जादवपुर विश्वविद्यालय को बदनाम करने की कोशिश पर तन्मय घोष का पलटवार, ममता भी बोलीं
सारांश
मुख्य बातें
कोलकाता, 24 अप्रैल: जादवपुर विश्वविद्यालय को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विवादित बयान के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) के नेता तन्मय घोष ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर लिखा कि जिन लोगों का भारत के स्वतंत्रता संग्राम में कोई योगदान नहीं रहा, वे आज बंगाल की बौद्धिक पहचान और गर्व के प्रतीक जादवपुर विश्वविद्यालय को बदनाम करने की जुर्रत कर रहे हैं।
तन्मय घोष का सीधा हमला
तन्मय घोष ने अपनी पोस्ट में लिखा कि यह हमारी बौद्धिक विरासत पर एक खुला हमला है और असहमति की आवाज़ को दबाने की सुनियोजित कोशिश है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या इस देश में अब नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से वंचित किया जा रहा है?
उन्होंने स्पष्ट किया कि बोलने की आज़ादी कोई विशेषाधिकार नहीं, बल्कि यह एक लोकतांत्रिक मूल अधिकार है जिसे किसी भी सत्ता द्वारा कुचला नहीं जा सकता। तन्मय घोष ने यह भी घोषणा की कि जादवपुर विश्वविद्यालय के वर्तमान छात्र और पूर्व छात्र दुनियाभर में एकजुट होंगे, एक ज्ञापन पर हस्ताक्षर करेंगे और यह लड़ाई माननीय राष्ट्रपति तक पहुँचाई जाएगी।
ममता बनर्जी ने भाजपा को घेरा
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी एक्स पर पोस्ट कर भाजपा पर तीखा निशाना साधा। उन्होंने लिखा कि बड़े दुख के साथ पूछना पड़ रहा है — क्या किसी प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय के मेधावी छात्रों का वर्णन करने का यही तरीका है?
सीएम ममता ने याद दिलाया कि जादवपुर विश्वविद्यालय को केंद्र सरकार के अपने NIRF रैंकिंग फ्रेमवर्क में साल-दर-साल शीर्ष स्थान मिलते रहे हैं। उन्होंने पूछा कि जिस संस्थान को आपकी सरकार ने खुद 'उत्कृष्टता का केंद्र' माना, उसी का अपमान करना कहाँ की शालीनता है?
शिक्षा बनाम अराजकता — ममता का तर्क
ममता बनर्जी ने लिखा कि जादवपुर विश्वविद्यालय के छात्रों ने अपनी योग्यता के बल पर यहाँ जगह बनाई है। वे यहाँ से डिग्री के साथ-साथ बौद्धिक क्षमता और सवाल पूछने की हिम्मत लेकर निकलते हैं — यह अराजकता नहीं, यह शिक्षा है और यही उत्कृष्टता है।
उन्होंने यह भी कहा कि असली अराजकता तो वह है जब न्याय की जगह बुलडोज़र सत्ता के हथियार बन जाते हैं। सीएम ममता ने तंज कसा कि अराजकता तब होती है जब किसान मरते हैं और उनकी आवाज़ दबाई जाती है, या जब दुष्कर्म जैसे जघन्य अपराधों के दोषी राजनीतिक स्वार्थ के चलते खुलेआम घूमते हैं।
गहरा संदर्भ — विश्वविद्यालय और राजनीति का टकराव
गौरतलब है कि जादवपुर विश्वविद्यालय लंबे समय से वामपंथी और प्रगतिशील छात्र आंदोलनों का केंद्र रहा है। २०२३ में विश्वविद्यालय परिसर में एक छात्र की मौत के बाद यह संस्थान राष्ट्रीय सुर्खियों में आया था। यह ऐसे समय में आया है जब २०२६ के बंगाल विधानसभा चुनाव नज़दीक हैं और भाजपा व TMC के बीच राजनीतिक तनाव अपने चरम पर है।
विशेषज्ञों का मानना है कि केंद्र सरकार और राज्य सरकार के बीच शिक्षा संस्थानों को लेकर यह टकराव दरअसल एक बड़ी वैचारिक लड़ाई का हिस्सा है — जहाँ एक तरफ राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के तहत केंद्रीकरण की कोशिश है, तो दूसरी तरफ राज्य अपनी शैक्षणिक स्वायत्तता बचाने की जद्दोजहद में हैं।
आने वाले दिनों में जादवपुर विश्वविद्यालय के छात्र संगठनों द्वारा राष्ट्रपति को ज्ञापन सौंपने की प्रक्रिया और उस पर केंद्र की प्रतिक्रिया इस विवाद की अगली दिशा तय करेगी।