झारखंड की बंद कोयला खदानों को मिलेगा नया जीवन, गिरिडीह और करमा ओसीपी पायलट प्रोजेक्ट के लिए चयनित
सारांश
मुख्य बातें
झारखंड सरकार ने बंद होने वाली कोयला खदानों को बेकार पड़ा छोड़ने के बजाय उन्हें आर्थिक रूप से पुनर्जीवित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। गिरिडीह ओपन कास्ट प्रोजेक्ट (ओसीपी) और रामगढ़ जिले की करमा ओसीपी को पायलट प्रोजेक्ट के लिए चुना गया है, जिसके तहत इन खदानों की जमीन, जल संसाधन, पर्यावरण और आधारभूत ढाँचे का दोबारा उपयोग किया जाएगा। 3 सितंबर को रांची में हुई उच्चस्तरीय बैठक में राज्य सरकार की ओर से केंद्र सरकार को इस संबंध में प्रस्ताव भेजने पर सहमति बनी।
पायलट प्रोजेक्ट की रूपरेखा
इस पहल के अंतर्गत दोनों खदानों के लिए विस्तृत 'माइन क्लोजर एंड रिपर्पजिंग प्लान' तैयार किया जाएगा। इसमें यह मूल्यांकन किया जाएगा कि खदान की भूमि और आसपास के संसाधनों का उपयोग स्थानीय समुदायों के लिए रोज़गार और आजीविका के नए अवसर सृजित करने में कैसे किया जा सकता है। यह पहल केंद्रीय कोयला मंत्रालय और जर्मनी की संस्था जीआईजेड (GIZ) के सहयोग से संचालित 'टेक्निकल कोऑपरेशन ऑन टू-बी-डोज्ड कोल माइंस' (टीसीसीएम) परियोजना के तहत की जा रही है, जो मार्च 2030 तक चलेगी।
बंद खदानों में संभावित उपयोग
योजना के अनुसार, बंद खदानों की भूमि का उपयोग सौर ऊर्जा जैसी नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं, पर्यटन, कृषि, बागवानी और मत्स्य पालन के लिए किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, कौशल विकास केंद्र स्थापित करने और अन्य आर्थिक गतिविधियाँ आरंभ करने की संभावनाएँ भी तलाशी जाएँगी। विस्तृत डीपीआर (विस्तृत परियोजना रिपोर्ट) में भूमि उपयोग, पर्यावरण सुधार, जल प्रबंधन, खदान गड्ढों के प्रबंधन और मौजूदा ढाँचे के पुनर्उपयोग की विस्तृत योजना शामिल होगी।
करमा ओसीपी के आसपास के गाँव
करमा ओसीपी के आसपास के आठ गाँवों — सुगिया, मरार, बोंगाबार, करमा, कैथा, कंडेर, लोढ़मा और पैंकी — को इस योजना में विशेष रूप से शामिल किया गया है। इन गाँवों में निवासियों की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति, कमज़ोर वर्गों की आवश्यकताओं और रोज़गार के मौजूदा साधनों का विस्तृत अध्ययन किया जा रहा है। यह सर्वेक्षण इसलिए महत्वपूर्ण है ताकि पुनर्पयोग योजना स्थानीय ज़रूरतों के अनुरूप बनाई जा सके।
उच्चस्तरीय बैठक और भागीदार संस्थाएँ
रांची में आयोजित बैठक में खान एवं भूतत्व विभाग के सचिव अरवा राजकमल के नेतृत्व में राज्य सरकार के अधिकारियों के साथ-साथ जीआईजेड, कोल कंट्रोलर ऑर्गनाइजेशन, सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड (सीसीएल) और सेंट्रल माइन प्लानिंग एंड डिज़ाइन इंस्टीट्यूट (सीएमपीडीआई) के प्रतिनिधि उपस्थित रहे। बैठक में केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजने की रूपरेखा तय की गई।
भविष्य की दिशा
राज्य सरकार का मानना है कि कोयला भंडार समाप्त हो जाने के बाद भी खनन क्षेत्र आर्थिक दृष्टि से उपयोगी बने रह सकते हैं। टीसीसीएम परियोजना के तहत मार्च 2030 तक अर्जित अनुभवों के आधार पर एक व्यावहारिक पुनर्पयोग मॉडल तैयार किया जाएगा, जिसे भविष्य में झारखंड और देश की अन्य बंद होने वाली कोयला खदानों में भी लागू किया जा सकेगा।