हरिद्वार: 'असली-नकली देवी-देवता' विवाद में स्वामी कैलाशानंद गिरी ने उत्तराखंड सरकार से निष्पक्ष जांच की माँग की
सारांश
मुख्य बातें
आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी कैलाशानंद गिरी महाराज ने 27 मई 2026 को हरिद्वार में पत्रकारों से बातचीत में 'असली और नकली देवी-देवताओं' को लेकर उठे विवाद की निष्पक्ष एवं विधिवत जांच की माँग की। उन्होंने स्पष्ट किया कि सनातन धर्म की गरिमा और समाज में स्पष्टता बनाए रखने के लिए तथ्यों के आधार पर सच्चाई सामने आनी चाहिए।
विवाद की पृष्ठभूमि
हरिद्वार में अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद (दूसरे गुट) की एक महत्त्वपूर्ण बैठक आयोजित हुई, जिसमें पंजाब से आए उदासीन नया अखाड़ा के साधु-संत और अखाड़े की प्रबंध समिति के प्रतिनिधि शामिल हुए। बैठक के बाद परिषद के अध्यक्ष डॉ. रवींद्र पुरी महाराज ने बताया कि पंजाब से आए संतों का दावा है कि असली देवता उनके पास हैं, जबकि हरिद्वार स्थित अखाड़े में कथित तौर पर नकली देवताओं का स्नान कराया जा रहा है।
स्वामी कैलाशानंद गिरी का पक्ष
स्वामी कैलाशानंद गिरी महाराज ने कहा कि नया अखाड़ा उदासीन के कई सदस्य उनके समक्ष उपस्थित हुए और पूरे मामले को उनके संज्ञान में लाया गया। उन्होंने कहा, 'मुझे लगता है कि यह जांच का विषय है — एक तरफ ये लोग दावा कर रहे हैं कि उनके पास असली देवता हैं।' उन्होंने यह भी बताया कि अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष ने भी जांच की माँग की है।
सरकार से जांच की अपील
स्वामी कैलाशानंद गिरी ने इस विवाद को केवल धार्मिक संस्थाओं तक सीमित न रखते हुए उत्तराखंड सरकार से भी स्वतंत्र जांच कराने की अपील की। उन्होंने कहा कि 'फिलहाल मामले की जांच जारी है, लेकिन हम चाहते हैं कि सरकार की ओर से भी इसकी जांच की जाए, ताकि पूरी सच्चाई सामने आ सके।' उनके अनुसार जो लोग पूरी सत्यता और निष्ठा के साथ काम कर रहे हैं, उनके हितों के साथ किसी भी प्रकार का कुठाराघात नहीं होना चाहिए।
सनातन धर्म की गरिमा का प्रश्न
स्वामी कैलाशानंद गिरी महाराज ने इस पूरे प्रकरण की संवेदनशीलता को रेखांकित करते हुए कहा कि वे नहीं चाहते कि यह विवाद सड़क पर आए। उन्होंने स्पष्ट किया कि 'देवता किसी भी सूरत में नकली नहीं होते — वे हमेशा असली होते हैं।' उन्होंने यह भी कहा कि भगवती और देवी-देवताओं पर किसी भी प्रकार की आपत्तिजनक टिप्पणी या अभद्र व्यवहार स्वीकार्य नहीं है।
आगे की राह
इस विवाद में अब धार्मिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर जांच की माँग उठ चुकी है। उत्तराखंड सरकार की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। धार्मिक जगत में इस मामले की गूँज को देखते हुए आने वाले दिनों में इस पर स्पष्टता आने की उम्मीद है।