यूएनएससी सुधार की मांग तेज: अफ्रीका ने माँगी 2 स्थायी सीटें, जापान और भारत भी समर्थन में
सारांश
मुख्य बातें
संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) की वार्षिक बहस में 26 सितंबर 2026 को दुनिया भर के नेताओं ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में व्यापक सुधार की जोरदार माँग उठाई। नेताओं का कहना है कि 1945 में स्थापित यह शक्ति-संरचना आज की राजनीतिक, आर्थिक और क्षेत्रीय वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित नहीं करती। अफ्रीकी देशों ने सबसे मुखर रुख अपनाते हुए कम से कम 2 स्थायी सीटों की माँग रखी, जिनके साथ मौजूदा स्थायी सदस्यों के समान सभी अधिकार — वीटो सहित — मिलने चाहिए।
अफ्रीका की दो-टूक माँग
केन्या के राष्ट्रपति विलियम रुटो ने महासभा में कहा, 'संयुक्त राष्ट्र चार्टर के तहत हर देश संप्रभु और बराबर है, लेकिन युद्ध और शांति जैसे सबसे गंभीर मामलों में 5 देशों के पास स्थायी शक्ति है, जो बाकी 188 देशों के पास नहीं है। इस महासभा में जिस बराबरी की बात की जाती है, वह सुरक्षा परिषद के दरवाजे पर जाकर खत्म हो जाती है।' रुटो ने यह भी याद दिलाया कि परिषद सुधार पर चर्चा 17 वर्षों से चल रही है, लेकिन ठोस परिणाम शून्य है।
अफ्रीकी संघ की 'कमेटी ऑफ टेन' का समन्वय कर रहे सिएरा लियोन के राष्ट्रपति जूलियस माडा बायो ने कहा, 'सुरक्षा परिषद आज भी 1945 की दुनिया को दिखाती है। अफ्रीका में 1.6 अरब से अधिक लोग रहते हैं और परिषद के एजेंडे का बड़ा हिस्सा अफ्रीकी संघर्षों से जुड़ा रहता है, फिर भी अफ्रीका के पास कोई स्थायी सीट नहीं है।' बायो ने 2 स्थायी सीटों के साथ 5 अतिरिक्त अस्थायी सीटों की माँग भी दोहराई।
नाइजीरिया के उपराष्ट्रपति काशिम शेट्टीमा ने कहा, 'इस संस्था में सुधार की शुरुआत सुरक्षा परिषद के नए स्वरूप से होनी चाहिए, क्योंकि 2026 की दुनिया को 1945 में तय की गई ताकत की व्यवस्था में नहीं बाँधा जा सकता।' दक्षिण अफ्रीका के विदेश मंत्री रोनाल्ड लामोला ने कहा कि परिषद में अफ्रीका को स्थायी सीटें और संबंधित सभी अधिकार 'बहुत पहले ही मिल जाने चाहिए थे।'
घाना के राष्ट्रपति जॉन ड्रामानी महामा ने अफ्रीका की स्थायी सीट न होने को '21वीं सदी में बुनियादी तौर पर अस्वीकार्य' करार दिया। उन्होंने कहा, 'सुरक्षा परिषद में सुधार अफ्रीका पर किया जाने वाला कोई एहसान नहीं है — यह संयुक्त राष्ट्र की वैधता, भरोसे और उसके भविष्य के लिए जरूरी है।'
जापान और अन्य देशों का समर्थन
जापान की प्रधानमंत्री सनाए तकाइची ने भी परिषद में शीघ्र सुधार की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि मौजूदा ढाँचा 1945 के अंतरराष्ट्रीय हालात के अनुसार बना था और अब स्थायी व अस्थायी, दोनों तरह के सदस्यों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए। हालाँकि जापान ने किसी विशेष देश के नाम का उल्लेख नहीं किया। लेसोथो ने 'एजुलविनी सहमति' के तहत व्यापक सुधार का समर्थन किया, सेंट लूसिया ने अफ्रीका, एशिया-प्रशांत, लैटिन अमेरिका और कैरेबियाई देशों का प्रतिनिधित्व बढ़ाने की माँग रखी, जबकि नाइजर ने सवाल किया कि जब 54 अफ्रीकी देशों में से किसी के पास स्थायी सीट नहीं है, तो यह संस्था विश्वास का पात्र कैसे बन सकती है।
भारत और जी4 की भूमिका
यह बहस भारत की दीर्घकालीन यूएनएससी स्थायी सदस्यता की माँग के संदर्भ में भी महत्त्वपूर्ण है। भारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान मिलकर ग्रुप ऑफ फोर (जी4) बनाते हैं, जो परिषद में स्थायी और अस्थायी — दोनों प्रकार की — सीटों की संख्या बढ़ाने का समर्थन करता है। ये चारों देश एक-दूसरे की स्थायी सदस्यता की दावेदारी का भी समर्थन करते हैं। इस बहस में अफ्रीकी और एशियाई देशों की बढ़ती एकजुटता जी4 के लिए कूटनीतिक अवसर भी बनाती है।
सुधार की राह में संवैधानिक अड़चनें
संयुक्त राष्ट्र चार्टर में किसी भी बदलाव के लिए महासभा के दो-तिहाई सदस्यों की स्वीकृति अनिवार्य है। इसके बाद संयुक्त राष्ट्र के दो-तिहाई सदस्य देशों को भी पुष्टि करनी होती है, जिसमें चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन और अमेरिका — सभी पाँचों स्थायी सदस्यों की सहमति अनिवार्य है। गौरतलब है कि वर्तमान में इन्हीं पाँच देशों के पास वीटो का अधिकार है, जो किसी भी सुधार प्रस्ताव को रोकने में सक्षम है। यही व्यावहारिक अड़चन सुधार प्रक्रिया को दशकों से लंबित रखे हुए है।
आगे क्या होगा
यूएनजीए की यह वार्षिक बहस सुधार की माँग को एक बार फिर वैश्विक मंच पर ले आई है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि बिना स्थायी सदस्यों की राजनीतिक इच्छाशक्ति के ठोस बदलाव मुश्किल है। फिर भी, अफ्रीकी देशों की बढ़ती एकजुटता और जी4 की सक्रियता यह संकेत देती है कि सुधार के पक्ष में दबाव आने वाले वर्षों में और तीव्र हो सकता है।