28 सितंबर 2026
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यूपी एसआईआर विवाद: भाजपा का पलटवार — '2022 की हार नहीं भूले अखिलेश यादव'

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यूपी एसआईआर विवाद: भाजपा का पलटवार — '2022 की हार नहीं भूले अखिलेश यादव'

सारांश

उत्तर प्रदेश में एसआईआर विवाद सिर्फ मतदाता सूची का मामला नहीं रहा — यह अगले विधानसभा चुनाव से पहले सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच जमीन तैयार करने की लड़ाई बन गया है। भाजपा का संदेश साफ है: 2022 की हार को पचा नहीं पाई सपा, इसीलिए संस्थाओं पर सवाल उठा रही है।

मुख्य बातें

यूपी में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर सत्तापक्ष और सपा के बीच राजनीतिक टकराव 27 सितंबर 2026 को तेज हुआ।
कैबिनेट मंत्री अनिल राजभर ने कहा — सपा ने 2022 की हार अभी तक स्वीकार नहीं की, इसीलिए लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं पर सवाल उठाती है।
भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष कृष्ण बिहारी राय ने सपा पर 'अराजक तत्वों' का आरोप लगाया, 2017 के जनादेश का हवाला दिया।
मंत्री संजय निषाद ने चुनाव आयोग (ECI) को संवैधानिक संस्था बताते हुए कहा — विपक्ष ठोस प्रमाण के बिना सवाल न उठाए।
पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बंगाल और बिहार में दोबारा विधानसभा चुनाव कराने की माँग की और भाजपा पर 'वोट घोटाले' का आरोप लगाया।

उत्तर प्रदेश में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर राजनीतिक तनाव 27 सितंबर 2026 को और तेज हो गया, जब भाजपा मंत्रियों और पार्टी नेताओं ने समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव की एसआईआर-संबंधी टिप्पणियों पर जोरदार पलटवार किया। लखनऊ, वाराणसी और गाजीपुर से एक साथ आई प्रतिक्रियाओं में भाजपा ने आरोप लगाया कि सपा संवैधानिक और लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर बिना ठोस प्रमाण के सवाल उठा रही है।

वाराणसी से मंत्री अनिल राजभर का पलटवार

वाराणसी में यूपी सरकार के कैबिनेट मंत्री अनिल राजभर ने कहा कि समाजवादी पार्टी और उनके राष्ट्रीय अध्यक्ष अभी तक वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में मिली हार को मन से स्वीकार नहीं कर पाए हैं। उनके अनुसार, चुनावी पराजय के बाद संवैधानिक और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं पर सवाल उठाना सपा की एक स्थायी आदत बन गई है।

राजभर ने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए कहा कि 1952, 1957, 1961, 1965 और 2003 में जब अलग-अलग सरकारें सत्ता में थीं, तब भी मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रियाएँ हुई थीं। उनका कहना था कि चुनावी प्रक्रिया से जुड़े विषयों पर राजनीतिक आरोप लगाने के बजाय तथ्यों के आधार पर बात होनी चाहिए।

गाजीपुर में भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष की आलोचना

गाजीपुर में भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष कृष्ण बिहारी राय ने सपा पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि पार्टी में अराजक तत्वों की भरमार है। उन्होंने याद दिलाया कि वर्ष 2017 में उत्तर प्रदेश की जनता ने कथित अराजकता के विरुद्ध तत्कालीन सरकार को सत्ता से हटाने का निर्णय किया था।

राय ने कहा कि लंबे समय तक सत्ता से बाहर रहने के कारण सपा नेता बेचैन हैं और जब उनके राजनीतिक कार्यों पर सवाल उठते हैं तो वे प्रश्न करने वाले को ही कठघरे में खड़ा करने लगते हैं। उन्होंने अखिलेश यादव की ओर से लगाए गए भ्रष्टाचार संबंधी आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि भाजपा ने जनसेवा के माध्यम से जनता का विश्वास अर्जित किया है।

लखनऊ में मंत्री संजय निषाद का बयान

लखनऊ में मंत्री संजय निषाद ने संवैधानिक सुरक्षा के मुद्दे पर कहा कि यदि किसी वर्ग या समुदाय को संविधान के तहत सुरक्षा प्रदान की गई है, तो उसे समाप्त करने का कोई औचित्य नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी सुरक्षा व्यवस्था में बदलाव के पीछे ठोस कारण होना चाहिए।

निषाद ने चुनाव आयोग (ECI) को देश की संवैधानिक संस्था बताते हुए कहा कि उस पर सवाल उठाने से पहले विपक्ष को ठोस प्रमाण सामने रखने चाहिए। उन्होंने दावा किया कि चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया में अब संस्थागत व्यवस्था और विपक्ष की भागीदारी सुनिश्चित की गई है। उनका आरोप था कि विपक्ष चुनाव जीतने पर प्रक्रिया को सही मानता है, लेकिन हारने पर आयोग पर सवाल उठाने लगता है।

अखिलेश यादव की माँग और सपा का रुख

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने चुनावी धाँधली का आरोप लगाते हुए बंगाल और बिहार में दोबारा विधानसभा चुनाव कराने की माँग की है। उन्होंने यह भी दावा किया कि भाजपा वोटों का घोटाला कर रही है, और इसके बावजूद आगामी विधानसभा चुनाव के बाद उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बनना तय है।

यह ऐसे समय में आया है जब उत्तर प्रदेश में अगले विधानसभा चुनाव की तैयारियाँ पृष्ठभूमि में चल रही हैं और एसआईआर प्रक्रिया को लेकर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच तकरार लगातार बढ़ रही है। गौरतलब है कि मतदाता सूची पुनरीक्षण को लेकर विवाद कोई नई बात नहीं — यह हर चुनावी चक्र में राजनीतिक रंग ले लेता है, पर इस बार आरोपों की व्यापकता और भौगोलिक फैलाव उल्लेखनीय है।

आगे क्या

भाजपा और सपा दोनों के तेवर देखते हुए एसआईआर विवाद आने वाले दिनों में और गरमाने के आसार हैं। चुनाव आयोग की प्रतिक्रिया और विपक्ष के अगले कदम पर सबकी निगाहें टिकी रहेंगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

जो सपा को रक्षात्मक स्थिति में रखती है। लेकिन यह नजरअंदाज करना उचित नहीं होगा कि मतदाता सूची पुनरीक्षण को लेकर विपक्ष की चिंताएँ केवल यूपी तक सीमित नहीं हैं — कई राज्यों में यह मुद्दा राजनीतिक रूप से संवेदनशील रहा है। चुनाव आयोग की स्वायत्तता और पारदर्शिता पर बहस तब और विश्वसनीय बनती है जब दोनों पक्ष तथ्यों के साथ आएँ, न कि केवल चुनावी हार-जीत के चश्मे से।
RashtraPress
28 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

उत्तर प्रदेश में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) क्या है?
विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) चुनाव आयोग द्वारा कराई जाने वाली वह प्रक्रिया है जिसमें मतदाता सूची की गहन समीक्षा और अद्यतन किया जाता है। इसका उद्देश्य मतदाता सूची से फर्जी, मृत या स्थानांतरित मतदाताओं के नाम हटाना और नए पात्र मतदाताओं को जोड़ना है।
भाजपा ने अखिलेश यादव पर क्या आरोप लगाए?
भाजपा नेताओं ने आरोप लगाया कि समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव 2022 के विधानसभा चुनाव में मिली हार को स्वीकार नहीं कर पाए हैं। मंत्री अनिल राजभर के अनुसार, इसीलिए सपा बार-बार संवैधानिक और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर सवाल उठाती रहती है।
अखिलेश यादव ने एसआईआर के अलावा क्या माँगें रखीं?
अखिलेश यादव ने चुनाव में धाँधली का आरोप लगाते हुए बंगाल और बिहार में दोबारा विधानसभा चुनाव कराने की माँग की। उन्होंने यह भी दावा किया कि भाजपा वोटों का घोटाला कर रही है, लेकिन इसके बावजूद आगामी विधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में सपा की सरकार बनना तय है।
चुनाव आयोग की भूमिका पर भाजपा का क्या कहना है?
मंत्री संजय निषाद ने चुनाव आयोग को देश की संवैधानिक संस्था बताते हुए कहा कि उस पर सवाल उठाने से पहले विपक्ष को ठोस प्रमाण सामने रखने चाहिए। उन्होंने यह भी दावा किया कि चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया में अब संस्थागत व्यवस्था और विपक्ष की भागीदारी सुनिश्चित की गई है।
क्या पहले भी मतदाता सूची पुनरीक्षण को लेकर विवाद हुए हैं?
भाजपा नेता अनिल राजभर के अनुसार 1952, 1957, 1961, 1965 और 2003 में विभिन्न सरकारों के कार्यकाल में भी मतदाता सूची पुनरीक्षण की प्रक्रियाएँ हुई थीं। उनका कहना था कि यह प्रक्रिया नई नहीं है और इसे राजनीतिक रंग देना उचित नहीं है।
राष्ट्र प्रेस
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