3 सितंबर 2026
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झारखंड की बंद कोयला खदानों को मिलेगा नया जीवन, गिरिडीह और करमा ओसीपी पायलट प्रोजेक्ट के लिए चयनित

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झारखंड की बंद कोयला खदानों को मिलेगा नया जीवन, गिरिडीह और करमा ओसीपी पायलट प्रोजेक्ट के लिए चयनित

सारांश

झारखंड ने बंद कोयला खदानों को बेकार छोड़ने की परंपरा तोड़ने की कोशिश शुरू की है। गिरिडीह और करमा ओसीपी को पायलट बनाकर सौर ऊर्जा, कृषि और पर्यटन के ज़रिए स्थानीय रोज़गार सृजन का मॉडल तैयार होगा — जो मार्च 2030 तक पूरे देश के लिए मिसाल बन सकता है।

मुख्य बातें

गिरिडीह ओसीपी और रामगढ़ जिले की करमा ओसीपी को बंद खदान पुनर्पयोग के लिए पायलट प्रोजेक्ट के रूप में चुना गया।
झारखंड सरकार केंद्र सरकार को माइन क्लोजर एंड रिपर्पजिंग प्लान का प्रस्ताव भेजेगी।
खदान भूमि का उपयोग सौर ऊर्जा, पर्यटन, कृषि, बागवानी और मत्स्य पालन के लिए प्रस्तावित।
करमा ओसीपी के आसपास के 8 गाँवों — सुगिया, मरार, बोंगाबार, करमा, कैथा, कंडेर, लोढ़मा और पैंकी — को विशेष रूप से शामिल किया गया।
यह पहल केंद्रीय कोयला मंत्रालय और जर्मनी की संस्था जीआईजेड की टीसीसीएम परियोजना के तहत मार्च 2030 तक चलेगी।
बैठक की अध्यक्षता खान एवं भूतत्व विभाग के सचिव अरवा राजकमल ने की; सीसीएल और सीएमपीडीआई भी शामिल।

झारखंड सरकार ने बंद होने वाली कोयला खदानों को बेकार पड़ा छोड़ने के बजाय उन्हें आर्थिक रूप से पुनर्जीवित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। गिरिडीह ओपन कास्ट प्रोजेक्ट (ओसीपी) और रामगढ़ जिले की करमा ओसीपी को पायलट प्रोजेक्ट के लिए चुना गया है, जिसके तहत इन खदानों की जमीन, जल संसाधन, पर्यावरण और आधारभूत ढाँचे का दोबारा उपयोग किया जाएगा। 3 सितंबर को रांची में हुई उच्चस्तरीय बैठक में राज्य सरकार की ओर से केंद्र सरकार को इस संबंध में प्रस्ताव भेजने पर सहमति बनी।

पायलट प्रोजेक्ट की रूपरेखा

इस पहल के अंतर्गत दोनों खदानों के लिए विस्तृत 'माइन क्लोजर एंड रिपर्पजिंग प्लान' तैयार किया जाएगा। इसमें यह मूल्यांकन किया जाएगा कि खदान की भूमि और आसपास के संसाधनों का उपयोग स्थानीय समुदायों के लिए रोज़गार और आजीविका के नए अवसर सृजित करने में कैसे किया जा सकता है। यह पहल केंद्रीय कोयला मंत्रालय और जर्मनी की संस्था जीआईजेड (GIZ) के सहयोग से संचालित 'टेक्निकल कोऑपरेशन ऑन टू-बी-डोज्ड कोल माइंस' (टीसीसीएम) परियोजना के तहत की जा रही है, जो मार्च 2030 तक चलेगी।

बंद खदानों में संभावित उपयोग

योजना के अनुसार, बंद खदानों की भूमि का उपयोग सौर ऊर्जा जैसी नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं, पर्यटन, कृषि, बागवानी और मत्स्य पालन के लिए किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, कौशल विकास केंद्र स्थापित करने और अन्य आर्थिक गतिविधियाँ आरंभ करने की संभावनाएँ भी तलाशी जाएँगी। विस्तृत डीपीआर (विस्तृत परियोजना रिपोर्ट) में भूमि उपयोग, पर्यावरण सुधार, जल प्रबंधन, खदान गड्ढों के प्रबंधन और मौजूदा ढाँचे के पुनर्उपयोग की विस्तृत योजना शामिल होगी।

करमा ओसीपी के आसपास के गाँव

करमा ओसीपी के आसपास के आठ गाँवोंसुगिया, मरार, बोंगाबार, करमा, कैथा, कंडेर, लोढ़मा और पैंकी — को इस योजना में विशेष रूप से शामिल किया गया है। इन गाँवों में निवासियों की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति, कमज़ोर वर्गों की आवश्यकताओं और रोज़गार के मौजूदा साधनों का विस्तृत अध्ययन किया जा रहा है। यह सर्वेक्षण इसलिए महत्वपूर्ण है ताकि पुनर्पयोग योजना स्थानीय ज़रूरतों के अनुरूप बनाई जा सके।

उच्चस्तरीय बैठक और भागीदार संस्थाएँ

रांची में आयोजित बैठक में खान एवं भूतत्व विभाग के सचिव अरवा राजकमल के नेतृत्व में राज्य सरकार के अधिकारियों के साथ-साथ जीआईजेड, कोल कंट्रोलर ऑर्गनाइजेशन, सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड (सीसीएल) और सेंट्रल माइन प्लानिंग एंड डिज़ाइन इंस्टीट्यूट (सीएमपीडीआई) के प्रतिनिधि उपस्थित रहे। बैठक में केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजने की रूपरेखा तय की गई।

भविष्य की दिशा

राज्य सरकार का मानना है कि कोयला भंडार समाप्त हो जाने के बाद भी खनन क्षेत्र आर्थिक दृष्टि से उपयोगी बने रह सकते हैं। टीसीसीएम परियोजना के तहत मार्च 2030 तक अर्जित अनुभवों के आधार पर एक व्यावहारिक पुनर्पयोग मॉडल तैयार किया जाएगा, जिसे भविष्य में झारखंड और देश की अन्य बंद होने वाली कोयला खदानों में भी लागू किया जा सकेगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली चुनौती क्रियान्वयन की है — झारखंड में खनन-प्रभावित क्षेत्रों में विस्थापन और पर्यावरणीय क्षति की विरासत गहरी है। सौर ऊर्जा और पर्यटन जैसे विकल्प तभी कारगर होंगे जब स्थानीय समुदायों को योजना-निर्माण में वास्तविक भागीदारी मिले, न कि केवल सर्वेक्षण का हिस्सा बनाया जाए। यह भी ध्यान देने योग्य है कि टीसीसीएम जैसी अंतरराष्ट्रीय सहयोग परियोजनाएँ अक्सर पायलट चरण से आगे नहीं बढ़ पातीं — मार्च 2030 की समयसीमा से पहले ठोस डीपीआर और केंद्रीय मंजूरी की प्रगति ही इस मॉडल की विश्वसनीयता तय करेगी।
RashtraPress
3 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

झारखंड में बंद कोयला खदानों के पुनर्पयोग की योजना क्या है?
झारखंड सरकार ने गिरिडीह ओसीपी और रामगढ़ जिले की करमा ओसीपी को पायलट प्रोजेक्ट के रूप में चुना है, जहाँ बंद होने के बाद खदान की भूमि, जल संसाधन और आधारभूत ढाँचे का सौर ऊर्जा, कृषि, पर्यटन और कौशल विकास के लिए पुनर्उपयोग किया जाएगा। यह पहल केंद्रीय कोयला मंत्रालय और जर्मनी की जीआईजेड संस्था की टीसीसीएम परियोजना के तहत मार्च 2030 तक चलेगी।
टीसीसीएम परियोजना क्या है और इसमें कौन शामिल है?
टीसीसीएम यानी 'टेक्निकल कोऑपरेशन ऑन टू-बी-डोज्ड कोल माइंस' केंद्रीय कोयला मंत्रालय और जर्मनी की विकास सहयोग संस्था जीआईजेड की संयुक्त परियोजना है। इसमें कोल कंट्रोलर ऑर्गनाइजेशन, सीसीएल और सीएमपीडीआई भी भागीदार हैं, और यह परियोजना मार्च 2030 तक चलेगी।
करमा ओसीपी के आसपास कौन से गाँव इस योजना में शामिल हैं?
करमा ओसीपी के आसपास के आठ गाँव — सुगिया, मरार, बोंगाबार, करमा, कैथा, कंडेर, लोढ़मा और पैंकी — इस योजना में विशेष रूप से शामिल किए गए हैं। इन गाँवों में सामाजिक-आर्थिक स्थिति और रोज़गार के मौजूदा साधनों का अध्ययन किया जा रहा है।
बंद खदानों की जमीन का उपयोग किन कामों के लिए किया जाएगा?
योजना के अनुसार बंद खदानों की भूमि का उपयोग सौर ऊर्जा जैसी नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं, पर्यटन, कृषि, बागवानी, मत्स्य पालन और कौशल विकास केंद्रों के लिए किया जा सकता है। इसके अलावा नई ऊर्जा परियोजनाओं और निवेश की संभावनाएँ भी तलाशी जाएँगी।
इस पायलट प्रोजेक्ट का देश की अन्य खदानों पर क्या असर होगा?
राज्य सरकार का लक्ष्य है कि इन दोनों खदानों से मिले अनुभवों के आधार पर एक व्यावहारिक पुनर्पयोग मॉडल तैयार किया जाए, जिसे भविष्य में झारखंड और देश की अन्य बंद होने वाली कोयला खदानों में भी लागू किया जा सके। यह मॉडल मार्च 2030 तक टीसीसीएम परियोजना के समाप्त होने से पहले तैयार होने की उम्मीद है।
राष्ट्र प्रेस
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