जतिंद्र नाथ दास: लाहौर जेल में 63 दिन की भूख हड़ताल, सुभाष चंद्र बोस ने कहा 'युवा दधीचि'
सारांश
मुख्य बातें
जतिंद्र नाथ दास — वह क्रांतिकारी जिनकी 63 दिन की भूख हड़ताल भी ब्रिटिश हुकूमत की जिद नहीं तोड़ सकी — 13 सितंबर 1929 को लाहौर जेल में मात्र 25 वर्ष की आयु में शहीद हो गए। उनके बलिदान ने पूरे देश को झकझोर दिया और स्वतंत्रता संग्राम की लौ को और तेज कर दिया। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने उनके बारे में कहा था, 'जिस तरह महर्षि दधीचि ने वज्र बनाने के लिए अपनी अस्थियाँ दान कर दी थीं, उसी तरह जतिंद्र ने भी अपना शरीर दान कर दिया है — वो आधुनिक भारत के युवा दधीचि हैं।'
क्रांतिकारी जीवन और संघर्ष
जतिंद्र नाथ दास ने 1928 की कोलकाता कांग्रेस में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के सहायक के रूप में कार्य किया। इसके बाद भगत सिंह के अनुरोध पर वह बम निर्माण के लिए आगरा चले गए। माना जाता है कि 8 अप्रैल 1929 को केंद्रीय असेंबली में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने जो बम फेंका था, वह जतिंद्र नाथ दास द्वारा ही तैयार किया गया था। इसके बाद उन पर लाहौर षड्यंत्र केस में मुकदमा चलाया गया।
लाहौर जेल में भूख हड़ताल
लाहौर जेल में बंद रहते हुए जतिंद्र नाथ दास ने भारतीय राजनीतिक कैदियों के साथ यूरोपीय कैदियों जैसा व्यवहार किए जाने की माँग उठाई। जब ब्रिटिश प्रशासन ने उनकी माँग को अनसुना किया, तो उन्होंने भूख हड़ताल शुरू कर दी। 63 दिन तक अन्न-जल का त्याग करने के बाद उनका शरीर टूट गया, लेकिन उनका संकल्प अडिग रहा। 13 सितंबर 1929 को उन्होंने अंतिम सांस ली — देश की आजादी का सपना सीने में लिए।
स्वतंत्रता संग्राम की विविध धाराएँ
भारत की आजादी की लड़ाई केवल एक व्यक्ति या एक विचारधारा की देन नहीं थी। इस संघर्ष में मातंगिनी हाजरा जैसी 70 वर्षीया वीरांगना ने बंगाल के तामलुक में शांतिपूर्ण प्रदर्शन का नेतृत्व करते हुए ब्रिटिश पुलिस की गोली खाई — उनके होठों पर अंतिम शब्द 'वंदे मातरम्' थे। भगिनी निवेदिता — मूलतः आइरिश मार्गरेट एलिजाबेथ नोबल, जिन्हें स्वामी विवेकानंद ने यह नाम दिया — ने भारत को अपनी मातृभूमि मानकर स्वतंत्रता सेनानियों का साथ दिया।
सरदार भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ और बिरसा मुंडा जैसे हजारों क्रांतिकारियों ने देश के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। इसी कड़ी में आचार्य नरेंद्र देव — समाजवादी नेता, विद्वान और शिक्षाविद — ने महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन, नमक सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की। महात्मा गांधी ने स्वयं उन्हें 'रत्न' कहा था।
आचार्य नरेंद्र देव का योगदान
आचार्य नरेंद्र देव इलाहाबाद प्रवास के दौरान बाल गंगाधर तिलक, लाजपत राय, बिपिन चंद्र पाल और अरविंद घोष जैसे दिग्गजों से प्रभावित हुए। वह कई बार जेल गए, किंतु उनका संकल्प कभी नहीं डिगा। देश की आजादी के बाद भी वह राष्ट्र-निर्माण में जुटे रहे।
80वें स्वतंत्रता दिवस पर संकल्प
जब भारत अपना 80वाँ स्वतंत्रता दिवस मनाने की ओर अग्रसर है, तो औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति की दिशा में उठाए गए कदम — नए संसद भवन का निर्माण, राजपथ का नाम बदलकर कर्तव्य पथ रखना, इंडिया गेट पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा स्थापित करना, नए आपराधिक कानून और नए नौसेना ध्वज को अपनाना — इन शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि हैं। जतिंद्र नाथ दास और उन जैसे अनगिनत बलिदानियों की विरासत आज भी राष्ट्र-निर्माण की प्रेरणा बनी हुई है।