कर्नाटक हिजाब विवाद: सिद्दारमैया सरकार ने स्कूलों में धार्मिक प्रतीकों को दी संवैधानिक मान्यता, BJP का विरोध

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कर्नाटक हिजाब विवाद: सिद्दारमैया सरकार ने स्कूलों में धार्मिक प्रतीकों को दी संवैधानिक मान्यता, BJP का विरोध

सारांश

कर्नाटक में हिजाब विवाद फिर सुर्खियों में है — इस बार सिद्दारमैया सरकार ने पगड़ी, तिलक और हेडस्कार्फ को एक ही संवैधानिक छतरी के नीचे रखा, लेकिन भगवा शॉल को बाहर किया। BJP ने इसे तुष्टिकरण बताया, तो कांग्रेस ने इसे संविधान की रक्षा।

मुख्य बातें

मुख्यमंत्री सिद्दारमैया ने 15 मई 2026 को शैक्षणिक संस्थानों में पगड़ी, कड़ा, तिलक, भस्म, कलावा और हेडस्कार्फ पहनने के अधिकार का समर्थन किया।
मंत्री प्रियंक खड़गे ने स्पष्ट किया कि सरकार ने ड्रेस कोड नहीं हटाया, केवल संविधान प्रदत्त धार्मिक अधिकारों को समान दर्जा देने की बात की।
सरकार ने भगवा शॉल को धार्मिक प्रथा मानने से इनकार किया, जिसे BJP ने भेदभावपूर्ण बताया।
कांग्रेस प्रवक्ता नासिर हुसैन और सांसद इमरान मसूद ने हिजाब को संवैधानिक अधिकार करार दिया।
कर्नाटक हिजाब मामला सर्वोच्च न्यायालय की बड़ी पीठ के समक्ष अभी भी विचाराधीन है।

कर्नाटक में हिजाब विवाद एक बार फिर राजनीतिक केंद्र में आ गया है, जब मुख्यमंत्री सिद्दारमैया ने 15 मई 2026 को शैक्षणिक संस्थानों में पगड़ी, कड़ा, तिलक, भस्म, कलावा और हेडस्कार्फ जैसे धार्मिक प्रतीकों को पहनने के अधिकार का समर्थन किया — हालाँकि उन्होंने भगवा शॉल को इन प्रतीकों से अलग श्रेणी में रखा। इस बयान के बाद राज्य में सियासी माहौल तेज़ी से गरमा गया है और भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने सरकार के रुख की कड़ी आलोचना की है।

सरकार का पक्ष: ड्रेस कोड नहीं हटाया, संविधान की बात की

राज्य सरकार के मंत्री प्रियंक खड़गे ने स्पष्ट किया कि कांग्रेस सरकार ने किसी भी ड्रेस कोड को समाप्त नहीं किया है। उनके अनुसार सरकार केवल संविधान प्रदत्त धार्मिक अधिकारों को समान दर्जा देने की बात कर रही है।

खड़गे ने कहा, 'हमने ड्रेस कोड वापस नहीं लिया। हमने सिर्फ इतना कहा है कि संविधान जिन धार्मिक प्रथाओं की अनुमति देता है, उन्हें समाज में समान स्थान मिलना चाहिए। चाहे वह पगड़ी हो, कड़ा, तिलक, भस्म, कलावा, या हेडस्कार्फ — इसमें भ्रम की कोई बात नहीं है।' उन्होंने यह भी जोड़ा कि यदि BJP को इस पर आपत्ति है, तो वह न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाने के लिए स्वतंत्र है।

भगवा शॉल और हिजाब में अंतर क्यों?

खड़गे ने भगवा शॉल को धार्मिक प्रथा मानने से इनकार किया। उन्होंने कहा, 'भगवा शॉल कोई धार्मिक प्रथा नहीं है। BJP को युवाओं की शिक्षा पर ध्यान देना चाहिए। कांग्रेस और कर्नाटक सरकार बच्चों का भविष्य शिक्षा के ज़रिए बनाना चाहती है। अगर BJP बच्चों को गौ-रक्षक और धर्म-रक्षक बनाना चाहती है, तो वह अपने बच्चों के साथ ऐसा करे।' यह बयान राजनीतिक रूप से तीखा माना जा रहा है और BJP ने इस पर तीव्र प्रतिक्रिया जताई है।

अन्य दलों और संगठनों की प्रतिक्रिया

जमात-ए-इस्लामी हिंद के राज्य सचिव मोहम्मद यूसुफ कन्नी ने सरकार के रुख का समर्थन करते हुए कहा कि भारत की असली ताकत 'विविधता में एकता' है। उनके अनुसार हिजाब से जुड़े प्रतिबंध हटाने से शिक्षा तक पहुँच और सामाजिक भागीदारी बेहतर होगी, क्योंकि सभी समुदायों ने देश की स्वतंत्रता में योगदान दिया है।

कांग्रेस प्रवक्ता नासिर हुसैन ने BJP पर हिंदू-मुस्लिम राजनीति करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, 'कांग्रेस सरकार ने हिजाब को कोई विशेष अनुमति नहीं दी है। यह संविधान से मिला अधिकार है। अगर कोई लड़की हिजाब पहनकर पढ़ाई करना चाहती है तो इसमें दिक्कत क्या है?'

कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने भी सरकार का पक्ष लेते हुए कहा, 'सिर ढंकना और पर्दा करना भारतीय संस्कृति का हिस्सा है। आपने सिर्फ उसका उर्दू नाम हिजाब रख दिया है। अगर इसे घूंघट कहा जाता, तो शायद किसी को दिक्कत नहीं होती।' मसूद ने यह भी कहा कि BJP हिजाब पर सवाल उठाती है, लेकिन परीक्षा पेपर लीक जैसे गंभीर मुद्दों पर चुप रहती है।

पृष्ठभूमि: कर्नाटक में हिजाब विवाद की जड़ें

गौरतलब है कि कर्नाटक में हिजाब विवाद 2022 में उडुपी के एक सरकारी कॉलेज से शुरू हुआ था, जब कुछ छात्राओं को हिजाब पहनकर कक्षा में प्रवेश से रोका गया था। यह मामला उच्च न्यायालय और फिर सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचा। सर्वोच्च न्यायालय की दो-न्यायाधीशों की पीठ इस पर खंडित निर्णय दे चुकी है और मामला अभी भी व्यापक पीठ के समक्ष विचाराधीन है। यह ऐसे समय में आया है जब कर्नाटक में कांग्रेस सरकार अपने धर्मनिरपेक्ष एजेंडे को मज़बूत करने की कोशिश कर रही है।

आगे क्या होगा

BJP ने संकेत दिया है कि वह इस मुद्दे को विधानसभा और सड़क दोनों स्तरों पर उठाएगी। खड़गे के न्यायालय जाने के सुझाव के बाद यह संभावना भी बनती है कि विरोधी दल कानूनी रास्ता अपनाएँ। फिलहाल कर्नाटक सरकार ने अपने रुख पर कोई बदलाव के संकेत नहीं दिए हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन भगवा शॉल को अलग श्रेणी में रखना एक राजनीतिक चयनात्मकता का संकेत देता है जो विवाद को सुलझाने की बजाय और गहरा कर सकता है। असली सवाल यह है कि क्या सरकार 'समान धार्मिक अधिकार' की परिभाषा को पारदर्शी और न्यायसंगत तरीके से लागू कर पाएगी — या यह मुद्दा चुनावी ध्रुवीकरण का औज़ार बना रहेगा। सर्वोच्च न्यायालय की बड़ी पीठ का फैसला अभी आना बाकी है, और तब तक राज्य सरकार की नीति कानूनी अनिश्चितता के साए में रहेगी।
RashtraPress
15 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कर्नाटक हिजाब विवाद 2026 में क्या नया हुआ है?
मुख्यमंत्री सिद्दारमैया ने 15 मई 2026 को शैक्षणिक संस्थानों में पगड़ी, तिलक, कड़ा और हेडस्कार्फ जैसे धार्मिक प्रतीकों को संवैधानिक अधिकार बताया, जबकि भगवा शॉल को इस सूची से बाहर रखा। इस बयान के बाद BJP और कांग्रेस के बीच तीखी राजनीतिक बहस छिड़ गई है।
क्या कर्नाटक सरकार ने स्कूलों का ड्रेस कोड हटा दिया है?
नहीं। मंत्री प्रियंक खड़गे ने स्पष्ट किया है कि सरकार ने कोई ड्रेस कोड नहीं हटाया है। सरकार का कहना है कि वह केवल संविधान द्वारा मान्य धार्मिक प्रथाओं को समान दर्जा देने की बात कर रही है।
भगवा शॉल को हिजाब से अलग क्यों माना गया?
मंत्री प्रियंक खड़गे के अनुसार भगवा शॉल एक धार्मिक प्रथा नहीं है, इसलिए उसे अन्य धार्मिक प्रतीकों — जैसे पगड़ी, तिलक या हेडस्कार्फ — की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। BJP ने इस तर्क को भेदभावपूर्ण और राजनीति से प्रेरित बताया है।
कर्नाटक हिजाब मामला सर्वोच्च न्यायालय में कहाँ तक पहुँचा है?
सर्वोच्च न्यायालय की दो-न्यायाधीशों की पीठ इस मामले पर खंडित निर्णय दे चुकी है और मामला अब एक बड़ी पीठ के समक्ष विचाराधीन है। अंतिम फैसला अभी आना बाकी है, जिससे राज्य सरकार की मौजूदा नीति कानूनी अनिश्चितता में है।
इस विवाद से कर्नाटक की छात्राओं पर क्या असर पड़ सकता है?
जमात-ए-इस्लामी हिंद के राज्य सचिव मोहम्मद यूसुफ कन्नी के अनुसार हिजाब प्रतिबंध हटाने से मुस्लिम छात्राओं की शिक्षा तक पहुँच और सामाजिक भागीदारी बेहतर होगी। हालाँकि आलोचकों का कहना है कि जब तक सर्वोच्च न्यायालय का स्पष्ट फैसला नहीं आता, नीति की स्थिरता संदिग्ध बनी रहेगी।
राष्ट्र प्रेस
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