23 सितंबर 2026
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इटली के बुर्का-नकाब बैन प्रस्ताव पर हरिद्वार के संतों का समर्थन, भारत में भी लागू करने की माँग

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इटली के बुर्का-नकाब बैन प्रस्ताव पर हरिद्वार के संतों का समर्थन, भारत में भी लागू करने की माँग

सारांश

इटली के बुर्का-नकाब बैन प्रस्ताव की गूँज अब हरिद्वार तक पहुँची। संत करौली शंकर ने इसे महिलाओं और सुरक्षा दोनों के हित में बताते हुए भारत में भी — खासकर स्कूलों में — एकसमान ड्रेस कोड लागू करने की माँग उठाई।

मुख्य बातें

हरिद्वार के संत करौली शंकर ने 23 सितंबर 2026 को इटली के बुर्का-नकाब बैन प्रस्ताव का स्वागत किया।
संतों ने कहा कि इस तरह का नियम भारत में भी लागू होना चाहिए, खासकर स्कूलों में।
सुरक्षा चिंता का हवाला देते हुए कहा — बुर्के की आड़ में अपराध करने की घटनाएँ सामने आई हैं।
संत ने स्पष्ट किया कि वयस्क महिलाओं के व्यक्तिगत पहनावे में हस्तक्षेप का अधिकार किसी को नहीं।
फ्रांस ने 2011 में सार्वजनिक स्थलों पर चेहरा ढकने पर प्रतिबंध लगाया था; इटली का प्रस्ताव उसी क्रम में है।

हरिद्वार के साधु-संतों ने 23 सितंबर 2026 को इटली में बुर्का और नकाब पर प्रतिबंध के प्रस्ताव का खुलकर स्वागत किया और माँग की कि इस तरह का नियम भारत में भी लागू किया जाए। संतों का कहना है कि यह कदम महिलाओं के हित और सार्वजनिक सुरक्षा — दोनों के लिहाज़ से ज़रूरी है।

संतों की प्रतिक्रिया

संत करौली शंकर ने बुधवार को कहा कि इटली की प्रधानमंत्री ने एक महिला होने के नाते महिलाओं के हित में बेहद सराहनीय निर्णय लिया है। उन्होंने कहा, 'इस तरह का कानून सभी जगह होना चाहिए और भारत में भी इस पर गंभीरता से विचार होना चाहिए।'

संत करौली शंकर ने यह भी कहा कि देश 21वीं सदी में आगे बढ़ रहा है और आज की युवा पीढ़ी अपनी पहचान एवं अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है। उन्होंने प्रश्न उठाया कि चेहरा छिपाने की परंपरा का कोई औचित्य नहीं है — 'कौन सा अपराध किया है जो चेहरा छिपाना पड़े।'

सुरक्षा का पहलू

संत करौली शंकर ने सुरक्षा चिंताओं की भी बात की। उन्होंने कहा कि कई बार अपराधी बुर्का पहनकर घटना को अंजाम देकर फरार हो जाते हैं और लोग उन्हें महिला समझते रहते हैं। उनके अनुसार, अपराधों पर रोक लगाने और महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए इस पहनावे पर खुली चर्चा होनी चाहिए।

हालाँकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जहाँ सुरक्षा का प्रश्न है, वहाँ हर तरह के पहनावे को सुरक्षा मानकों से गुज़रना होगा। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि जो लोग अपनी मर्ज़ी से पहनावा तय करते हैं, उनमें किसी को हस्तक्षेप का अधिकार नहीं है।

स्कूलों में एकसमान ड्रेस कोड की वकालत

संत करौली शंकर ने विशेष रूप से स्कूली बच्चों का उदाहरण दिया। उनका कहना था कि स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को बुर्का या नकाब पहनकर नहीं आना चाहिए — स्कूल में केवल स्कूल यूनिफ़ॉर्म ही होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि धर्म के आधार पर अलग-अलग पहनावा समाज में अलगाव और भ्रम की भावना पैदा करता है।

उनके अनुसार, जब तक बच्चे स्कूल में हैं, तब तक वे स्कूल की निर्धारित यूनिफ़ॉर्म में ही आएँ। स्कूल के बाहर या विवाह के बाद वयस्क महिलाएँ क्या पहनती हैं, इस पर उन्हें कोई आपत्ति नहीं है।

व्यापक संदर्भ

गौरतलब है कि यूरोप के कई देशों में धार्मिक परिधान और चेहरा ढकने पर बहस वर्षों से चल रही है। फ्रांस ने 2011 में सार्वजनिक स्थलों पर चेहरा ढकने पर प्रतिबंध लगाया था। इटली का ताज़ा प्रस्ताव इसी श्रृंखला में नवीनतम कड़ी है। भारत में यह बहस स्थानीय स्तर पर समय-समय पर उठती रही है, लेकिन अभी तक केंद्र सरकार ने इस पर कोई आधिकारिक नीति नहीं बनाई है।

आने वाले दिनों में यह विमर्श राजनीतिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर और गहरा होने की संभावना है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इटली में बुर्का-नकाब बैन का प्रस्ताव क्या है?
इटली सरकार ने सार्वजनिक स्थलों पर बुर्का और नकाब पहनने पर प्रतिबंध लगाने का एक विधायी प्रस्ताव पेश किया है। यह प्रस्ताव अभी विचाराधीन है और इसे लेकर यूरोप में व्यापक चर्चा हो रही है।
हरिद्वार के संत करौली शंकर ने इस प्रस्ताव पर क्या कहा?
संत करौली शंकर ने कहा कि इटली की प्रधानमंत्री ने महिलाओं के हित में साहसिक निर्णय लिया है और ऐसा कानून भारत में भी लागू होना चाहिए। उन्होंने स्कूलों में एकसमान ड्रेस कोड की विशेष वकालत की।
क्या संतों ने वयस्क महिलाओं के पहनावे पर भी प्रतिबंध की माँग की?
नहीं। संत करौली शंकर ने स्पष्ट किया कि जो लोग अपनी मर्ज़ी से पहनावा तय करते हैं, उनमें हस्तक्षेप का अधिकार किसी को नहीं है। उनकी मुख्य माँग स्कूली बच्चों के लिए एकसमान यूनिफ़ॉर्म नीति तक सीमित थी।
यूरोप में इस तरह के प्रतिबंध का इतिहास क्या है?
फ्रांस ने 2011 में सार्वजनिक स्थलों पर चेहरा ढकने पर प्रतिबंध लगाया था, जो यूरोप में इस तरह का पहला बड़ा कानून था। बेल्जियम और कुछ अन्य यूरोपीय देशों ने भी इसी दिशा में कदम उठाए। इटली का ताज़ा प्रस्ताव इसी क्रम में है।
भारत में इस बहस की क्या स्थिति है?
भारत में बुर्का या नकाब पर केंद्र सरकार ने अभी तक कोई आधिकारिक राष्ट्रीय नीति नहीं बनाई है। हालाँकि राज्य स्तर पर और धार्मिक-सामाजिक संगठनों द्वारा यह बहस समय-समय पर उठती रही है। इटली के ताज़ा प्रस्ताव ने इसे एक बार फिर राष्ट्रीय विमर्श में ला दिया है।
राष्ट्र प्रेस
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