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चीन का 'एथनिक यूनिटी लॉ' तिब्बती पहचान पर हमला: ICT प्रमुख की चेतावनी

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चीन का 'एथनिक यूनिटी लॉ' तिब्बती पहचान पर हमला: ICT प्रमुख की चेतावनी

सारांश

चीन का नया 'एथनिक यूनिटी एंड प्रोग्रेस लॉ' 1 जुलाई से लागू हो चुका है और ICT प्रमुख रयान फियोरेसी के अनुसार यह तिब्बती संस्कृति को मिटाने की नीतियों को कानूनी वैधता देता है। वॉशिंगटन में दलाई लामा के 91वें जन्मदिन के अवसर पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय से चीन पर दबाव बनाने और संवाद बहाल कराने की माँग उठी।

मुख्य बातें

चीन ने 1 जुलाई से 'एथनिक यूनिटी एंड प्रोग्रेस लॉ' लागू किया, जो तिब्बत में जबरन सांस्कृतिक एकीकरण की नीतियों को कानूनी मान्यता देता है।
ICT के कार्यकारी निदेशक रयान फियोरेसी ने कहा कि यह कानून चीन के अपने संविधान और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार प्रतिबद्धताओं के विरुद्ध है।
ICT ने संयुक्त राष्ट्र , कई देशों की सरकारों और धार्मिक नेताओं से इस कानून के खिलाफ आवाज़ उठाने की अपील की है।
फियोरेसी ने वॉशिंगटन में दलाई लामा के 91वें जन्मदिन समारोह के बाद चीन पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ाने की माँग की।
दलाई लामा 1959 से धर्मशाला में निर्वासन में हैं; उन्हें 1989 में नोबेल शांति पुरस्कार मिला था।
अमेरिका के 2002 के तिब्बत नीति कानून के तहत स्थापित विशेष समन्वयक कार्यालय चीन-तिब्बत संवाद को बढ़ावा देने का काम करता है।

इंटरनेशनल कैंपेन फॉर तिब्बत (ICT) के कार्यकारी निदेशक रयान फियोरेसी ने 10 जुलाई को वॉशिंगटन में चेतावनी दी कि चीन ने 1 जुलाई से लागू किए गए नए 'एथनिक यूनिटी एंड प्रोग्रेस लॉ' के ज़रिए तिब्बती संस्कृति और पहचान को मिटाने की नीतियों को कानूनी जामा पहनाया है। उनके अनुसार, यह कानून तिब्बत के भीतर मानवाधिकारों के बढ़ते उल्लंघन को संस्थागत रूप देता है।

नया कानून और तिब्बती पहचान पर खतरा

फियोरेसी ने बताया कि चीन का यह नया कानून बीजिंग की उन तमाम नीतियों को चीनी विधि का हिस्सा बना देता है, जो दशकों से तिब्बतियों पर जबरन सांस्कृतिक एकीकरण थोपने के लिए इस्तेमाल होती रही हैं। उन्होंने कहा, "चीनी सरकार ने 1 जुलाई को यह कानून लागू किया है, जो बीजिंग की कई जबरन सांस्कृतिक एकीकरण नीतियों को चीनी कानून का हिस्सा बना देता है।"

ICT प्रमुख के अनुसार, इस कानून की अनेक धाराएँ चीन के अपने संविधान और उसकी अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार प्रतिबद्धताओं के विरुद्ध जाती हैं। यह ऐसे समय में आया है जब तिब्बत के भीतर की स्थिति पहले से ही गंभीर बताई जा रही है।

अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील

ICT ने इस कानून के विरुद्ध वैश्विक जनमत तैयार करने के लिए कई देशों की सरकारों, संयुक्त राष्ट्र और धार्मिक नेताओं से संपर्क किया है। फियोरेसी ने कहा, "हमने सरकारों, संयुक्त राष्ट्र और धार्मिक नेताओं से अपील की है कि वे इस कानून के खिलाफ बोलें, दुनिया को बताएं कि चीन तिब्बती पहचान को मिटाने के लिए क्या कर रहा है और बीजिंग से अपनी नीतियां बदलने की मांग करें।"

उन्होंने अमेरिका और अन्य देशों की सरकारों से आग्रह किया कि वे चीन पर कूटनीतिक दबाव डालें, ताकि बीजिंग दलाई लामा या उनके प्रतिनिधियों के साथ संवाद की प्रक्रिया फिर से शुरू करे।

दलाई लामा के 91वें जन्मदिन का संदर्भ

फियोरेसी ने ये बातें वॉशिंगटन में दलाई लामा के 91वें जन्मदिन के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम के बाद कहीं। इस आयोजन में अमेरिकी सरकारी अधिकारी, राजनयिक, तिब्बती समुदाय के प्रतिनिधि, नागरिक समाज के सदस्य और पत्रकार शामिल हुए।

उन्होंने कहा कि वैश्विक संघर्षों से भरे इस दौर में दलाई लामा का करुणा और अहिंसा का संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है। गौरतलब है कि दलाई लामा 1959 में तिब्बत छोड़कर भारत आए थे और तब से धर्मशाला में निर्वासन में रह रहे हैं। उन्हें 1989 में शांतिपूर्ण समाधान के प्रयासों के लिए नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

अमेरिका की तिब्बत नीति और आगे की राह

अमेरिका ने 2002 के तिब्बत नीति कानून के तहत तिब्बत मामलों के लिए एक विशेष समन्वयक का पद स्थापित किया है, जो अमेरिकी नीतियों में तालमेल बनाने और चीनी अधिकारियों तथा तिब्बती प्रतिनिधियों के बीच संवाद को प्रोत्साहित करने का काम करता है। फियोरेसी ने रेखांकित किया कि तिब्बत के मुद्दे पर अमेरिका की दोनों प्रमुख राजनीतिक पार्टियों का समर्थन रहा है।

ICT प्रमुख ने माँग की कि किसी भी संभावित वार्ता में तिब्बतियों की दीर्घकालिक चिंताओं को शामिल किया जाए और उन्हें वास्तविक स्वायत्तता तथा मूल अधिकार सुनिश्चित किए जाएँ। तिब्बत के भविष्य का प्रश्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर एक बार फिर केंद्र में आ गया है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि दशकों की आत्मसातीकरण नीति को संस्थागत रूप देने की कोशिश है — और यही इसे पहले के प्रशासनिक आदेशों से अलग और अधिक खतरनाक बनाता है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय की अपीलें नई नहीं हैं, लेकिन चीन पर उनका व्यावहारिक असर सीमित रहा है। असली सवाल यह है कि क्या अमेरिका और यूरोपीय देश आर्थिक हितों से ऊपर उठकर तिब्बत मुद्दे पर ठोस कूटनीतिक कार्रवाई करेंगे, या यह भी बयानों तक सिमट कर रह जाएगा। दलाई लामा की उम्र और उत्तराधिकार का प्रश्न इस संकट में एक नई और जटिल परत जोड़ता है, जिस पर अंतरराष्ट्रीय मीडिया अभी पर्याप्त ध्यान नहीं दे रहा।
RashtraPress
11 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

चीन का 'एथनिक यूनिटी एंड प्रोग्रेस लॉ' क्या है?
यह चीन का एक नया कानून है जो 1 जुलाई 2025 से लागू हुआ है। ICT के अनुसार, यह कानून बीजिंग की उन नीतियों को चीनी विधि का हिस्सा बनाता है जो तिब्बतियों पर जबरन सांस्कृतिक एकीकरण थोपती हैं और तिब्बती पहचान को कमज़ोर करती हैं।
ICT ने इस कानून पर क्या आपत्ति जताई है?
ICT प्रमुख रयान फियोरेसी के अनुसार, इस कानून की कई धाराएँ चीन के अपने संविधान और उसकी अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार प्रतिबद्धताओं के विरुद्ध हैं। संगठन ने इस कानून के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र, सरकारों और धार्मिक नेताओं से आवाज़ उठाने की अपील की है।
दलाई लामा और चीन के बीच बातचीत क्यों रुकी हुई है?
ICT ने इसका विस्तृत कारण नहीं बताया, लेकिन संगठन ने अमेरिका और अन्य देशों से माँग की है कि वे चीन पर दबाव डालें ताकि वह दलाई लामा या उनके प्रतिनिधियों के साथ संवाद फिर से शुरू करे। किसी भी वार्ता में तिब्बतियों को वास्तविक स्वायत्तता और मूल अधिकार मिलने की शर्त रखी गई है।
अमेरिका की तिब्बत नीति क्या है?
अमेरिका ने 2002 के तिब्बत नीति कानून के तहत तिब्बत मामलों के लिए एक विशेष समन्वयक का पद बनाया है। यह कार्यालय अमेरिकी तिब्बत नीतियों में तालमेल बनाता है और चीनी अधिकारियों तथा तिब्बती प्रतिनिधियों के बीच संवाद को प्रोत्साहित करता है। ICT के अनुसार, इस मुद्दे पर अमेरिका की दोनों प्रमुख राजनीतिक पार्टियों का समर्थन रहा है।
दलाई लामा कब से निर्वासन में हैं और उन्हें नोबेल पुरस्कार क्यों मिला?
दलाई लामा 1959 में तिब्बत छोड़कर भारत आए थे और तब से धर्मशाला में रह रहे हैं। उन्हें 1989 में तिब्बत मुद्दे के शांतिपूर्ण समाधान के प्रयासों के लिए नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
राष्ट्र प्रेस
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