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गंगा दशहरा पर महाकालेश्वर उज्जैन में दिव्य भस्म आरती, राजा स्वरूप में सजे बाबा महाकाल

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गंगा दशहरा पर महाकालेश्वर उज्जैन में दिव्य भस्म आरती, राजा स्वरूप में सजे बाबा महाकाल

सारांश

गंगा दशहरा के पावन संयोग पर उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती का दिव्य दृश्य उपस्थित हुआ। भांग, चंदन, सूखे मेवों और आभूषणों से राजा स्वरूप में सजे बाबा महाकाल के दर्शन के लिए देश-विदेश से श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी।

मुख्य बातें

गंगा दशहरा , 26 मई को उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती के दौरान देश-विदेश से श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी।
महानिर्वाणी अखाड़े के संतों ने जलाभिषेक, पंचामृत स्नान और भस्म अर्पण की परंपरागत विधि संपन्न कराई।
बाबा महाकाल को भांग, चंदन, सूखे मेवों और आभूषणों से राजा स्वरूप में सजाया गया; मस्तक पर चंद्रमा और त्रिशूल विराजे।
भस्म आरती अब चिता की भस्म के स्थान पर गाय के गोबर , पीपल, शमी, पलाश और अमलतास की लकड़ियों से तैयार पवित्र भस्म से की जाती है।
सामान्य दिनों में दर्शन के लिए 30 से 45 मिनट की प्रतीक्षा; त्योहारों पर भीड़ अधिक।

उज्जैन स्थित विश्व प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर में गंगा दशहरा के पावन अवसर पर मंगलवार, 26 मई को भस्म आरती के दौरान अद्भुत आस्था का दृश्य उपस्थित हुआ। बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक बाबा महाकाल के दिव्य दर्शन के लिए देश-विदेश से आए हज़ारों श्रद्धालुओं ने मंदिर परिसर को भक्तिमय बना दिया। गंगा दशहरा के विशेष संयोग ने इस आरती को और भी अलौकिक बना दिया।

मुख्य घटनाक्रम

सुबह की नित्य परंपरा के अनुसार सर्वप्रथम भगवान वीरभद्र से आज्ञा लेने के पश्चात मंदिर के कपाट खोले गए। कपाट खुलते ही पूरा मंदिर परिसर बाबा के जयकारों से गुंजायमान हो उठा। इसके बाद महानिर्वाणी अखाड़े के संतों द्वारा बाबा का जलाभिषेक किया गया और फिर पंचामृत से स्नान करवाया गया।

बाबा का राजा स्वरूप शृंगार

मंगलवार के विशेष शृंगार में बाबा महाकाल के मस्तक पर चंद्रमा और त्रिशूल सजाए गए। भांग, चंदन, सूखे मेवों और बहुमूल्य आभूषणों से सुसज्जित कर बाबा को राजा स्वरूप में तैयार किया गया। यह अलौकिक शृंगार देखकर श्रद्धालु भावविभोर हो उठे और घंटियों, शंखध्वनि तथा मंत्रोच्चार से पूरा परिसर गूँज उठा।

भस्म आरती की परंपरा और महत्व

शृंगार पूर्ण होने के उपरांत महानिर्वाणी अखाड़े के संतों द्वारा बाबा महाकाल को पवित्र भस्म अर्पित की गई। मान्यता है कि भस्म आरती के दौरान महाकाल भक्तों को निराकार से साकार रूप में दर्शन देते हैं। उल्लेखनीय है कि पहले यह आरती चिता की ताज़ी भस्म से की जाती थी, किंतु अब गाय के गोबर, पीपल, शमी, पलाश और अमलतास की लकड़ियों से तैयार पवित्र भस्म का उपयोग किया जाता है।

मंदिर की संरचना और दर्शन व्यवस्था

महाकालेश्वर मंदिर तीन खंडों में विभाजित है — निचले खंड में महाकालेश्वर, मध्य खंड में ओंकारेश्वर और सर्वोच्च खंड में नागचंद्रेश्वर की प्रतिमा विराजमान है। सामान्य दिनों में दर्शन के लिए सामान्य कतार में लगभग 30 से 45 मिनट का समय लगता है, जबकि त्योहारों और अवकाश के दिनों में भीड़ अधिक हो जाती है। गंगा दशहरा के अवसर पर भी सामान्य से अधिक श्रद्धालु उमड़े।

आगे क्या

महाकालेश्वर मंदिर में इस प्रकार के विशेष पर्वों पर भस्म आरती और शृंगार की परंपरा निरंतर जारी रहती है। आने वाले धार्मिक पर्वों पर भी भक्तों की इसी प्रकार की उमड़ती श्रद्धा की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि उज्जैन की सांस्कृतिक और आर्थिक पहचान का केंद्र बिंदु भी है। गंगा दशहरा जैसे पर्वों पर उमड़ने वाली भीड़ यह दर्शाती है कि धार्मिक पर्यटन मध्य प्रदेश के लिए एक बड़ी संभावना है, जिसे अवसंरचना और भीड़ प्रबंधन की दृष्टि से और सुदृढ़ किया जाना चाहिए। भस्म की परंपरा में बदलाव — चिता भस्म से पवित्र वनस्पति भस्म तक — यह भी बताता है कि परंपरा और आधुनिक संवेदनशीलता के बीच संतुलन साधा जा रहा है। मंदिर प्रशासन के लिए असली परीक्षा यह है कि बढ़ती भीड़ के बावजूद श्रद्धालुओं को सुरक्षित और सम्मानजनक दर्शन अनुभव मिले।
RashtraPress
11 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

महाकालेश्वर मंदिर की भस्म आरती क्या है और यह क्यों खास है?
भस्म आरती महाकालेश्वर मंदिर की सबसे प्राचीन और अलौकिक परंपरा है, जिसमें बाबा महाकाल को पवित्र भस्म अर्पित की जाती है। मान्यता है कि इस आरती के दौरान महाकाल निराकार से साकार रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं।
गंगा दशहरा पर महाकालेश्वर मंदिर में भीड़ कितनी थी?
गंगा दशहरा के अवसर पर सामान्य दिनों की तुलना में अधिक श्रद्धालु उमड़े। सामान्य दिनों में दर्शन के लिए 30 से 45 मिनट की प्रतीक्षा होती है, जबकि त्योहारों पर यह समय बढ़ जाता है।
भस्म आरती में किस भस्म का उपयोग किया जाता है?
वर्तमान में भस्म आरती के लिए गाय के गोबर, पीपल, शमी, पलाश और अमलतास की लकड़ियों को जलाकर तैयार की गई पवित्र भस्म का उपयोग किया जाता है। पहले चिता की ताज़ी भस्म का उपयोग होता था, जिसे बाद में बदला गया।
महाकालेश्वर मंदिर की संरचना कैसी है?
महाकालेश्वर मंदिर तीन खंडों में विभाजित है — निचले खंड में महाकालेश्वर, मध्य खंड में ओंकारेश्वर और सर्वोच्च खंड में नागचंद्रेश्वर विराजमान हैं। यह बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है।
गंगा दशहरा पर बाबा महाकाल का शृंगार कैसे किया गया?
गंगा दशहरा पर बाबा महाकाल को भांग, चंदन, सूखे मेवों और आभूषणों से राजा स्वरूप में सजाया गया। मस्तक पर चंद्रमा और त्रिशूल विशेष रूप से सजाए गए, जिसे देखकर श्रद्धालु भावविभोर हो उठे।
राष्ट्र प्रेस
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