इस्लामाबाद की खामोशी: ईरान वार्ता की उम्मीद, लेकिन भरोसे के सवाल बरकरार
सारांश
Key Takeaways
- संघर्षविराम: ईरान और अमेरिका के बीच अस्थायी संघर्षविराम की घोषणा।
- पाकिस्तान की मध्यस्थता: वार्ता में पाकिस्तान की महत्वपूर्ण भूमिका।
- भरोसे की कमी: ईरान के भीतर वार्ता की सफलता पर संदेह।
- वैश्विक प्रभाव: बातचीत का प्रभाव पश्चिम एशिया की स्थिरता पर।
- सुरक्षा इंतजाम: इस्लामाबाद में कड़ी सुरक्षा के बीच वार्ता का आयोजन।
नई दिल्ली, 9 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान की सभ्यता को समाप्त करने की समय सीमा के कुछ घंटे पहले पाकिस्तानी मध्यस्थता का उल्लेख करते हुए सीजफायर की घोषणा की। उन्होंने कहा कि यह संघर्ष विराम अगले 2 हफ्तों तक जारी रहेगा।
इसके बाद यह उम्मीद की गई कि स्थिति सामान्य हो जाएगी। इस पर पूरी दुनिया ने खुशी व्यक्त की। पाकिस्तान में खुशी की लहर दौड़ गई, लेकिन इसके बाद इजरायल की कार्रवाई और अमेरिका के बयानों ने वर्तमान स्थिति के भरोसे को लेकर संदेह पैदा कर दिए हैं।
उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ के बयानों में ऐसा कुछ था जो ईरान के सीजफायर के भविष्य पर सवाल उठाता है। इजरायल द्वारा लेबनान पर हमले का दावा और ट्रंप का कहना कि हिज्बुल्लाह को लेकर समझौते में कोई उल्लेख नहीं है, इस समझौते को संदिग्ध बनाता है। हालांकि पाकिस्तान का कहना है कि हिज्बुल्लाह इसका हिस्सा था।
इस बीच, पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में इस समय असामान्य खामोशी है। सड़कों पर सामान्य गतिविधियों के बजाय सुरक्षा बलों की उपस्थिति बढ़ गई है और कई क्षेत्रों में आवाजाही पर रोक लगा दी गई है। इसका कारण है ईरान के उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल का आगमन, जो एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक वार्ता के लिए यहां आने वाला है।
हालांकि एक अस्थायी संघर्षविराम के बाद शुरू हो रही इस वार्ता से उम्मीदें हैं, लेकिन इसकी सफलता पर संदेह भी गहरा है। पाकिस्तान ने इस प्रक्रिया में मध्यस्थ की भूमिका निभाते हुए दोनों पक्षों को बातचीत की मेज तक लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिसे उसकी कूटनीतिक सक्रियता के रूप में देखा जा रहा है।
शहर में लागू सुरक्षा इंतजाम इस बात का संकेत हैं कि इस वार्ता को कितना संवेदनशील माना जा रहा है। विशेष रूप से डिप्लोमैटिक एन्क्लेव और सरकारी परिसरों के आस-पास कड़ी निगरानी रखी जा रही है। प्रशासन किसी भी संभावित खतरे या विरोध को रोकने के लिए पूरी तरह सतर्क है।
हालांकि, इस पूरी प्रक्रिया के पीछे एक बड़ी चुनौती भरोसे की कमी है। ईरान के भीतर इस बात को लेकर शंका है कि क्या यह वार्ता वास्तव में किसी ठोस समाधान तक पहुंच पाएगी या यह केवल तनाव को अस्थायी रूप से टालने का प्रयास है। पिछले अनुभवों और बार-बार संघर्षविराम उल्लंघनों के आरोप ने इस अविश्वास को और बढ़ा दिया है।
बातचीत का दायरा केवल द्विपक्षीय मुद्दों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव संपूर्ण पश्चिम एशिया की स्थिरता, वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ सकता है। यही कारण है कि दुनिया की निगाहें इस्लामाबाद पर टिकी हैं, जहाँ बंद सड़कों और कड़ी सुरक्षा के बीच शांति की एक कठिन कोशिश चल रही है।
ईरानी संसद के स्पीकर एमबी घालिबाफ ने 10 में से तीन शर्तों के उल्लंघन का आरोप अमेरिका पर लगाया है, वहीं पाकिस्तान में ईरान के एम्बेसडर, रेजा अमीरी मोगादम ने एक्स पर एक पोस्ट डिलीट कर दी, जिसमें कहा गया था कि ईरान का एक डेलीगेशन गुरुवार रात अमेरिका के साथ बातचीत के लिए इस्लामाबाद आने वाला है।
मोगादम ने लिखा था: “इजरायली सरकार द्वारा बार-बार सीजफायर तोड़ने की वजह से ईरानी जनमत पर संदेह के बावजूद... ईरान के बताए 10 मुद्दों पर गंभीर बातचीत के लिए ईरानी डेलीगेशन आज रात इस्लामाबाद आ रहा है।”