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चीन का जातीय एकता कानून: अल्पसंख्यकों पर 'चीनी पहचान' थोपने का नया दबाव, संयुक्त राष्ट्र ने जताई चिंता

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चीन का जातीय एकता कानून: अल्पसंख्यकों पर 'चीनी पहचान' थोपने का नया दबाव, संयुक्त राष्ट्र ने जताई चिंता

सारांश

चीन का नया जातीय एकता कानून महज़ एक कानूनी दस्तावेज़ नहीं — यह दशकों की सांस्कृतिक एकरूपता की नीति को संस्थागत रूप देने की कोशिश है। तिब्बती, उइगर और मंगोल समुदायों की भाषा व संस्कृति पर मँडराते खतरे के बीच संयुक्त राष्ट्र भी सतर्क हो चुका है।

मुख्य बातें

चीन में 1 जुलाई 2026 से 'जातीय एकता और प्रगति संवर्धन कानून' लागू हुआ।
कानून 56 आधिकारिक जातीय समुदायों पर एकीकृत चीनी राष्ट्रीय पहचान अपनाने का दबाव डालता है।
संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विशेषज्ञों ने अप्रैल 2026 में तिब्बती, उइगर और मंगोल समुदायों की भाषा व धार्मिक स्वतंत्रता पर खतरे की चेतावनी दी।
विशेषज्ञों के अनुसार, कानून का दायरा चीन की सीमाओं के बाहर रहने वाले लोगों तक भी पहुँच सकता है।
सेफगार्ड डिफेंडर्स की 2022 की रिपोर्ट में दुनियाभर में चीन के 100 से अधिक कथित 'विदेशी पुलिस स्टेशनों' का दावा किया गया था।

चीन में 1 जुलाई 2026 से लागू हुए नए 'जातीय एकता और प्रगति संवर्धन कानून' के तहत देश के जातीय अल्पसंख्यक समुदायों पर एक समान चीनी राष्ट्रीय पहचान अपनाने का दबाव तेज़ हो गया है। रिपोर्टों के अनुसार, इस कानून में माता-पिता को यह भी निर्देश दिया गया है कि वे अपने बच्चों में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) के प्रति निष्ठा की भावना विकसित करें। मानवाधिकार विशेषज्ञों ने इसे अल्पसंख्यक संस्कृतियों के लिए गंभीर खतरा बताया है।

कानून में क्या है

नए कानून में स्पष्ट रूप से ऐसे किसी भी कार्य पर रोक लगाई गई है जो 'जातीय एकता को कमज़ोर करे' या समुदायों के बीच विभाजन पैदा करे। चीन में सरकार आधिकारिक रूप से 56 जातीय समुदायों को मान्यता देती है, जिनमें सबसे बड़ा 'हान चीनी' समुदाय है — जो देश की 1.4 अरब आबादी का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा है।

कानून के अनुसार, स्कूलों का पाठ्यक्रम इस प्रकार तैयार किया जाएगा जिससे छात्रों में यह धारणा मज़बूत हो कि वे सभी एक ही चीनी राष्ट्र के अंग हैं। शिक्षा, परिवार, मीडिया और सरकारी तंत्र — सभी को इस राष्ट्रीय पहचान निर्माण की प्रक्रिया में शामिल किया गया है।

शी जिनपिंग की दीर्घकालिक नीति का विस्तार

रिपोर्टों के अनुसार, राष्ट्रपति शी जिनपिंग पिछले कई वर्षों से तिब्बती, उइगर और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों को ऐसी पहचान अपनाने के लिए प्रेरित करते रहे हैं, जिसमें चीनी राष्ट्र और सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी के प्रति वफ़ादारी सर्वोपरि हो। यह नया कानून उसी नीति को एक कानूनी ढाँचे में बाँधने का प्रयास माना जा रहा है।

यह ऐसे समय में आया है जब शिनजियांग और तिब्बत में चीन की नीतियों को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय पहले से ही आलोचनात्मक रुख अपनाए हुए है।

संयुक्त राष्ट्र और विशेषज्ञों की चेतावनी

अप्रैल 2026 में संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विशेषज्ञों ने एक औपचारिक पत्र जारी कर चेतावनी दी थी कि यह कानून तिब्बती, उइगर और मंगोल जैसे समुदायों की भाषा, संस्कृति और धार्मिक स्वतंत्रता पर गहरा आघात कर सकता है।

मेलबर्न की ला ट्रोब यूनिवर्सिटी में चीन की जातीय नीतियों के विशेषज्ञ प्रोफेसर जेम्स लीबोल्ड ने कहा, "सरकार अब एक ही चीनी राष्ट्रीय पहचान बनाने को स्कूलों, परिवारों, मीडिया, संग्रहालयों, सरकारी अधिकारियों, बजट, तकनीकी प्लेटफॉर्म और सुरक्षा एजेंसियों — सभी की जिम्मेदारी बना रही है।" उनके अनुसार, इसका स्पष्ट संदेश यह है कि अल्पसंख्यक समुदाय अपनी पहचान तभी बनाए रख सकते हैं, जब वह कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा निर्धारित चीनी पहचान के अधीन हो।

विदेशों में रहने वाले लोगों पर भी असर का खतरा

विशेषज्ञों ने आगाह किया है कि इस कानून का दायरा केवल चीन की सीमाओं तक सीमित नहीं रह सकता। कथित तौर पर, इसके प्रावधानों का उपयोग उन लोगों के विरुद्ध भी किया जा सकता है जो विदेशों में रहते हैं और जिन पर चीन को नियमों के उल्लंघन का संदेह हो।

गौरतलब है कि मानवाधिकार संगठन सेफगार्ड डिफेंडर्स की 2022 की रिपोर्ट में दावा किया गया था कि दुनियाभर में चीन के 100 से अधिक कथित 'विदेशी पुलिस स्टेशन' संचालित हो रहे हैं, जिनका उपयोग विदेशी धरती पर चीनी नागरिकों की निगरानी, उत्पीड़न और कुछ मामलों में उन्हें वापस चीन भेजने के लिए किया जाता है।

आगे क्या

आलोचकों का कहना है कि इस कानून का प्रभाव दुनियाभर के मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, शोधकर्ताओं और जातीय अल्पसंख्यक मुद्दों पर होने वाली अकादमिक चर्चाओं तक फैल सकता है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने इस कानून की बारीकी से निगरानी करने की बात कही है और संयुक्त राष्ट्र से ठोस कदम उठाने की माँग की जा रही है।

संपादकीय दृष्टिकोण

वे अब कानूनी जामा पहन रही हैं। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि कानून की भाषा इतनी व्यापक है कि इसे विदेशों में रहने वाले प्रवासी चीनी समुदायों पर भी लागू किया जा सकता है — जो संप्रभुता की पारंपरिक सीमाओं को चुनौती देता है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्रतिक्रिया अभी तक निंदा-पत्रों तक सीमित रही है; असली परीक्षा यह है कि क्या संयुक्त राष्ट्र और लोकतांत्रिक देश इससे आगे जाकर ठोस कदम उठाएँगे।
RashtraPress
4 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

चीन का नया जातीय एकता कानून क्या है?
यह 'जातीय एकता और प्रगति संवर्धन कानून' है जो 1 जुलाई 2026 से चीन में लागू हुआ है। इसके तहत अल्पसंख्यक समुदायों पर एकीकृत चीनी राष्ट्रीय पहचान अपनाने का दायित्व डाला गया है और जातीय एकता को 'कमज़ोर' करने वाले किसी भी कार्य पर रोक लगाई गई है।
इस कानून से तिब्बती और उइगर समुदायों पर क्या असर पड़ेगा?
संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विशेषज्ञों के अनुसार, यह कानून तिब्बती, उइगर और मंगोल जैसे समुदायों की भाषा, संस्कृति और धार्मिक स्वतंत्रता पर गंभीर असर डाल सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अल्पसंख्यक पहचान को कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा तय चीनी पहचान के अधीन रखा जाएगा।
संयुक्त राष्ट्र ने इस कानून पर क्या कहा?
अप्रैल 2026 में संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विशेषज्ञों ने एक औपचारिक पत्र जारी कर चेतावनी दी थी कि यह कानून अल्पसंख्यक समुदायों के मूलभूत अधिकारों को प्रभावित कर सकता है। उन्होंने विशेष रूप से भाषाई और धार्मिक स्वतंत्रता पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों की ओर ध्यान दिलाया।
क्या यह कानून विदेशों में रहने वाले चीनी नागरिकों पर भी लागू होगा?
विशेषज्ञों ने आगाह किया है कि इस कानून के प्रावधानों का उपयोग चीन की सीमाओं के बाहर रहने वाले लोगों के विरुद्ध भी किया जा सकता है। सेफगार्ड डिफेंडर्स की 2022 की रिपोर्ट में दुनियाभर में 100 से अधिक कथित चीनी 'विदेशी पुलिस स्टेशनों' का उल्लेख किया गया था जो प्रवासी चीनी नागरिकों पर निगरानी रखते हैं।
प्रोफेसर जेम्स लीबोल्ड ने इस कानून के बारे में क्या कहा?
ला ट्रोब यूनिवर्सिटी, मेलबर्न के विशेषज्ञ प्रोफेसर जेम्स लीबोल्ड ने कहा कि बीजिंग अब 'जातीय एकता' को स्कूलों, परिवारों, मीडिया, सरकारी अधिकारियों और सुरक्षा एजेंसियों — सभी की सामूहिक जिम्मेदारी बना रहा है। उनके अनुसार, स्पष्ट संदेश यह है कि अल्पसंख्यक पहचान केवल कम्युनिस्ट पार्टी की स्वीकृति की शर्त पर ही बनी रह सकती है।
राष्ट्र प्रेस
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