7 अक्टूबर 2026
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राहुल-प्रियंका पर FIR: गहलोत बोले- लोकतांत्रिक संस्थाएं खतरनाक दिशा में, मोदी-शाह चुप क्यों?

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राहुल-प्रियंका पर FIR: गहलोत बोले- लोकतांत्रिक संस्थाएं खतरनाक दिशा में, मोदी-शाह चुप क्यों?

सारांश

राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा पर FIR दर्ज होने के बाद गहलोत ने जयपुर में तीखा हमला बोला — लोकतांत्रिक संस्थाएं 'खतरनाक दिशा' में जा रही हैं। 300 सांसदों को चुनाव आयोग से मिलने से रोके जाने और मोदी-शाह की चुप्पी को उन्होंने लोकतंत्र के लिए गंभीर संकट बताया।

मुख्य बातें

अशोक गहलोत ने 7 अक्टूबर 2026 को जयपुर में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा पर दर्ज एफआईआर की कड़ी आलोचना की।
कथित तौर पर लगभग 300 सांसदों को चुनाव आयोग के अधिकारियों से मिलने की अनुमति नहीं मिली, जिसके बाद विरोध प्रदर्शन हुआ।
गहलोत ने कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल के साथ पुलिस के 'आपत्तिजनक आचरण' का भी ज़िक्र किया।
पूर्व मुख्यमंत्री ने भारत की लोकतांत्रिक स्थिति की तुलना चीन, रूस और उत्तर कोरिया से करते हुए संस्थाओं के कमज़ोर होने की चेतावनी दी।
प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की ओर से घटनाक्रम पर कोई सार्वजनिक बयान न आने पर गहलोत ने सवाल उठाए।

राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता अशोक गहलोत ने 7 अक्टूबर 2026 को जयपुर में मीडिया से बातचीत करते हुए कांग्रेस नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा के खिलाफ दर्ज एफआईआर की कड़ी आलोचना की और चेतावनी दी कि देश में लोकतांत्रिक संस्थाएं 'खतरनाक दिशा' में बढ़ रही हैं। उन्होंने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए सवाल किया कि क्या भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था को उसी तरह कमज़ोर किया जा रहा है, जैसा — उनके विचार में — चीन, रूस और उत्तर कोरिया जैसे देशों में हुआ है।

मुख्य घटनाक्रम

दिल्ली में आकाशवाणी भवन के निकट हुए विरोध प्रदर्शन के बाद राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई, जिससे राजनीतिक तनाव तेज़ हो गया। गहलोत के अनुसार, यह विरोध प्रदर्शन इसलिए आयोजित किया गया था क्योंकि कथित तौर पर लगभग 300 सांसदों को चुनाव आयोग के अधिकारियों से मिलने की अनुमति नहीं दी गई। सांसद विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) और 'वोट चोरी' के आरोपों से जुड़े सवालों पर चुनाव आयोग से स्पष्टीकरण माँगने गए थे।

पूर्व मुख्यमंत्री ने यह भी आरोप लगाया कि कांग्रेस महासचिव (संगठन) केसी वेणुगोपाल के साथ पुलिस का व्यवहार 'आपत्तिजनक' रहा। उन्होंने कहा कि नेताओं को हिरासत में लिया गया और बाद में उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर दी गई।

गहलोत के आरोप और तुलना

गहलोत ने कहा कि सरकार और प्रशासन की ऐसी कार्रवाइयाँ उनके लिए 'अप्रत्याशित नहीं थीं' और टिप्पणी की कि 'वे कुछ भी कर सकते हैं।' उन्होंने भारत की वर्तमान स्थिति की तुलना चीन, रूस और उत्तर कोरिया जैसे देशों से करते हुए सवाल उठाया कि क्या लोकतंत्र इन बढ़ते तानाशाही कदमों के बीच टिक पाएगा।

गौरतलब है कि गहलोत स्वयं लगभग दो दशकों तक संसद परिसर में काम कर चुके हैं और उन्होंने इसे 'अत्यंत सुरक्षित स्थान' बताया। उनके अनुसार, यदि तीनों चुनाव आयुक्त इंडिया ब्लॉक के सांसदों से मिलते, तो मुद्दों का 'पारदर्शी ढंग से समाधान' संभव होता।

लोकतांत्रिक संस्थाओं पर चिंता

पूर्व मुख्यमंत्री ने ज़ोर देकर कहा कि यह मामला केवल किसी एक राजनीतिक दल या कुछ नेताओं का नहीं है, बल्कि यह पूरे देश के नागरिकों — विशेषकर युवाओं और आने वाली पीढ़ी — के भविष्य से जुड़ा है। उन्होंने कहा कि देश में लोकतांत्रिक संस्थाएं धीरे-धीरे कमज़ोर हो रही हैं और यह स्थिति 'गंभीर चिंता का विषय' है।

यह ऐसे समय में आया है जब विपक्षी दल पहले से ही चुनाव आयोग की निष्पक्षता और एसआईआर प्रक्रिया पर सवाल उठाते रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि विपक्षी नेताओं के खिलाफ एफआईआर का यह सिलसिला एक व्यापक पैटर्न का हिस्सा है।

मोदी-शाह की चुप्पी पर सवाल

गहलोत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की ओर से इस पूरे घटनाक्रम पर कोई सार्वजनिक बयान न आने पर भी सवाल उठाए। उनके अनुसार, देश भर में जारी विरोध प्रदर्शनों के मद्देनज़र शीर्ष नेतृत्व की जवाबदेही स्पष्ट रूप से दिखाई देनी चाहिए थी। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री और गृह मंत्री की चुप्पी वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था के कामकाज पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

आगे की स्थिति

राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा के खिलाफ दर्ज एफआईआर को लेकर कांग्रेस के भीतर आक्रोश गहरा है और पार्टी के नेताओं ने देश भर में विरोध प्रदर्शन की घोषणा की है। आने वाले दिनों में यह मामला संसद और न्यायपालिका दोनों स्तरों पर और तीखा होने की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

रूस और उत्तर कोरिया से करना राजनीतिक रूप से तीखा है, लेकिन इसमें एक वास्तविक संवैधानिक सवाल छुपा है — जब निर्वाचित सांसद चुनाव आयोग से मिलने की कोशिश करें और कथित तौर पर नाकाम रहें, तो संस्थागत पहुँच का सवाल उठना स्वाभाविक है। एफआईआर को विपक्षी नेताओं की आवाज़ दबाने के औज़ार के रूप में इस्तेमाल करने का आरोप नया नहीं है — यह पैटर्न पिछले कई वर्षों से विपक्षी खेमे द्वारा उठाया जाता रहा है। मुख्यधारा की कवरेज अक्सर राजनीतिक बयानबाज़ी पर केंद्रित रह जाती है, जबकि असली सवाल यह है कि एसआईआर प्रक्रिया में पारदर्शिता क्यों नहीं दिखाई गई और चुनाव आयोग ने सांसदों से मिलने से इनकार क्यों किया — इन सवालों का जवाब अभी बाकी है।
RashtraPress
7 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा पर FIR किस घटना के बाद दर्ज हुई?
दिल्ली में आकाशवाणी भवन के निकट हुए विरोध प्रदर्शन के बाद राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई। यह प्रदर्शन तब हुआ जब कथित तौर पर लगभग 300 इंडिया ब्लॉक के सांसदों को चुनाव आयोग के अधिकारियों से मिलने की अनुमति नहीं दी गई।
गहलोत ने चुनाव आयोग पर क्या सवाल उठाए?
गहलोत ने सवाल किया कि चुनाव आयोग के अधिकारी इंडिया ब्लॉक के सांसदों से मिलने के लिए तैयार क्यों नहीं थे। उनके अनुसार, यदि तीनों चुनाव आयुक्त सांसदों से मिलते, तो विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) और 'वोट चोरी' के आरोपों से जुड़े सवालों का पारदर्शी समाधान हो सकता था।
गहलोत ने भारत की तुलना किन देशों से की और क्यों?
गहलोत ने सवाल किया कि क्या भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था को चीन, रूस और उत्तर कोरिया जैसे देशों की तरह कमज़ोर किया जा रहा है। यह टिप्पणी उन्होंने विपक्षी नेताओं पर FIR दर्ज होने और कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल के साथ कथित पुलिस दुर्व्यवहार के संदर्भ में की।
प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री शाह की चुप्पी पर गहलोत ने क्या कहा?
गहलोत ने सवाल उठाया कि देश भर में जारी विरोध प्रदर्शनों के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने घटनाक्रम पर कोई सार्वजनिक बयान क्यों नहीं दिया। उनके अनुसार शीर्ष नेतृत्व की यह चुप्पी वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था के कामकाज पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
गहलोत के अनुसार यह मुद्दा आम नागरिकों को कैसे प्रभावित करता है?
गहलोत ने कहा कि यह मामला केवल किसी एक राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि पूरे देश के नागरिकों — विशेषकर युवाओं और आने वाली पीढ़ी — के भविष्य से जुड़ा है। उनके अनुसार, लोकतांत्रिक संस्थाओं का धीरे-धीरे कमज़ोर होना हर नागरिक के अधिकारों के लिए खतरा है।
राष्ट्र प्रेस
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