झारखंड जेलों में 43 में से 42 डॉक्टर पद खाली: हाईकोर्ट ने लिया स्वत: संज्ञान, मामला चीफ जस्टिस को भेजा

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झारखंड जेलों में 43 में से 42 डॉक्टर पद खाली: हाईकोर्ट ने लिया स्वत: संज्ञान, मामला चीफ जस्टिस को भेजा

सारांश

झारखंड की जेलों में डॉक्टरों के 43 में से 42 पद खाली हैं — यह सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि कैदियों के संवैधानिक स्वास्थ्य अधिकार का उल्लंघन है। एक कैदी की किडनी की बीमारी से मौत ने इस संकट को अदालत के सामने ला खड़ा किया, और अब मामला चीफ जस्टिस के पास है।

Key Takeaways

झारखंड हाईकोर्ट ने 30 अप्रैल 2026 को जेलों में डॉक्टरों की कमी पर स्वत: संज्ञान लिया। राज्य की जेलों में 43 स्वीकृत पदों में से केवल 1 पद पर डॉक्टर कार्यरत, 42 पद रिक्त। जस्टिस एस.एन. प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने मामला चीफ जस्टिस को भेजा। एक कैदी की किडनी की बीमारी से मृत्यु के बाद परिजनों को मुआवजे हेतु अलग याचिका दाखिल करने की अनुमति दी गई। अगली सुनवाई में झारखंड सरकार से विस्तृत जवाब तलब किए जाने की संभावना।

झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य की जेलों में चिकित्सकों की गंभीर कमी और स्वास्थ्य सुविधाओं की बदहाल स्थिति पर 30 अप्रैल 2026 को कड़ा रुख अपनाते हुए स्वत: संज्ञान लिया है। जस्टिस एस.एन. प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने इस मामले को आगे की सुनवाई के लिए चीफ जस्टिस के समक्ष रखने का निर्देश दिया है। अदालत के सामने पेश आँकड़ों ने स्थिति की गंभीरता को स्पष्ट रूप से उजागर कर दिया।

चौंकाने वाले आँकड़े

सुनवाई के दौरान सामने आया कि झारखंड की जेलों में चिकित्सकों के कुल 43 स्वीकृत पद हैं, जिनमें से केवल एक पद पर ही डॉक्टर कार्यरत हैं। शेष 42 पद रिक्त पड़े हैं — यानी 97.7% से अधिक पद खाली हैं। अदालत ने इसे अत्यंत चिंताजनक बताते हुए कहा कि यह जेलों में बंद कैदियों के स्वास्थ्य अधिकार का सीधा उल्लंघन है। इसके साथ ही जेलों में मेडिकल सुविधाओं की आधारभूत संरचना में भी भारी कमी की बात सामने आई।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मुद्दा एक आपराधिक अपील की सुनवाई के दौरान उठा, जिसमें एक प्रार्थी ने हस्तक्षेप याचिका दाखिल कर अपनी किडनी खराब होने का हवाला देते हुए जमानत की माँग की थी। राज्य सरकार की ओर से जवाब दाखिल किए जाने से पहले ही प्रार्थी की मृत्यु हो गई। मृतक के परिजनों ने अदालत से मुआवजे की माँग की, जिस पर कोर्ट ने उन्हें इस संबंध में अलग से याचिका दाखिल करने की अनुमति प्रदान की है।

अदालत की टिप्पणी

खंडपीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि राज्य सरकार की यह संवैधानिक जिम्मेदारी है कि वह जेलों में पर्याप्त संख्या में चिकित्सकों की नियुक्ति सुनिश्चित करे और आवश्यक मेडिकल इन्फ्रास्ट्रक्चर उपलब्ध कराए। गौरतलब है कि यह ऐसे समय में आया है जब देश भर में जेल सुधार और कैदियों के अधिकारों को लेकर न्यायपालिका पहले से सक्रिय रही है।

आगे क्या होगा

माना जा रहा है कि अगली सुनवाई में झारखंड सरकार से जेलों में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति पर विस्तृत जवाब तलब किया जा सकता है। चीफ जस्टिस के समक्ष मामला पहुँचने के बाद यह संभव है कि राज्य सरकार को एक निर्धारित समय-सीमा के भीतर रिक्त पदों को भरने और चिकित्सा सुविधाएँ सुधारने का निर्देश दिया जाए। यह मामला झारखंड की जेल व्यवस्था में सुधार की दिशा में एक अहम कदम साबित हो सकता है।

Point of View

लेकिन सवाल यह है कि ऐसे कितने मामले बिना किसी सुनवाई के दब गए। न्यायपालिका का हस्तक्षेप स्वागत योग्य है, परंतु जब तक राज्य सरकार भर्ती प्रक्रिया में ठोस समय-सीमा नहीं तय करती और जेल चिकित्सा सेवाओं को प्राथमिकता नहीं देती, तब तक यह संज्ञान भी महज़ एक और न्यायिक रिकॉर्ड बनकर रह सकता है।
NationPress
30/04/2026

Frequently Asked Questions

झारखंड हाईकोर्ट ने जेलों में डॉक्टरों की कमी पर स्वत: संज्ञान क्यों लिया?
एक आपराधिक अपील की सुनवाई के दौरान सामने आया कि झारखंड की जेलों में 43 स्वीकृत पदों में से केवल 1 पर डॉक्टर कार्यरत है और 42 पद रिक्त हैं। इस स्थिति को कैदियों के स्वास्थ्य अधिकार का उल्लंघन मानते हुए अदालत ने स्वत: संज्ञान लिया।
झारखंड जेलों में कितने डॉक्टर पद रिक्त हैं?
झारखंड की जेलों में चिकित्सकों के कुल 43 स्वीकृत पदों में से 42 पद रिक्त हैं और केवल 1 पद पर डॉक्टर कार्यरत है। यह 97% से अधिक रिक्तता की स्थिति है।
यह मामला हाईकोर्ट के सामने कैसे आया?
एक कैदी ने किडनी खराब होने का हवाला देते हुए जमानत के लिए हस्तक्षेप याचिका दाखिल की थी, लेकिन राज्य सरकार के जवाब से पहले ही उसकी मृत्यु हो गई। इस घटना ने जेलों में स्वास्थ्य सुविधाओं की बदहाली को उजागर किया और अदालत ने स्वत: संज्ञान लिया।
मृतक कैदी के परिजनों को क्या राहत मिली?
अदालत ने मृतक के परिजनों को मुआवजे की माँग के लिए अलग से याचिका दाखिल करने की अनुमति दी है। मुआवजे पर कोई अंतिम निर्णय अभी नहीं हुआ है।
अब इस मामले में आगे क्या होगा?
मामला चीफ जस्टिस के समक्ष भेजा गया है और अगली सुनवाई में झारखंड सरकार से जेलों में स्वास्थ्य सेवाओं पर विस्तृत जवाब तलब किए जाने की संभावना है। सरकार को रिक्त पद भरने और मेडिकल इन्फ्रास्ट्रक्चर सुधारने का निर्देश दिया जा सकता है।
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