24 सितंबर 2026
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यूएनएससी सुधार पर जी-4 का एकजुट मोर्चा: भारत, ब्राजील, जर्मनी, जापान ने स्थायी-अस्थायी सदस्यता विस्तार की मांग दोहराई

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यूएनएससी सुधार पर जी-4 का एकजुट मोर्चा: भारत, ब्राजील, जर्मनी, जापान ने स्थायी-अस्थायी सदस्यता विस्तार की मांग दोहराई

सारांश

18 साल की लंबी वार्ता और कोई ठोस नतीजा नहीं — जी-4 देश अब एकजुट होकर यूएनएससी सुधार की रफ्तार तेज़ करने पर आमादा हैं। भारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान ने न्यूयॉर्क में माँग रखी कि आठ दशक पुराना सुरक्षा परिषद ढाँचा बदलने का वक्त आ गया है।

मुख्य बातें

जी-4 देशों — भारत , ब्राजील , जर्मनी और जापान — ने 24 सितंबर 2026 को न्यूयॉर्क में यूएनजीए के 81वें सत्र के दौरान संयुक्त बैठक की।
मंत्रियों ने यूएनएससी में स्थायी और अस्थायी दोनों श्रेणियों में सदस्य संख्या बढ़ाने की माँग दोहराई।
अफ्रीका , एशिया-प्रशांत और लैटिन अमेरिका-कैरेबियाई क्षेत्रों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने पर बल दिया।
करीब 18 वर्षों की आईजीएन प्रक्रिया के बावजूद कोई ठोस सुधार न होने पर गहरी चिंता जताई।
टेक्स्ट-आधारित वार्ता से पहले 'ब्रिजिंग प्रपोजल' पेश किए जाने पर जी-4 ने गंभीर आपत्ति दर्ज की।
महासभा के 80वें सत्र में अफ्रीकी समूह के सुधार मॉडल का स्वागत किया और अफ्रीका की स्थायी सदस्यता का समर्थन दोहराया।

न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र के दौरान 24 सितंबर 2026 को जी-4 समूहभारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान — के मंत्रियों ने एक संयुक्त बैठक कर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में सुधार की दिशा में ठोस कदम उठाने की अपील की। चारों देशों ने एकमत से माँग रखी कि सुरक्षा परिषद में स्थायी और अस्थायी, दोनों श्रेणियों में सदस्यों की संख्या बढ़ाई जाए।

मुख्य घटनाक्रम

बैठक में इंटर-गवर्नमेंटल नेगोशिएशन्स (आईजीएन) के तहत अब तक हुई बातचीत की विस्तृत समीक्षा की गई। मंत्रियों ने स्पष्ट किया कि करीब आठ दशक पुराना यूएनएससी का मौजूदा ढाँचा आज की भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित नहीं करता और अंतरराष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा की समकालीन चुनौतियों से निपटने में अवरोध बन रहा है।

मंत्रियों का कहना था कि सुरक्षा परिषद इस समय अपनी मुख्य जिम्मेदारी — अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखना — प्रभावी ढंग से निभाने में सक्षम नहीं है। परिषद के सही प्रतिनिधित्व, वैधता, विश्वसनीयता और प्रभावशीलता पर बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं।

किन क्षेत्रों को मिले प्रतिनिधित्व

जी-4 मंत्रियों ने विशेष रूप से अफ्रीका, एशिया-प्रशांत तथा लैटिन अमेरिका और कैरेबियाई क्षेत्र को स्थायी और अस्थायी दोनों सदस्यताओं में उचित प्रतिनिधित्व देने की पुरज़ोर माँग की। उन्होंने स्वीकार किया कि ऐतिहासिक रूप से इन क्षेत्रों के साथ प्रतिनिधित्व के मामले में नाइंसाफी हुई है, जिसे दूर किया जाना आवश्यक है।

इसके अलावा, मंत्रियों ने उन संयुक्त राष्ट्र सदस्य देशों की परिषद में भागीदारी बढ़ाने का आग्रह किया, जो अंतरराष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा बनाए रखने तथा संयुक्त राष्ट्र के व्यापक लक्ष्यों को हासिल करने में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।

अफ्रीकी सुधार मॉडल का स्वागत

जी-4 मंत्रियों ने महासभा के 80वें सत्र में आईजीएन के दौरान अफ्रीकी समूह द्वारा प्रस्तुत सुधार मॉडल का स्पष्ट स्वागत किया। उन्होंने एक बार फिर सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता में अफ्रीका को प्रतिनिधित्व देने की माँग का समर्थन दोहराया।

आईजीएन प्रक्रिया पर गहरी चिंता

मंत्रियों ने इस बात पर गहरी नाराज़गी जताई कि करीब 18 वर्षों की सतत कोशिशों के बावजूद आईजीएन प्रक्रिया यूएनएससी में वास्तविक सुधार की दिशा में कोई ठोस परिणाम देने में नाकाम रही है। उन्होंने पिछले सत्र में भी कोई उल्लेखनीय प्रगति न होने पर चिंता ज़ाहिर की।

खास तौर पर मंत्रियों ने 'ब्रिजिंग प्रपोजल' को टेक्स्ट-आधारित औपचारिक वार्ता शुरू होने से पहले ही पेश किए जाने पर गंभीर आपत्ति दर्ज की। उनका कहना था कि इस प्रस्ताव में उन बहुसंख्यक सदस्य देशों की राय को नज़रअंदाज़ किया गया, जो स्थायी और अस्थायी दोनों सदस्यताओं का विस्तार चाहते हैं। यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक भू-राजनीति में तेज़ बदलाव हो रहे हैं और संयुक्त राष्ट्र की प्रासंगिकता पर सवाल उठ रहे हैं।

आगे की राह

जी-4 देशों का यह साझा रुख दर्शाता है कि उभरती और मध्यम शक्तियाँ यूएनएससी ढाँचे में बदलाव के लिए दबाव और तेज़ करने के मूड में हैं। गौरतलब है कि यूएनएससी में स्थायी सदस्यता देने का कोई भी प्रस्ताव वर्तमान P5 देशों की सहमति के बिना पारित नहीं हो सकता, जो इस सुधार प्रक्रिया की सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है।

संपादकीय दृष्टिकोण

साझा घोषणापत्र और फिर वही ठहराव। 18 साल की आईजीएन प्रक्रिया ने साबित कर दिया है कि P5 की वीटो शक्ति के सामने किसी भी सुधार एजेंडे की रफ्तार धीमी पड़ जाती है। असली सवाल यह नहीं कि जी-4 क्या माँगता है, बल्कि यह है कि वह चीन और रूस को — जो मौजूदा ढाँचे के सबसे बड़े लाभार्थी हैं — इस बदलाव के लिए तैयार करने की कोई व्यावहारिक रणनीति रखता भी है या नहीं। 'ब्रिजिंग प्रपोजल' पर आपत्ति सही है, लेकिन जब तक कोई बाध्यकारी तंत्र नहीं बनता, यह एजेंडा हर साल न्यूयॉर्क में उठता रहेगा और उतनी ही तेज़ी से ठंडा भी पड़ता रहेगा।
RashtraPress
24 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जी-4 देश कौन हैं और यूएनएससी सुधार में उनकी क्या भूमिका है?
जी-4 में भारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान शामिल हैं, जो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट के दावेदार माने जाते हैं। ये चारों देश मिलकर यूएनएससी के विस्तार और सुधार के लिए सामूहिक रूप से दबाव बनाते हैं।
यूएनएससी में सुधार की माँग इतने सालों से क्यों अटकी हुई है?
यूएनएससी के चार्टर में बदलाव के लिए मौजूदा पाँच स्थायी सदस्यों (P5) — अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और चीन — की सहमति अनिवार्य है। इनमें से कोई भी देश अपनी वर्चस्व वाली स्थिति को कमज़ोर करने वाले किसी भी ढाँचागत बदलाव का समर्थन करने में हिचकता रहा है, जिससे आईजीएन प्रक्रिया करीब 18 वर्षों से ठहरी हुई है।
अफ्रीकी समूह के सुधार मॉडल में क्या है?
महासभा के 80वें सत्र के दौरान आईजीएन में अफ्रीकी समूह ने एक सुधार मॉडल पेश किया, जिसमें सुरक्षा परिषद की स्थायी और अस्थायी सदस्यता में अफ्रीकी देशों को उचित प्रतिनिधित्व देने की माँग शामिल है। जी-4 ने इस मॉडल का स्वागत करते हुए अफ्रीका की स्थायी सदस्यता का समर्थन किया है।
'ब्रिजिंग प्रपोजल' क्या है और जी-4 ने इस पर आपत्ति क्यों जताई?
'ब्रिजिंग प्रपोजल' एक मध्यवर्ती प्रस्ताव है जिसे टेक्स्ट-आधारित औपचारिक वार्ता शुरू होने से पहले ही पेश कर दिया गया। जी-4 का आरोप है कि इस प्रस्ताव में उन बहुसंख्यक सदस्य देशों की राय नज़रअंदाज़ की गई, जो यूएनएससी की स्थायी और अस्थायी दोनों सदस्यताओं का विस्तार चाहते हैं।
इस बैठक का भारत की स्थायी सदस्यता की दावेदारी पर क्या असर होगा?
जी-4 की यह एकजुटता भारत की यूएनएससी स्थायी सीट की दावेदारी को कूटनीतिक समर्थन देती है। हालाँकि, विशेषज्ञों के अनुसार, जब तक P5 — विशेषकर चीन — की सहमति नहीं बनती, भारत सहित किसी भी देश की स्थायी सदस्यता की राह खुलना व्यावहारिक रूप से कठिन बनी रहेगी।
राष्ट्र प्रेस
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