आईआईटी गुवाहाटी की नई तकनीक: अरबी के पौधों से साफ होगा पशुपालन का जहरीला पानी
सारांश
मुख्य बातें
आईआईटी गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने पशुपालन से निकलने वाले अत्यधिक प्रदूषित अपशिष्ट जल को प्राकृतिक रूप से शुद्ध करने के लिए एक नवीन, कम ऊर्जा-खपत वाली जल उपचार प्रणाली विकसित की है, जिसमें अरबी (कोलोकैसिया एस्कुलेंटा) के पौधों का उपयोग किया गया है। 5 अक्टूबर 2026 को सामने आए इस शोध के निष्कर्ष जर्नल ऑफ एनवायर्नमेंटल मैनेजमेंट में प्रकाशित हुए हैं। यह तकनीक विशेष रूप से उन ग्रामीण और संसाधन-सीमित क्षेत्रों के लिए उपयोगी बताई जा रही है, जहाँ पारंपरिक जल उपचार संयंत्र स्थापित करना संभव नहीं है।
तकनीक का मूल आधार
आईआईटी गुवाहाटी के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के अपशिष्ट प्रबंधन अनुसंधान समूह ने यह प्रणाली तैयार की है। इसकी सबसे अनूठी विशेषता इसका जिग-जैग प्रवाह डिजाइन है, जिसमें प्रणाली के भीतर विशेष अवरोध लगाए गए हैं। इन अवरोधों के कारण प्रदूषित जल सीधे बाहर निकलने के बजाय एक लंबे और घुमावदार मार्ग से गुजरता है, जिससे अरबी की जड़ों, लाभकारी सूक्ष्मजीवों और बजरी आधारित माध्यम के साथ उसका संपर्क समय बढ़ जाता है।
इस प्रक्रिया में पानी वायवीय और अल्प-वायवीय दोनों अवस्थाओं से होकर गुजरता है, जिससे जैविक और रासायनिक उपचार प्रक्रियाएँ अधिक प्रभावशाली ढंग से काम कर पाती हैं। गौरतलब है कि यह पारंपरिक क्षैतिज उप-सतह प्रवाह प्रणालियों से संरचनात्मक रूप से भिन्न है।
प्रयोगों में उल्लेखनीय परिणाम
शोध के लिए असम स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद-राष्ट्रीय शूकर अनुसंधान केंद्र से सूअर पालन का अपशिष्ट जल लिया गया। प्रयोगों में पानी में मौजूद कुल कोलीफॉर्म की मात्रा लगभग 60,000 एमपीएन प्रति 100 मिलीलीटर से घटकर 1,200 एमपीएन प्रति 100 मिलीलीटर रह गई। वहीं ई. कोलाई का स्तर करीब 2,200 से घटकर 350 एमपीएन प्रति 100 मिलीलीटर हो गया।
इसके अतिरिक्त प्रणाली ने कार्बनिक प्रदूषकों, पोषक तत्वों, निलंबित ठोस पदार्थों, धातुओं और हानिकारक सूक्ष्मजीवों की मात्रा में भी उल्लेखनीय कमी दर्ज की। प्याज आधारित जैव-परीक्षण में उपचार के बाद पानी की विषाक्तता में महत्वपूर्ण गिरावट देखी गई, जो यह दर्शाती है कि यह प्रणाली केवल प्रदूषकों की सांद्रता नहीं घटाती, बल्कि जल के जैविक जोखिम को भी कम करती है।
पौधों की वृद्धि भी हुई प्रभावशाली
एक रोचक पहलू यह रहा कि उपचार प्रक्रिया में उपयोग की गई अरबी की वृद्धि भी उल्लेखनीय रही। अध्ययन के दौरान पौधों की लंबाई लगभग दोगुनी हो गई, जबकि उनका जैवभार चार गुना से अधिक बढ़ गया। यह इस बात का संकेत है कि अपशिष्ट जल में मौजूद पोषक तत्व पौधों की वृद्धि में सहायक होते हैं, जो इस प्रणाली को संसाधन-पुनर्चक्रण की दृष्टि से भी उपयोगी बनाता है।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
आईआईटी गुवाहाटी के प्रोफेसर अजय एस. कलामधद ने बताया कि इस शोध का उद्देश्य केवल प्रदूषण के संकेतकों को घटाना नहीं था, बल्कि अपशिष्ट जल को पर्यावरण की दृष्टि से जैविक रूप से अधिक सुरक्षित बनाना भी था। उन्होंने कहा कि इस प्रणाली में इंजीनियरिंग के माध्यम से जल प्रवाह को नियंत्रित करते हुए पौधों और सूक्ष्मजीवों की प्राकृतिक उपचार क्षमता का दोहन किया गया है।
शोधार्थी मोनिश गोस्वामी ने बताया कि पारंपरिक प्रणालियों की तुलना में इसमें लगाए गए आंतरिक अवरोध पानी को लंबा रास्ता तय करने पर बाध्य करते हैं, जिससे उपचार प्रक्रिया की दक्षता बढ़ती है।
आगे की राह
अब शोधकर्ताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस प्रयोगशाला स्तर की तकनीक को वास्तविक क्षेत्रीय परिस्थितियों में आज़माना है। इसके लिए दीर्घकालिक क्षेत्रीय परीक्षण योजनाबद्ध हैं, ताकि विविध भौगोलिक और जलवायु परिस्थितियों में इस प्रणाली की प्रभावशीलता की जाँच हो सके। यह तकनीक आने वाले वर्षों में भारत के दूरदराज के पशुपालन क्षेत्रों में किफ़ायती और टिकाऊ अपशिष्ट जल उपचार का विकल्प बन सकती है।