चीन का जातीय एकता कानून: अल्पसंख्यकों पर 'चीनी पहचान' थोपने का नया दबाव, संयुक्त राष्ट्र ने जताई चिंता
सारांश
मुख्य बातें
चीन में 1 जुलाई 2026 से लागू हुए नए 'जातीय एकता और प्रगति संवर्धन कानून' के तहत देश के जातीय अल्पसंख्यक समुदायों पर एक समान चीनी राष्ट्रीय पहचान अपनाने का दबाव तेज़ हो गया है। रिपोर्टों के अनुसार, इस कानून में माता-पिता को यह भी निर्देश दिया गया है कि वे अपने बच्चों में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) के प्रति निष्ठा की भावना विकसित करें। मानवाधिकार विशेषज्ञों ने इसे अल्पसंख्यक संस्कृतियों के लिए गंभीर खतरा बताया है।
कानून में क्या है
नए कानून में स्पष्ट रूप से ऐसे किसी भी कार्य पर रोक लगाई गई है जो 'जातीय एकता को कमज़ोर करे' या समुदायों के बीच विभाजन पैदा करे। चीन में सरकार आधिकारिक रूप से 56 जातीय समुदायों को मान्यता देती है, जिनमें सबसे बड़ा 'हान चीनी' समुदाय है — जो देश की 1.4 अरब आबादी का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा है।
कानून के अनुसार, स्कूलों का पाठ्यक्रम इस प्रकार तैयार किया जाएगा जिससे छात्रों में यह धारणा मज़बूत हो कि वे सभी एक ही चीनी राष्ट्र के अंग हैं। शिक्षा, परिवार, मीडिया और सरकारी तंत्र — सभी को इस राष्ट्रीय पहचान निर्माण की प्रक्रिया में शामिल किया गया है।
शी जिनपिंग की दीर्घकालिक नीति का विस्तार
रिपोर्टों के अनुसार, राष्ट्रपति शी जिनपिंग पिछले कई वर्षों से तिब्बती, उइगर और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों को ऐसी पहचान अपनाने के लिए प्रेरित करते रहे हैं, जिसमें चीनी राष्ट्र और सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी के प्रति वफ़ादारी सर्वोपरि हो। यह नया कानून उसी नीति को एक कानूनी ढाँचे में बाँधने का प्रयास माना जा रहा है।
यह ऐसे समय में आया है जब शिनजियांग और तिब्बत में चीन की नीतियों को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय पहले से ही आलोचनात्मक रुख अपनाए हुए है।
संयुक्त राष्ट्र और विशेषज्ञों की चेतावनी
अप्रैल 2026 में संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विशेषज्ञों ने एक औपचारिक पत्र जारी कर चेतावनी दी थी कि यह कानून तिब्बती, उइगर और मंगोल जैसे समुदायों की भाषा, संस्कृति और धार्मिक स्वतंत्रता पर गहरा आघात कर सकता है।
मेलबर्न की ला ट्रोब यूनिवर्सिटी में चीन की जातीय नीतियों के विशेषज्ञ प्रोफेसर जेम्स लीबोल्ड ने कहा, "सरकार अब एक ही चीनी राष्ट्रीय पहचान बनाने को स्कूलों, परिवारों, मीडिया, संग्रहालयों, सरकारी अधिकारियों, बजट, तकनीकी प्लेटफॉर्म और सुरक्षा एजेंसियों — सभी की जिम्मेदारी बना रही है।" उनके अनुसार, इसका स्पष्ट संदेश यह है कि अल्पसंख्यक समुदाय अपनी पहचान तभी बनाए रख सकते हैं, जब वह कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा निर्धारित चीनी पहचान के अधीन हो।
विदेशों में रहने वाले लोगों पर भी असर का खतरा
विशेषज्ञों ने आगाह किया है कि इस कानून का दायरा केवल चीन की सीमाओं तक सीमित नहीं रह सकता। कथित तौर पर, इसके प्रावधानों का उपयोग उन लोगों के विरुद्ध भी किया जा सकता है जो विदेशों में रहते हैं और जिन पर चीन को नियमों के उल्लंघन का संदेह हो।
गौरतलब है कि मानवाधिकार संगठन सेफगार्ड डिफेंडर्स की 2022 की रिपोर्ट में दावा किया गया था कि दुनियाभर में चीन के 100 से अधिक कथित 'विदेशी पुलिस स्टेशन' संचालित हो रहे हैं, जिनका उपयोग विदेशी धरती पर चीनी नागरिकों की निगरानी, उत्पीड़न और कुछ मामलों में उन्हें वापस चीन भेजने के लिए किया जाता है।
आगे क्या
आलोचकों का कहना है कि इस कानून का प्रभाव दुनियाभर के मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, शोधकर्ताओं और जातीय अल्पसंख्यक मुद्दों पर होने वाली अकादमिक चर्चाओं तक फैल सकता है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने इस कानून की बारीकी से निगरानी करने की बात कही है और संयुक्त राष्ट्र से ठोस कदम उठाने की माँग की जा रही है।