मसनोडीह के आम: बिना केमिकल, छह दशक की मिठास — पटना से अमेरिका तक पहुँची झारखंड की पहचान
सारांश
मुख्य बातें
झारखंड के कोडरमा जिले के डोमचांच प्रखंड स्थित मसनोडीह गाँव में छह दशकों से अधिक समय से बिना किसी रासायनिक प्रसंस्करण के आम उगाए जा रहे हैं, और इन दिनों यहाँ के गछपकु आम — यानी पेड़ पर प्राकृतिक रूप से पके आम — की माँग पटना, दिल्ली, रांची से लेकर अमेरिका तक पहुँच चुकी है। मसनोडीह आज क्षेत्र के सबसे चर्चित आम बागानों में शुमार हो चुका है, जहाँ 10 बागानों में तीन हजार से अधिक फलदार पेड़ लहलहा रहे हैं।
मसनोडीह के बागानों की खासियत
मसनोडीह के बागानों में मालदा, जर्दालू, गुलाब खास, बम्बईया, हिमसागर, आम्रपाली, किशुन भोग, बेलखास, मणिका, सीपिया और फज़ली सुकूल सहित एक दर्जन से अधिक प्रजातियों के आम उगाए जाते हैं। हर बागान में सैकड़ों पेड़ हैं और इन दिनों सभी फलों से लदे हुए हैं। यहाँ खरीदार सीधे बागान पहुँचकर ताज़े आम खरीदते हैं, साथ ही फोन पर ऑर्डर देकर ट्रेन और बस के ज़रिये दूसरे प्रदेशों में भी मँगवाते हैं।
केमिकल-मुक्त खेती — स्वाद और सेहत दोनों में बेहतर
आम खरीदार रोहित कुमार ने बताया कि बाज़ार में बिकने वाले अधिकतर आम कार्बाइड से पकाए जाते हैं, जो दो-तीन दिन में ही सड़ जाते हैं और उनमें स्वाद भी नहीं होता। इसके विपरीत, मसनोडीह के आम पेड़ पर प्राकृतिक रूप से पकते हैं, जिससे न केवल स्वाद बेहतरीन रहता है, बल्कि ये स्वास्थ्य की दृष्टि से भी सुरक्षित हैं।
बागान मालिक विनय सिंह ने बताया कि उनका बाग बहुत पुराना है। वे समय-समय पर पेड़ों को खाद और पानी देते हैं, जिससे कीट नहीं लगते। उनके बागान में 45 पेड़ हैं और मालदा, जर्दालू, गुलाब खास, बम्बईया तथा हिमसागर जैसी प्रजातियों की पैदावार होती है।
उत्पादन और बाज़ार का विस्तार
बागान मालिक रमाकांत सिंह के अनुसार, उनके बागान से 100 क्विंटल से अधिक आम का उत्पादन होता है। मुख्य रूप से मालदा की पैदावार होती है, साथ ही बम्बईया और हिमसागर भी उगाए जाते हैं। उन्होंने बताया कि पिछले सीजन में तीन पेटी आम अमेरिका भी भेजा गया था। बागान की देखरेख करने वाले राजू मेहता ने जानकारी दी कि पिछले वर्ष कोडरमा के एक व्यक्ति ने अमेरिका में रहने वाले परिजनों के लिए 30 किलो आम मँगवाया था और इस बार भी ऑर्डर आया है।
गौरतलब है कि यह ऐसे समय में आया है जब देश भर में रासायनिक रूप से पकाए गए फलों को लेकर उपभोक्ताओं में स्वास्थ्य संबंधी चिंताएँ बढ़ रही हैं। मसनोडीह का प्राकृतिक उत्पादन मॉडल इस माँग के अनुरूप एक विश्वसनीय विकल्प के रूप में उभर रहा है।
सुरक्षा और देखभाल की व्यवस्था
बागानों की सुरक्षा के लिए 24 घंटे निगरानी की व्यवस्था की गई है। पेड़ लगाने के तीन से चार वर्षों में फल देना शुरू कर देते हैं और इनके लिए किसी विशेष देखभाल की आवश्यकता नहीं — समय पर खाद, पानी और कीटनाशक पर्याप्त है।
आगे की राह
मसनोडीह के आम अब केवल झारखंड की पहचान नहीं रहे — ये अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में भी दस्तक दे चुके हैं। यदि इस प्राकृतिक उत्पादन पद्धति को संस्थागत समर्थन और कृषि निर्यात नीति से जोड़ा जाए, तो मसनोडीह का आम भारत के प्रीमियम कृषि निर्यात का एक उल्लेखनीय उदाहरण बन सकता है।