कर्नाटक सूखा संकट: डिप्टी सीएम परमेश्वर ने केंद्र से माँगे ₹12,000 करोड़, 50 लाख किसानों को पहली किस्त जारी
सारांश
मुख्य बातें
कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री जी. परमेश्वर ने 8 अक्टूबर 2026 को कोप्पल जिले के येल्बुर्गा तालुक के गुन्नल गाँव में सूखाग्रस्त खेतों का दौरा करने के बाद कहा कि राज्य सरकार ने केंद्र से सूखा राहत के लिए ₹10,000 करोड़ से ₹12,000 करोड़ की सहायता माँगी है। राज्य सरकार पहले ही 50 लाख प्रभावित किसानों को पहली किस्त के तौर पर ₹2,500 प्रति किसान जारी कर चुकी है, जिस पर करीब ₹1,250 करोड़ खर्च हुए हैं।
सूखे की भयावहता: 217 तालुक प्रभावित
कर्नाटक के 240 तालुकों में से 217 तालुकों को अब तक आधिकारिक रूप से सूखाग्रस्त घोषित किया जा चुका है। परमेश्वर ने बताया कि उत्तरी कर्नाटक के जिले — बल्लारी, विजयनगर, कोप्पल, रायचूर और विजयपुरा — मैसूर क्षेत्र की तुलना में कहीं अधिक बुरी स्थिति में हैं। विजयनगर जिले में लगभग 98 प्रतिशत फसलें पूरी तरह बर्बाद हो चुकी हैं और बची हुई फसलों से भी उत्पादन की संभावना न के बराबर है।
राज्य के भूजल स्तर पर भी सूखे की मार साफ दिख रही है। परमेश्वर ने बताया कि कुछ इलाकों में 500 फीट तक ड्रिलिंग के बाद भी पानी नहीं मिला, जबकि कुछ स्थानों पर 1,800 फीट गहराई तक बोरवेल करने के बावजूद पानी उपलब्ध नहीं हो सका।
केंद्र से राहत और एनडीआरएफ का मसला
केंद्र सरकार के राष्ट्रीय आपदा मोचन निधि (एनडीआरएफ) के मानदंडों के अनुसार, प्रत्येक प्रभावित किसान ₹8,500 की राहत पाने का हकदार है, जिसमें केंद्र और राज्य दोनों का हिस्सा शामिल है। हालाँकि, केंद्र ने अभी तक अपना हिस्सा जारी नहीं किया है। इसी वजह से राज्य सरकार ने अपने स्वयं के कोष से प्रथम किस्त के रूप में ₹2,500 प्रति किसान देने का निर्णय लिया।
177 तालुकों में हुए नुकसान के आकलन के आधार पर फसल क्षति का अनुमान लगभग ₹46,000 करोड़ लगाया गया है। परमेश्वर ने कहा कि यदि सूखा जारी रहा और नुकसान ₹60,000 करोड़ तक पहुँचा, तो राज्य केंद्र से ₹18,000 करोड़ से ₹20,000 करोड़ तक की राहत माँग सकता है।
सूखे का जायजा लेने के लिए तीन केंद्रीय दलों ने कर्नाटक के विभिन्न हिस्सों का दौरा किया है। राज्य को उम्मीद है कि इन दलों की रिपोर्ट के आधार पर केंद्र राहत राशि जल्द जारी करेगा।
पलायन और रोजगार: ग्रामीण संकट गहरा
परमेश्वर ने बताया कि सूखे की मार के कारण कई गाँवों से पलायन शुरू हो गया है। लंबानी टांडा बस्ती के लोग रोज़गार की तलाश में बाहर जाने की तैयारी में थे। उपमुख्यमंत्री ने अधिकारियों को ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत तत्काल काम उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने कहा, 'अगर ग्रामीण इलाकों में काम मिले तो पलायन को रोका जा सकता है। हम तभी बच सकते हैं जब किसान बचेंगे।'
किसानों की आर्थिक स्थिति पर बात करते हुए परमेश्वर ने कहा कि अधिकांश छोटे किसान दो-तीन एकड़ ज़मीन पर खेती के लिए बैंकों, निजी सूदखोरों और परिचितों से उधार लेकर काम करते हैं। फसल बर्बाद होने के बाद अब उनके सामने कर्ज चुकाने और बुनियादी ज़रूरतें पूरी करने का भारी संकट खड़ा हो गया है।
सरकारी राहत उपाय और बीमा
राज्य सरकार ने सूखाग्रस्त किसानों को लोन चुकाने के लिए 60 महीने (5 साल) की मोहलत देने का प्रावधान किया है, जिसके बारे में बैंकों को सूचित कर दिया गया है। इसके अलावा किसानों को डीजल सब्सिडी, बिजली सब्सिडी और सरकारी गारंटी योजनाओं के ज़रिए भी सहायता दी जा रही है।
फसल बीमा मुआवज़े को लेकर भी बीमा कंपनियों के साथ बातचीत हुई है और सरकार फसल बीमा प्रीमियम में किसानों के हिस्से से जुड़े मुद्दों पर विचार कर रही है। परमेश्वर ने कहा कि पेंडिंग बीमा दावों के भुगतान को जल्द से जल्द सुनिश्चित करने की कोशिश की जा रही है।
मक्के की गिरती कीमतों पर परमेश्वर ने कहा कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को उचित स्तर पर सुनिश्चित करना केंद्र सरकार की ज़िम्मेदारी है और इस विषय में केंद्र से दखल देने का अनुरोध किया जाएगा।
राजनीतिक समन्वय और आगे की राह
परमेश्वर ने बताया कि मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार और वे स्वयं विपक्षी नेताओं के साथ एक संयुक्त प्रतिनिधिमंडल लेकर केंद्र से अधिक सहायता माँगने की योजना बना रहे थे। हालाँकि, भारतीय जनता पार्टी (BJP) और जनता दल (सेक्युलर) के नेताओं ने संकेत दिया कि वे इस प्रतिनिधिमंडल में शामिल नहीं होंगे।
उन्होंने गारंटी योजनाओं के कारण राज्य में आर्थिक संकट के आरोपों को भी खारिज किया और कहा कि सरकार ने पिछले तीन वर्षों में इन योजनाओं पर लगभग ₹52,000 करोड़ खर्च किए हैं और वित्तीय अनुशासन बनाए रखा है। परमेश्वर ने कहा, 'यह राजनीति का समय नहीं है; यह किसानों के साथ खड़े होने का समय है। कर्नाटक के सांसदों को पार्टी से ऊपर उठकर केंद्र पर दबाव बनाना चाहिए।' आने वाले दिनों में केंद्रीय दलों की रिपोर्ट और राज्य सरकार की माँग के आधार पर राहत राशि का निर्धारण इस संकट की दिशा तय करेगा।