गंगा दशहरा पर महाकालेश्वर उज्जैन में दिव्य भस्म आरती, राजा स्वरूप में सजे बाबा महाकाल
सारांश
मुख्य बातें
उज्जैन स्थित विश्व प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर में गंगा दशहरा के पावन अवसर पर मंगलवार, 26 मई को भस्म आरती के दौरान अद्भुत आस्था का दृश्य उपस्थित हुआ। बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक बाबा महाकाल के दिव्य दर्शन के लिए देश-विदेश से आए हज़ारों श्रद्धालुओं ने मंदिर परिसर को भक्तिमय बना दिया। गंगा दशहरा के विशेष संयोग ने इस आरती को और भी अलौकिक बना दिया।
मुख्य घटनाक्रम
सुबह की नित्य परंपरा के अनुसार सर्वप्रथम भगवान वीरभद्र से आज्ञा लेने के पश्चात मंदिर के कपाट खोले गए। कपाट खुलते ही पूरा मंदिर परिसर बाबा के जयकारों से गुंजायमान हो उठा। इसके बाद महानिर्वाणी अखाड़े के संतों द्वारा बाबा का जलाभिषेक किया गया और फिर पंचामृत से स्नान करवाया गया।
बाबा का राजा स्वरूप शृंगार
मंगलवार के विशेष शृंगार में बाबा महाकाल के मस्तक पर चंद्रमा और त्रिशूल सजाए गए। भांग, चंदन, सूखे मेवों और बहुमूल्य आभूषणों से सुसज्जित कर बाबा को राजा स्वरूप में तैयार किया गया। यह अलौकिक शृंगार देखकर श्रद्धालु भावविभोर हो उठे और घंटियों, शंखध्वनि तथा मंत्रोच्चार से पूरा परिसर गूँज उठा।
भस्म आरती की परंपरा और महत्व
शृंगार पूर्ण होने के उपरांत महानिर्वाणी अखाड़े के संतों द्वारा बाबा महाकाल को पवित्र भस्म अर्पित की गई। मान्यता है कि भस्म आरती के दौरान महाकाल भक्तों को निराकार से साकार रूप में दर्शन देते हैं। उल्लेखनीय है कि पहले यह आरती चिता की ताज़ी भस्म से की जाती थी, किंतु अब गाय के गोबर, पीपल, शमी, पलाश और अमलतास की लकड़ियों से तैयार पवित्र भस्म का उपयोग किया जाता है।
मंदिर की संरचना और दर्शन व्यवस्था
महाकालेश्वर मंदिर तीन खंडों में विभाजित है — निचले खंड में महाकालेश्वर, मध्य खंड में ओंकारेश्वर और सर्वोच्च खंड में नागचंद्रेश्वर की प्रतिमा विराजमान है। सामान्य दिनों में दर्शन के लिए सामान्य कतार में लगभग 30 से 45 मिनट का समय लगता है, जबकि त्योहारों और अवकाश के दिनों में भीड़ अधिक हो जाती है। गंगा दशहरा के अवसर पर भी सामान्य से अधिक श्रद्धालु उमड़े।
आगे क्या
महाकालेश्वर मंदिर में इस प्रकार के विशेष पर्वों पर भस्म आरती और शृंगार की परंपरा निरंतर जारी रहती है। आने वाले धार्मिक पर्वों पर भी भक्तों की इसी प्रकार की उमड़ती श्रद्धा की संभावना है।