यूएनएससी सुधार पर जी-4 का एकजुट मोर्चा: भारत, ब्राजील, जर्मनी, जापान ने स्थायी-अस्थायी सदस्यता विस्तार की मांग दोहराई
सारांश
मुख्य बातें
न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र के दौरान 24 सितंबर 2026 को जी-4 समूह — भारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान — के मंत्रियों ने एक संयुक्त बैठक कर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में सुधार की दिशा में ठोस कदम उठाने की अपील की। चारों देशों ने एकमत से माँग रखी कि सुरक्षा परिषद में स्थायी और अस्थायी, दोनों श्रेणियों में सदस्यों की संख्या बढ़ाई जाए।
मुख्य घटनाक्रम
बैठक में इंटर-गवर्नमेंटल नेगोशिएशन्स (आईजीएन) के तहत अब तक हुई बातचीत की विस्तृत समीक्षा की गई। मंत्रियों ने स्पष्ट किया कि करीब आठ दशक पुराना यूएनएससी का मौजूदा ढाँचा आज की भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित नहीं करता और अंतरराष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा की समकालीन चुनौतियों से निपटने में अवरोध बन रहा है।
मंत्रियों का कहना था कि सुरक्षा परिषद इस समय अपनी मुख्य जिम्मेदारी — अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखना — प्रभावी ढंग से निभाने में सक्षम नहीं है। परिषद के सही प्रतिनिधित्व, वैधता, विश्वसनीयता और प्रभावशीलता पर बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं।
किन क्षेत्रों को मिले प्रतिनिधित्व
जी-4 मंत्रियों ने विशेष रूप से अफ्रीका, एशिया-प्रशांत तथा लैटिन अमेरिका और कैरेबियाई क्षेत्र को स्थायी और अस्थायी दोनों सदस्यताओं में उचित प्रतिनिधित्व देने की पुरज़ोर माँग की। उन्होंने स्वीकार किया कि ऐतिहासिक रूप से इन क्षेत्रों के साथ प्रतिनिधित्व के मामले में नाइंसाफी हुई है, जिसे दूर किया जाना आवश्यक है।
इसके अलावा, मंत्रियों ने उन संयुक्त राष्ट्र सदस्य देशों की परिषद में भागीदारी बढ़ाने का आग्रह किया, जो अंतरराष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा बनाए रखने तथा संयुक्त राष्ट्र के व्यापक लक्ष्यों को हासिल करने में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।
अफ्रीकी सुधार मॉडल का स्वागत
जी-4 मंत्रियों ने महासभा के 80वें सत्र में आईजीएन के दौरान अफ्रीकी समूह द्वारा प्रस्तुत सुधार मॉडल का स्पष्ट स्वागत किया। उन्होंने एक बार फिर सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता में अफ्रीका को प्रतिनिधित्व देने की माँग का समर्थन दोहराया।
आईजीएन प्रक्रिया पर गहरी चिंता
मंत्रियों ने इस बात पर गहरी नाराज़गी जताई कि करीब 18 वर्षों की सतत कोशिशों के बावजूद आईजीएन प्रक्रिया यूएनएससी में वास्तविक सुधार की दिशा में कोई ठोस परिणाम देने में नाकाम रही है। उन्होंने पिछले सत्र में भी कोई उल्लेखनीय प्रगति न होने पर चिंता ज़ाहिर की।
खास तौर पर मंत्रियों ने 'ब्रिजिंग प्रपोजल' को टेक्स्ट-आधारित औपचारिक वार्ता शुरू होने से पहले ही पेश किए जाने पर गंभीर आपत्ति दर्ज की। उनका कहना था कि इस प्रस्ताव में उन बहुसंख्यक सदस्य देशों की राय को नज़रअंदाज़ किया गया, जो स्थायी और अस्थायी दोनों सदस्यताओं का विस्तार चाहते हैं। यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक भू-राजनीति में तेज़ बदलाव हो रहे हैं और संयुक्त राष्ट्र की प्रासंगिकता पर सवाल उठ रहे हैं।
आगे की राह
जी-4 देशों का यह साझा रुख दर्शाता है कि उभरती और मध्यम शक्तियाँ यूएनएससी ढाँचे में बदलाव के लिए दबाव और तेज़ करने के मूड में हैं। गौरतलब है कि यूएनएससी में स्थायी सदस्यता देने का कोई भी प्रस्ताव वर्तमान P5 देशों की सहमति के बिना पारित नहीं हो सकता, जो इस सुधार प्रक्रिया की सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है।