झारखंड जेलों में 43 में से 42 डॉक्टर पद खाली: हाईकोर्ट ने लिया स्वत: संज्ञान, मामला चीफ जस्टिस को भेजा
सारांश
Key Takeaways
झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य की जेलों में चिकित्सकों की गंभीर कमी और स्वास्थ्य सुविधाओं की बदहाल स्थिति पर 30 अप्रैल 2026 को कड़ा रुख अपनाते हुए स्वत: संज्ञान लिया है। जस्टिस एस.एन. प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने इस मामले को आगे की सुनवाई के लिए चीफ जस्टिस के समक्ष रखने का निर्देश दिया है। अदालत के सामने पेश आँकड़ों ने स्थिति की गंभीरता को स्पष्ट रूप से उजागर कर दिया।
चौंकाने वाले आँकड़े
सुनवाई के दौरान सामने आया कि झारखंड की जेलों में चिकित्सकों के कुल 43 स्वीकृत पद हैं, जिनमें से केवल एक पद पर ही डॉक्टर कार्यरत हैं। शेष 42 पद रिक्त पड़े हैं — यानी 97.7% से अधिक पद खाली हैं। अदालत ने इसे अत्यंत चिंताजनक बताते हुए कहा कि यह जेलों में बंद कैदियों के स्वास्थ्य अधिकार का सीधा उल्लंघन है। इसके साथ ही जेलों में मेडिकल सुविधाओं की आधारभूत संरचना में भी भारी कमी की बात सामने आई।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मुद्दा एक आपराधिक अपील की सुनवाई के दौरान उठा, जिसमें एक प्रार्थी ने हस्तक्षेप याचिका दाखिल कर अपनी किडनी खराब होने का हवाला देते हुए जमानत की माँग की थी। राज्य सरकार की ओर से जवाब दाखिल किए जाने से पहले ही प्रार्थी की मृत्यु हो गई। मृतक के परिजनों ने अदालत से मुआवजे की माँग की, जिस पर कोर्ट ने उन्हें इस संबंध में अलग से याचिका दाखिल करने की अनुमति प्रदान की है।
अदालत की टिप्पणी
खंडपीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि राज्य सरकार की यह संवैधानिक जिम्मेदारी है कि वह जेलों में पर्याप्त संख्या में चिकित्सकों की नियुक्ति सुनिश्चित करे और आवश्यक मेडिकल इन्फ्रास्ट्रक्चर उपलब्ध कराए। गौरतलब है कि यह ऐसे समय में आया है जब देश भर में जेल सुधार और कैदियों के अधिकारों को लेकर न्यायपालिका पहले से सक्रिय रही है।
आगे क्या होगा
माना जा रहा है कि अगली सुनवाई में झारखंड सरकार से जेलों में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति पर विस्तृत जवाब तलब किया जा सकता है। चीफ जस्टिस के समक्ष मामला पहुँचने के बाद यह संभव है कि राज्य सरकार को एक निर्धारित समय-सीमा के भीतर रिक्त पदों को भरने और चिकित्सा सुविधाएँ सुधारने का निर्देश दिया जाए। यह मामला झारखंड की जेल व्यवस्था में सुधार की दिशा में एक अहम कदम साबित हो सकता है।