गयाजी में ऑनलाइन पिंडदान का विरोध तेज, गयापाल तीर्थ पुरोहितों ने आंदोलन की चेतावनी दी
सारांश
मुख्य बातें
बिहार के गयाजी में पितृपक्ष 2026 के दौरान ऑनलाइन पिंडदान और पैकेज आधारित व्यवस्थाओं के विरुद्ध गयापाल तीर्थ पुरोहितों का विरोध तीव्र हो गया है। पुरोहितों का कहना है कि पिंडदान एक सनातन, वैदिक और शास्त्र सम्मत धार्मिक विधान है, जिसे किसी ऑनलाइन माध्यम, होटल या व्यावसायिक पैकेज के ज़रिए संपन्न नहीं किया जा सकता। उन्होंने आरोप लगाया है कि ऑनलाइन पिंडदान के नाम पर श्रद्धालुओं के साथ ठगी हो रही है।
पुरोहितों का मुख्य विरोध
श्री विष्णुपद प्रबंधकारिणी समिति के सचिव गजाधर लाल पाठक ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ऑनलाइन पिंडदान की व्यवस्था का धार्मिक ग्रंथों, वेदों और शास्त्रों में कोई प्रमाण नहीं है। उन्होंने बताया कि वे पिछले कई वर्षों से इस व्यवस्था का विरोध करते आ रहे हैं। नारायण सवद सेवक गयापाल पंडा दीपूजी भैया ने भी इस विचार को दोहराया — उनके अनुसार पिंडदान पूरी तरह वैदिक परंपरा पर आधारित धार्मिक विधान है और इसे ऑनलाइन माध्यम से पूरा करना संभव नहीं है।
'सुफल' की परंपरा और उसकी अनिवार्यता
दीपूजी भैया ने बताया कि गयाजी आने वाले पिंडदानियों के लिए 'सुफल' का विशेष धार्मिक महत्व है। परंपरा के अनुसार गया श्राद्ध और पिंडदान की प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद अक्षय वट के नीचे गयावाल तीर्थ पुरोहित द्वारा श्रद्धालुओं को आशीर्वाद दिया जाता है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि श्रद्धालु गयाजी आएंगे ही नहीं, तो उन्हें यहाँ की परंपरा के अनुसार 'सुफल' कैसे प्राप्त होगा। उनका कहना है कि पीढ़ियों से परिवार उन्हीं पुरोहितों के माध्यम से पिंडदान करते आए हैं और बाहरी माध्यमों से यह विधान कराने पर श्रद्धालुओं में भ्रम फैलता है।
ऑनलाइन विज्ञापन और पैकेज पर आपत्ति
वरिष्ठ गयापाल राजन सिजुआर ने बताया कि पितृपक्ष के दौरान अनेक वेबसाइटों पर ऑनलाइन पिंडदान के विज्ञापन और बुकिंग की पेशकश की जा रही है। कहीं कम कीमत में पिंडदान कराने का दावा है, तो कहीं अलग अलग राशि के पैकेज उपलब्ध कराए जा रहे हैं। राजन सिजुआर के अनुसार, "गयाजी का पिंडदान कोई पर्यटन पैकेज नहीं, बल्कि आस्था और धार्मिक परंपरा से जुड़ा विधान है।" उन्होंने पर्यटन विभाग से ऑनलाइन पिंडदान और पैकेज आधारित व्यवस्थाओं पर पुनर्विचार करने की माँग की है।
आंदोलन की चेतावनी
गयापाल तीर्थ पुरोहितों ने सामूहिक रूप से चेतावनी दी है कि यदि ऑनलाइन पिंडदान की बुकिंग और पैकेज व्यवस्था बंद नहीं की गई, तो वे अपनी पारंपरिक वृत्ति और व्यवस्था की रक्षा के लिए सामूहिक आंदोलन की रणनीति तैयार करेंगे। दीपूजी भैया ने कहा कि सनातन परंपरा को केवल औपचारिकता या पैकेज में बदलना उचित नहीं है, और सरकार व श्रद्धालुओं को इस विषय पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
क्या होगा आगे
यह ऐसे समय में आया है जब पितृपक्ष के दौरान गयाजी में देशभर से लाखों श्रद्धालु आते हैं और पिंडदान की परंपरा का पालन करते हैं। फल्गु नदी के किनारे तर्पण और विभिन्न वेदियों पर पिंडदान सदियों पुरानी परंपरा रही है। पुरोहितों और धार्मिक संस्थाओं के इस विरोध के बाद देखना होगा कि पर्यटन विभाग और राज्य सरकार ऑनलाइन पिंडदान की व्यवस्था को लेकर क्या रुख अपनाती है।