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ईरान परमाणु समझौता करे या आर्थिक तबाही झेले: अमेरिकी रक्षा सचिव हेगसेथ की दो टूक चेतावनी

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ईरान परमाणु समझौता करे या आर्थिक तबाही झेले: अमेरिकी रक्षा सचिव हेगसेथ की दो टूक चेतावनी

सारांश

अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने ईरान को दो टूक चेतावनी दी — परमाणु समझौता करो या आर्थिक बर्बादी झेलो। होर्मुज जलडमरूमध्य पर अमेरिकी नौसेना का पूर्ण नियंत्रण, एक जहाज पर कब्जा और दूसरे विमानवाहक युद्धपोत की तैनाती से खाड़ी में तनाव चरम पर।

मुख्य बातें

रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने 24 अप्रैल 2025 को पेंटागन से ईरान को दो टूक चेतावनी दी — परमाणु समझौता करो या आर्थिक बर्बादी झेलो।
ऑपरेशन एपिक फ्यूरी के तहत अमेरिकी नौसेना ओमान की खाड़ी से होर्मुज जलडमरूमध्य तक कड़ी नाकेबंदी लागू कर रही है।
इस सप्ताह एक कंटेनर जहाज के इंजन रूम पर फायर कर मरीन सैनिकों ने उसे अपने कब्जे में ले लिया।
आने वाले दिनों में एक और विमानवाहक युद्धपोत इस अभियान में शामिल होगा, जिससे नाकेबंदी और सख्त होगी।
हिंद-प्रशांत और हिंद महासागर क्षेत्र में ईरान के प्रतिबंधित तेल टैंकरों को भी रोका गया है।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की शर्त — ईरान को परमाणु कार्यक्रम "सच्चे और जांच योग्य तरीके से" पूरी तरह छोड़ना होगा, तभी बातचीत संभव है।

वॉशिंगटन, 24 अप्रैल 2025 — अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने शुक्रवार को पेंटागन में साफ शब्दों में कहा कि ईरान के सामने अब केवल दो विकल्प बचे हैं — या तो वह परमाणु समझौते पर सहमत हो, या फिर अमेरिका की लगातार कड़ी होती नौसैनिक नाकेबंदी के चलते भारी आर्थिक संकट का सामना करे। उन्होंने यह भी घोषणा की कि होर्मुज जलडमरूमध्य से कोई भी जहाज अमेरिकी नौसेना की अनुमति के बिना नहीं गुजर सकता।

ऑपरेशन एपिक फ्यूरी: निर्णायक सैन्य कार्रवाई

हेगसेथ ने बताया कि "ऑपरेशन एपिक फ्यूरी" ने कुछ ही हफ्तों में वे सैन्य नतीजे हासिल किए हैं जो पुराने समय के लंबे युद्ध वर्षों और दशकों में भी नहीं दे पाते थे। उन्होंने इसे अमेरिकी सैन्य रणनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत बताया।

अमेरिकी नौसेना ओमान की खाड़ी से लेकर अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र तक कड़ी नाकाबंदी लागू कर रही है। हेगसेथ ने चेतावनी दी कि ईरान के बंदरगाहों से आने-जाने वाले किसी भी जहाज को नियम उल्लंघन पर तुरंत वापस भेजा जाएगा। इस समय 34 गैर-ईरानी जहाजों को आवागमन की अनुमति दी गई है।

जहाज पर कब्जा: अमेरिकी ताकत का प्रदर्शन

ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के अध्यक्ष वायुसेना जनरल डैन केन ने बताया कि इस सप्ताह एक बड़े कंटेनर जहाज ने बार-बार चेतावनियों को नजरअंदाज किया। इसके बाद सेंट्रल कमांड ने जहाज को निष्क्रिय करने की अनुमति दी।

अमेरिकी सेना ने जहाज के इंजन रूम पर फायर किया और फिर मरीन सैनिकों ने उस पर कब्जा कर लिया। वह जहाज और उसका पूरा चालक दल अब अमेरिकी नियंत्रण में सुरक्षित है। जनरल केन ने स्पष्ट किया कि ऐसे समुद्री रोकथाम अभियान आगे भी जारी रहेंगे।

वैश्विक तेल व्यापार पर असर और सहयोगियों को संदेश

पेंटागन ने बताया कि हिंद-प्रशांत और हिंद महासागर क्षेत्र सहित दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में ईरान के प्रतिबंधित तेल शिपमेंट को रोका गया है। इनमें बड़े-बड़े तेल टैंकर भी शामिल हैं।

हेगसेथ ने यूरोप और एशिया के सहयोगी देशों को कड़े शब्दों में कहा कि "अब मुफ्त में फायदा उठाने का समय खत्म हो गया है।" उन्होंने कहा कि यूरोप और एशिया होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले तेल पर भारी निर्भर हैं, इसलिए उन्हें समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा में अपनी जिम्मेदारी खुद उठानी होगी।

ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स पर गंभीर आरोप

हेगसेथ ने ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स पर आरोप लगाया कि वे "समुद्री डाकुओं" की तरह व्यवहार करते हैं और वाणिज्यिक जहाजों पर हमले कर क्षेत्र में अस्थिरता फैलाते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका ने उन तेज नावों पर कार्रवाई की अनुमति दी है जो समुद्र में बारूदी सुरंगें लगा रही थीं।

हेगसेथ ने चेतावनी दी, "अगर ईरान पानी में बारूदी सुरंगें लगाता है, तो हम उन्हें बिना हिचक नष्ट कर देंगे।" उन्होंने बताया कि आने वाले कुछ दिनों में एक और विमानवाहक युद्धपोत इस अभियान में शामिल होगा, जिससे नाकेबंदी और मजबूत होगी।

ट्रंप की शर्त: परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह छोड़ना होगा

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का जिक्र करते हुए हेगसेथ ने कहा कि राष्ट्रपति समझौते को लेकर बहुत उत्सुक नहीं हैं, लेकिन अगर ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को "सच्चे और जांच योग्य तरीके से" पूरी तरह छोड़ देता है, तो बातचीत की संभावना खुली रह सकती है।

गौरतलब है कि 2015 में ओबामा प्रशासन के दौरान हुए JCPOA परमाणु समझौते से ट्रंप ने 2018 में अमेरिका को बाहर निकाल लिया था। तब से ईरान ने अपने यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम को काफी आगे बढ़ा लिया है, जो अब 90% शुद्धता के करीब पहुंच रहा है — हथियार-ग्रेड स्तर के बेहद नजदीक। यह वह पृष्ठभूमि है जिसमें अमेरिका का यह सैन्य दबाव समझा जाना चाहिए।

होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के तेल व्यापार का सबसे अहम रास्ता है, जहां से वैश्विक समुद्री कच्चे तेल का करीब 20% गुजरता है। किसी भी रुकावट से वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर तत्काल और गहरा असर पड़ सकता है — और भारत जैसे देश, जो खाड़ी से बड़े पैमाने पर तेल आयात करते हैं, सीधे प्रभावित हो सकते हैं।

आने वाले दिनों में अमेरिका-ईरान परमाणु वार्ता की दिशा और नाकेबंदी की तीव्रता पर पूरी दुनिया की नजर रहेगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि ट्रंप प्रशासन की उस 'अधिकतम दबाव' नीति का नया और आक्रामक संस्करण है जो 2018 में JCPOA से बाहर निकलने के बाद से चली आ रही है। विडंबना यह है कि जिस होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा के लिए अमेरिका यूरोप और एशिया को जिम्मेदारी उठाने को कह रहा है, उसी पर एकतरफा नियंत्रण का दावा भी कर रहा है — यह दोहरा रवैया सहयोगी देशों में असहजता पैदा कर सकता है। भारत के लिए यह स्थिति विशेष रूप से नाजुक है क्योंकि वह ईरान से सस्ते तेल और चाबहार बंदरगाह के रिश्ते भी बनाए रखना चाहता है और अमेरिका से रणनीतिक साझेदारी भी। मुख्यधारा की कवरेज जो चूक जाती है वह यह है कि इस नाकेबंदी का सबसे बड़ा आर्थिक असर पश्चिम पर नहीं, बल्कि एशियाई तेल आयातक देशों पर पड़ेगा।
RashtraPress
9 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अमेरिका ने ईरान को क्या चेतावनी दी है?
अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने कहा है कि ईरान के पास दो ही विकल्प हैं — परमाणु समझौता करे या अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी के कारण भारी आर्थिक संकट झेले। होर्मुज जलडमरूमध्य से कोई भी जहाज अब अमेरिकी अनुमति के बिना नहीं गुजर सकता।
ऑपरेशन एपिक फ्यूरी क्या है?
ऑपरेशन एपिक फ्यूरी अमेरिका का वह सैन्य अभियान है जो ईरान पर नौसैनिक दबाव बढ़ाने के लिए चलाया जा रहा है। हेगसेथ के अनुसार इसने कुछ ही हफ्तों में निर्णायक सैन्य नतीजे दिए हैं और एक जहाज पर मरीन सैनिकों ने कब्जा भी किया है।
होर्मुज जलडमरूमध्य इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के समुद्री तेल व्यापार का सबसे अहम रास्ता है, जहां से वैश्विक कच्चे तेल का करीब 20% हिस्सा गुजरता है। यहां किसी भी रुकावट से वैश्विक ऊर्जा बाजारों और भारत जैसे तेल आयातक देशों पर सीधा असर पड़ सकता है।
क्या ईरान और अमेरिका के बीच परमाणु वार्ता हो सकती है?
हेगसेथ ने कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप समझौते को लेकर उत्सुक नहीं हैं, लेकिन अगर ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को सच्चे और जांच योग्य तरीके से पूरी तरह छोड़ दे तो बातचीत की संभावना खुली है। 2015 के JCPOA समझौते से ट्रंप 2018 में बाहर निकल गए थे।
भारत पर इस अमेरिकी नाकेबंदी का क्या असर पड़ेगा?
भारत खाड़ी देशों से बड़े पैमाने पर कच्चा तेल आयात करता है और होर्मुज जलडमरूमध्य उसका मुख्य मार्ग है। अमेरिकी नाकेबंदी के कारण तेल आपूर्ति बाधित होने पर भारत में ऊर्जा लागत बढ़ सकती है और चाबहार बंदरगाह परियोजना भी प्रभावित हो सकती है।
राष्ट्र प्रेस
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