भारत अमेरिका की पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद पर उदासीनता से निराश: नई रिपोर्ट
सारांश
Key Takeaways
- पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद पर अमेरिका की उदासीनता भारत की सुरक्षा के लिए चिंता का विषय है।
- कश्मीर पर अमेरिका को भारत के रुख का सम्मान करना चाहिए।
- गहरे रणनीतिक अविश्वास के बावजूद, आर्थिक और रक्षा संबंध बने हुए हैं।
- अंतरिम व्यापार समझौता दोनों देशों के रिश्तों में सुधार का अवसर प्रदान करता है।
- भारत की भूमिका हिंद-प्रशांत क्षेत्र में महत्वपूर्ण है।
वाशिंगटन, 30 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। पाकिस्तान ने हमेशा से भारत के खिलाफ आतंकवाद को बढ़ावा देने का काम किया है। एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के प्रति अमेरिका की कम सक्रियता के कारण भारत में निराशा बढ़ी है। यह पाकिस्तानी आतंकवाद भारत की सुरक्षा के लिए एक गंभीर चिंता का विषय बन गया है।
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि अमेरिका को कश्मीर पर भारत के स्पष्ट रुख का सम्मान करना चाहिए। इसके अलावा, अमेरिका को इस मुद्दे पर किसी भी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता से बचना चाहिए।
थिंक टैंक 'सेंटर फॉर ए न्यू अमेरिकन सिक्योरिटी' द्वारा प्रकाशित एक नीति पत्र में चेतावनी दी गई है कि आवश्यक क्षेत्रों में सहयोग के बावजूद, अमेरिका और भारत के बीच संबंधों में गहरा रणनीतिक अविश्वास बना हुआ है।
रिपोर्ट, जिसका शीर्षक है 'रिपेयरिंग द ब्रीच: गेटिंग अमेरिका-भात टाईज बैक ऑन ट्रैक', में कहा गया है कि 2025 में शुरू हुआ तनाव अब भी पूरी तरह से समाप्त नहीं हुआ है और इसे ठीक होने में समय लगेगा।
इस रिपोर्ट के लेखक लिसा कर्टिस, कीर्ति मार्टिन और सितारा गुप्ता ने बताया कि 2025 में दोनों देशों के बीच संबंधों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा। रिपोर्ट में भारत और पाकिस्तान के बीच सीजफायर और भारतीय एक्सपोर्ट पर अमेरिका के भारी टैरिफ लगाने के मसले पर मतभेदों का जिक्र किया गया है।
रिपोर्ट के अनुसार, फरवरी 2026 में एक अंतरिम व्यापार समझौते का ढांचा 'दोनों देशों को अपने रिश्ते को सुधारने का अवसर' प्रदान करता है, लेकिन विश्वास पुनः स्थापित करने के लिए लगातार प्रयासों की आवश्यकता होगी।
इसमें यह भी बताया गया है कि आर्थिक, रक्षा और तकनीकी संबंध काफी हद तक स्थिर बने हुए हैं, लेकिन पाकिस्तान और आतंकवाद को लेकर मतभेद गहरे बने हुए हैं।
नई दिल्ली इस बात से निराश है कि अमेरिका ने 'द रेजिस्टेंस फ्रंट' को आतंकवादी समूह के रूप में घोषित करने के बावजूद पाकिस्तान से उत्पन्न आतंकवाद पर ध्यान नहीं दिया है। भारत हमेशा से ही कश्मीर के मामले में किसी बाहरी हस्तक्षेप का विरोध करता आया है। रिपोर्ट में इस बात का भी जिक्र किया गया है।
रिपोर्ट में यह चेतावनी भी दी गई है कि अमेरिका द्वारा मध्यस्थता के सुझाव देने वाले बयानों से दोनों देशों के बीच विश्वास को और नुकसान पहुंच सकता है।
रिपोर्ट में यह सलाह दी गई है कि अमेरिका को कश्मीर मुद्दे पर विवाद में मध्यस्थता से बचना चाहिए और उन क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जहाँ सहयोग संभव है।
हालांकि, रिपोर्ट में डिफेंस कोऑपरेशन में निरंतर तेजी के संकेत भी हैं। भारत और अमेरिका ने पिछले साल 10 साल के रक्षा फ्रेमवर्क समझौते को आगे बढ़ाया है, जिसमें इंटेलिजेंस शेयरिंग, समुद्री सुरक्षा और रक्षा तकनीक सहयोग शामिल हैं।
पिछले साल अमेरिका और भारत के बीच टैरिफ को लेकर भारी तनाव उत्पन्न हुआ, लेकिन दोनों देशों के बीच एक अंतरिम व्यापार समझौते में टैरिफ को कम कर दिया गया। रिपोर्ट में आर्थिक संबंधों में सुधार के संकेत दिए गए हैं।
इसमें ऊर्जा, आवश्यक खनिज, फार्मास्यूटिकल्स, और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी उन्नत तकनीकों में गहरे सहयोग के लिए आवश्यक क्षेत्रों के रूप में पहचाना गया है। भारत के न्यूक्लियर एनर्जी में सुधार और आवश्यक खनिजों में निवेश उसे एक मजबूत सप्लाई चेन का संभावित भागीदार बनाते हैं, विशेषकर इसलिए क्योंकि दोनों देश चीन पर निर्भरता कम करना चाहते हैं।
भारत के डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और डेटा सेंटर्स में अमेरिका का निवेश लंबे समय तक तकनीकी निर्भरता को मजबूत करने के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, रिपोर्ट में यह भी चेतावनी दी गई है कि जब तक राजनीतिक अविश्वास दूर नहीं होता, ये लाभ सीमित रह सकते हैं।
रिपोर्ट में 'काउंटरटेररिज्म' सहयोग को नए सिरे से ध्यान केंद्रित करने की बात कही गई है, जिसमें आतंकवाद की फंडिंग को रोकने और वैश्विक मंच पर समन्वय को मजबूत करने के प्रयास शामिल हैं।
इस रिपोर्ट का सार यह है कि भारत हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा और अमेरिका-भारत संबंध क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को तय करने में महत्वपूर्ण होंगे।
साथ ही, साझेदारी की गुणवत्ता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्षेत्र में शक्ति संतुलन है या नहीं, और क्या चीन प्रमुख शक्ति बनने में सफल होता है।