्लॉकों में तरजीह दी, जिससे नाई, पाल, प्रजापति, बिंद, निषाद, केवट, कश्यप, राजभर, चौहान, चौरसिया और जुलाहा जैसी तमाम बिरादरियाँ उनसे दूर हो गई हैं।

यादव समाज में बिखराव का दावा

राजभर ने यादव समाज में विभाजन का उल्लेख करते हुए कहा कि अब दो तरह के यादव हैं — एक वे जो संपन्न हैं और अखिलेश के साथ हैं, और दूसरे वे जो गाय-भैंस रखकर दूध बेचते हैं और अपने बच्चों को पढ़ाते हैं। उनके अनुसार, यह दूसरा वर्ग अब अखिलेश को छोड़कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ जा चुका है।

विपक्ष पर देश की छवि बिगाड़ने का आरोप

राजभर ने विपक्षी नेताओं पर संवैधानिक संस्था — चुनाव आयोग — के खिलाफ बोलकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की छवि खराब करने का गंभीर आरोप लगाया। उन्होंने माँग की कि अखिलेश यादव और राहुल गांधी जनता से माफी माँगें। उन्होंने विपक्ष पर तंज कसते हुए कहा कि पहले ये मृतक और फर्जी मतदाताओं का उपयोग करते थे, अब जब वे सूची से हट गए हैं तो घबराहट हो रही है। गौरतलब है कि यह बयान ऐसे समय में आया है जब 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले एसआईआर को लेकर सियासी तापमान लगातार बढ़ रहा है।

राजनीतिक संदर्भ और आगे का रुख

यह ऐसे समय में आया है जब इंडिया गठबंधन के तहत सपा और कांग्रेस की बीच गठबंधन की बातचीत चल रही है। राजभर ने सुझाया कि अखिलेश को पहले राहुल गांधी से पूछना चाहिए कि उनके कार्यकाल में एसआईआर कैसे कराया गया था, कितने नाम जोड़े और घटाए गए। चुनाव आयोग ने इस प्रक्रिया को लेकर पहले ही प्रेस कॉन्फ्रेंस कर पारदर्शिता का हवाला दिया है। आने वाले हफ्तों में एसआईआर की अंतिम रिपोर्ट सार्वजनिक होने के बाद यह राजनीतिक विवाद और तेज होने की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि एसआईआर में नाम हटाने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी और सत्यापन-योग्य है — क्योंकि दोनों पक्ष आँकड़े अपने पक्ष में परोस रहे हैं। विपक्ष के आरोपों को 'चुनावी हार का बहाना' कहकर खारिज करना राजनीतिक रूप से सुविधाजनक है, पर इससे यह जायज़ प्रश्न नहीं दब जाता कि 403 सीटों पर लाखों नाम हटाने का असर किन समुदायों पर ज़्यादा पड़ा। चुनाव आयोग ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की, पर स्वतंत्र ऑडिट और जाति-वार डेटा सार्वजनिक नहीं हुआ — यही रिक्तता दोनों पक्षों को अपनी-अपनी कहानी गढ़ने का मौका दे रही है।
RashtraPress
27 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) क्या है?
एसआईआर चुनाव आयोग की एक नियमित प्रक्रिया है जिसमें मतदाता सूची से मृतक, स्थानांतरित और डुप्लिकेट नाम हटाए जाते हैं और नए पात्र मतदाता जोड़े जाते हैं। ओपी राजभर के अनुसार यह प्रक्रिया 1952 से चली आ रही है और 2003 में भी हुई थी।
ओपी राजभर ने अखिलेश यादव पर क्या आरोप लगाए?
राजभर ने आरोप लगाया कि अखिलेश यादव की सरकार में सरकारी विभागों, थानों और तहसीलों में केवल एक जाति विशेष को बढ़ावा दिया गया, जिससे बाकी पिछड़ी जातियाँ उनसे दूर हो गईं। उन्होंने यह भी कहा कि अखिलेश 2017, 2019 और 2022 के बाद 2027 का चुनाव भी हारेंगे।
राजभर ने अपनी विधानसभा का उदाहरण क्यों दिया?
राजभर ने बताया कि उनकी खुद की विधानसभा में 16,000 मृतक मतदाताओं के नाम सूची में थे जो हटाए गए। इससे उन्होंने यह साबित करने की कोशिश की कि एसआईआर भेदभावपूर्ण नहीं, बल्कि एक ज़रूरी सफाई अभियान है।
क्या विपक्ष के आरोप पूरी तरह निराधार हैं?
राजभर ने विपक्षी आरोपों को निराधार बताया और कहा कि चुनाव आयोग ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के ज़रिये अपनी प्रक्रिया स्पष्ट की है। हालाँकि विपक्ष की माँग है कि एसआईआर का जाति-वार और क्षेत्र-वार स्वतंत्र सत्यापन हो, जिस पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।
2027 के यूपी चुनाव पर इस विवाद का क्या असर पड़ सकता है?
2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले एसआईआर पर यह बहस सत्तारूढ़ गठबंधन और विपक्षी इंडिया गठबंधन के बीच सबसे गर्म राजनीतिक मुद्दों में से एक बन रही है। मतदाता सूची की विश्वसनीयता पर जनता का भरोसा मतदान प्रतिशत और चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकता है।
राष्ट्र प्रेस
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