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जगन मोहन रेड्डी की मांग: चुनाव आयुक्त नियुक्ति में CJI को शामिल करो, 2023 कानून में हो संशोधन

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जगन मोहन रेड्डी की मांग: चुनाव आयुक्त नियुक्ति में CJI को शामिल करो, 2023 कानून में हो संशोधन

सारांश

वाईएसआरसीपी प्रमुख जगन मोहन रेड्डी ने वही कानून बदलने की माँग की जिसे उन्होंने खुद 2023 में संसद में समर्थन दिया था — CEC ज्ञानेश कुमार विवाद के बाद यह यू-टर्न चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर राष्ट्रीय बहस को नई धार देता है।

मुख्य बातें

वाईएस जगन मोहन रेड्डी ने 25 सितंबर 2026 को CEC और चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 में संशोधन की माँग की।
माँग है कि नियुक्ति समिति में प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश को शामिल किया जाए।
यह माँग CEC ज्ञानेश कुमार से जुड़े विवाद और दो चुनाव आयुक्तों की कथित आपत्तियों की पृष्ठभूमि में आई है।
वाईएसआरसीपी ने स्वीकार किया कि उसने 2023 में इस विधेयक का समर्थन किया था, लेकिन अब 'वर्तमान संदर्भ में पुनर्विचार' ज़रूरी है।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, विवाद 'ECINet' प्रबंधन और मतदाता सूचियों पर उठाई गई आपत्तियों से जुड़ा है।

आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और वाईएसआर कांग्रेस पार्टी (वाईएसआरसीपी) के अध्यक्ष वाईएस जगन मोहन रेड्डी ने 25 सितंबर 2026 को मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) एवं अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव की मांग उठाई। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 में संशोधन कर नियुक्ति समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को पुनः शामिल करने का आह्वान किया। अमरावती से दी गई यह प्रतिक्रिया CEC ज्ञानेश कुमार से जुड़े हालिया विवाद के संदर्भ में जगन की पहली सार्वजनिक टिप्पणी है।

क्या है जगन की मांग

जगन मोहन रेड्डी ने उस पुरानी व्यवस्था को बहाल करने की माँग की जिसमें CEC और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता (LOP) और भारत के मुख्य न्यायाधीश की तीन सदस्यीय समिति द्वारा की जाती थी। 2023 के कानून में CJI की जगह एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल किया गया था, जिसे तब विपक्ष ने कार्यपालिका के प्रभुत्व का प्रतीक बताया था। उल्लेखनीय है कि वाईएसआरसीपी ने उस समय इस विधेयक का समर्थन किया था, और अब उसी पार्टी का पुनर्विचार करना राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

CEC विवाद की पृष्ठभूमि

राष्ट्रीय मीडिया की रिपोर्टों के अनुसार, दो चुनाव आयुक्तों ने कई अवसरों पर आयोग के निर्णयों, मतदाता सूचियों के प्रबंधन और 'ECINet' प्रणाली के संचालन पर औपचारिक आपत्तियाँ दर्ज कराई थीं। इन रिपोर्टों ने जनता के बीच व्यापक सवाल और संदेह पैदा किए हैं। जगन ने कहा कि जनता को यह जानने का अधिकार है कि किन आपत्तियों को दर्ज किया गया, उन पर क्या कार्रवाई हुई, और मतदाता सूचियों में नाम जोड़ने, हटाने या बहाल करने के मामलों में प्रणाली ने कितनी पारदर्शिता से काम किया।

वाईएसआरसीपी का रुख

वाईएसआरसीपी की ओर से जारी बयान में कहा गया कि 'लोकतंत्र में पारदर्शिता न केवल होनी चाहिए, बल्कि दिखनी भी चाहिए।' पार्टी ने केंद्र सरकार से आगे आकर आवश्यक मानक स्थापित करने और नागरिकों की आशंकाएँ दूर करने की अपील की। जगन ने अपनी बात को एक उपमा से स्पष्ट करते हुए कहा कि 'एक छात्र द्वारा परीक्षक की नियुक्ति हमेशा आरोपों के घेरे में रहती है, भले ही परीक्षक पूरी तरह से ईमानदार हो — बेहतर यही है कि यह प्रक्रिया किसी निष्पक्ष व्यक्ति द्वारा संचालित हो।'

चुनावी लोकतंत्र पर व्यापक असर

चुनाव आयोग की स्वायत्तता और नियुक्ति प्रक्रिया का सवाल भारतीय लोकतंत्र के लिए दीर्घकालिक महत्व रखता है। सर्वोच्च न्यायालय ने 2023 में ही अनूप बरनवाल मामले में ऐतिहासिक फैसले में CJI की भागीदारी अनिवार्य की थी, जिसे बाद में संसदीय कानून के ज़रिये बदल दिया गया। आलोचकों का कहना है कि यह बदलाव न्यायपालिका की उस व्यवस्था को कमज़ोर करता है जो चुनाव आयुक्तों की स्वतंत्रता सुनिश्चित करती थी। जगन की माँग ऐसे समय में आई है जब चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर बहस तेज़ हो गई है।

आगे क्या होगा

फिलहाल केंद्र सरकार की ओर से इस माँग पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। जगन की माँग को विपक्षी दलों का व्यापक समर्थन मिलता है या नहीं, यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा। यदि यह मसला संसद में उठाया जाता है, तो 2023 के कानून की वैधता और भावना पर फिर से बहस अवश्यंभावी होगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन उनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाती है — क्योंकि वाईएसआरसीपी ने 2023 में उसी कानून के पक्ष में मतदान किया था जिसे अब वे बदलना चाहते हैं। असली मुद्दा यह है कि CJI की भागीदारी हटाना सर्वोच्च न्यायालय के अनूप बरनवाल फैसले की मूल भावना के विपरीत था — और उस समय इसका विरोध करने वाले दल आज विपक्ष में हैं। ECINet और मतदाता सूची विवाद को जनता के सामने पारदर्शिता से रखने की जो माँग जगन ने की है, वह वैध है — लेकिन इसे तब उठाना जब पार्टी सत्ता से बाहर है, इसकी राजनीतिक प्रेरणा को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
RashtraPress
26 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जगन मोहन रेड्डी ने चुनाव आयुक्त नियुक्ति में क्या बदलाव माँगा है?
जगन ने माँग की है कि CEC और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए एक तीन सदस्यीय समिति हो जिसमें प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल हों। यह व्यवस्था 2023 के कानून से पहले सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर लागू थी।
CEC ज्ञानेश कुमार विवाद क्या है?
राष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, दो चुनाव आयुक्तों ने आयोग के निर्णयों, मतदाता सूचियों और 'ECINet' प्रणाली के प्रबंधन पर कई बार आपत्तियाँ दर्ज कराईं। इन रिपोर्टों से जनता के बीच चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठे हैं।
2023 का चुनाव आयुक्त नियुक्ति कानून क्या है और इसमें क्या विवाद है?
मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 में नियुक्ति समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश को हटाकर एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल किया गया। आलोचकों का कहना है कि इससे कार्यपालिका का नियुक्ति प्रक्रिया पर प्रभुत्व बढ़ गया और चुनाव आयोग की स्वतंत्रता कमज़ोर हुई।
क्या वाईएसआरसीपी ने पहले इस कानून का समर्थन किया था?
हाँ, वाईएसआरसीपी ने स्वयं स्वीकार किया है कि 2023 में उसने इस विधेयक का समर्थन किया था। अब पार्टी का कहना है कि 'वर्तमान संदर्भ में' इस पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए।
इस माँग का आगे क्या असर हो सकता है?
यदि यह मुद्दा संसद में उठाया जाता है तो 2023 के कानून की वैधता और भावना पर बहस फिर शुरू हो सकती है। फिलहाल केंद्र सरकार ने कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है, और यह देखना होगा कि अन्य विपक्षी दल इस माँग को कितना समर्थन देते हैं।
राष्ट्र प्रेस
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