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कोलकाता पुलिस का बड़ा आदेश: ड्यूटी पर वर्दी अनिवार्य, 5 विशेष विभागों को छूट

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कोलकाता पुलिस का बड़ा आदेश: ड्यूटी पर वर्दी अनिवार्य, 5 विशेष विभागों को छूट

सारांश

कोलकाता पुलिस ने 1997 के सर्वोच्च न्यायालय के डीके बसु फैसले का हवाला देते हुए सभी कर्मियों के लिए ड्यूटी पर वर्दी अनिवार्य कर दी है। जाँच, साइबर और विशेष शाखा सहित पाँच विभागों को छूट मिली है। यह आदेश नागरिक अधिकारों की रक्षा और पुलिस जवाबदेही को मज़बूत करने की दिशा में एक अहम कदम है।

मुख्य बातें

कोलकाता पुलिस आयुक्त अजय नंद के कार्यालय ने 24 मई 2026 को वर्दी अनिवार्यता की अधिसूचना जारी की।
छापेमारी, गिरफ्तारी और कानून-व्यवस्था ड्यूटी के दौरान सिविल ड्रेस पर पूर्ण प्रतिबंध लागू।
जाँच विभाग, विशेष शाखा, प्रवर्तन शाखा, विशेष कार्य बल और साइबर अपराध प्रभाग — इन पाँच विभागों को छूट।
अपवाद के लिए उच्च अधिकारियों की पूर्व लिखित अनुमति अनिवार्य।
आदेश 1997 के डीके बसु बनाम पश्चिम बंगाल सरकार मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों पर आधारित है।
यह फैसला संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 के तहत मौलिक अधिकारों के संरक्षण का आधार है।

कोलकाता पुलिस ने 24 मई 2026 को एक आधिकारिक अधिसूचना जारी कर सभी स्तरों के कर्मियों के लिए ड्यूटी के दौरान वर्दी पहनना अनिवार्य कर दिया है। पुलिस आयुक्त अजय नंद के कार्यालय से जारी इस आदेश के तहत अब कोई भी पुलिसकर्मी सिविल ड्रेस में आधिकारिक ड्यूटी नहीं कर सकेगा — चाहे वह छापेमारी हो, गिरफ्तारी हो या कानून-व्यवस्था बनाए रखने का कार्य। यह निर्देश सर्वोच्च न्यायालय के उस ऐतिहासिक फैसले की याद दिलाता है जो नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए जारी किया गया था।

आदेश का दायरा और छूट प्राप्त विभाग

इस अधिसूचना में पाँच विशेष विभागों को छूट दी गई है — जाँच विभाग, विशेष शाखा, प्रवर्तन शाखा, विशेष कार्य बल और साइबर अपराध प्रभाग। इन विभागों के लिए सादे कपड़ों में रहना उनके कार्य की प्रकृति का अभिन्न हिस्सा है, इसलिए उन्हें इस प्रतिबंध से बाहर रखा गया है।

यदि इन पाँच विभागों से इतर किसी अधिकारी या कर्मचारी को किसी विशेष परिस्थिति में वर्दी के बिना ड्यूटी करनी पड़े, तो उसे पहले उच्च अधिकारियों से लिखित अनुमति लेनी होगी।

डीके बसु फैसले का संदर्भ

अधिसूचना में 1997 के ऐतिहासिक डीके बसु बनाम पश्चिम बंगाल सरकार मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का उल्लेख किया गया है। उस समय वाम मोर्चा शासन के दौरान आए इस निर्णय में न्यायालय ने गिरफ्तारी और हिरासत के संबंध में पुलिस के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश निर्धारित किए थे।

सर्वोच्च न्यायालय ने उस फैसले में आदेश दिया था कि ड्यूटी पर तैनात सभी पुलिसकर्मी वर्दी पहनें और गिरफ्तारी या पूछताछ करने वाले अधिकारियों के पास स्पष्ट रूप से दिखाई देने वाले नाम टैग हों जिन पर उनका पदनाम अंकित हो। यह निर्णय पुलिस के दुर्व्यवहार, हिरासत में यातना और लॉक-अप में होने वाली मौतों पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से दिया गया था।

संवैधानिक महत्व

सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) और अनुच्छेद 22 (मनमानी गिरफ्तारी से संरक्षण) के तहत मौलिक अधिकारों की रक्षा के संदर्भ में एक मील का पत्थर माना जाता है। गौरतलब है कि यह आदेश तीन दशक पुराने उस फैसले को ज़मीनी स्तर पर लागू करने की दिशा में एक ठोस कदम है।

प्रशासनिक पारदर्शिता पर असर

शहर के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने इस घटनाक्रम की पुष्टि करते हुए बताया कि यह अधिसूचना 24 मई को जारी की जा चुकी है और तत्काल प्रभाव से लागू है। यह कदम पुलिस-नागरिक संबंधों में पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आने वाले दिनों में इसके अनुपालन की निगरानी किस प्रकार होगी, यह देखना अहम होगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असल सवाल यह है कि 1997 के सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश को लागू करने में तीन दशक क्यों लगे। डीके बसु फैसला हिरासत में यातना और मनमानी गिरफ्तारियों पर अंकुश लगाने के लिए था — अगर यह नियम पहले से अस्तित्व में था, तो नई अधिसूचना की ज़रूरत क्यों पड़ी? यह स्वीकारोक्ति है कि पुराने निर्देश ज़मीन पर लागू नहीं हो रहे थे। अनुपालन की निगरानी के लिए कोई स्वतंत्र तंत्र न हो, तो यह आदेश भी कागज़ी खानापूर्ति बनकर रह सकता है।
RashtraPress
12 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कोलकाता पुलिस का वर्दी अनिवार्यता आदेश क्या है?
यह 24 मई 2026 को पुलिस आयुक्त अजय नंद के कार्यालय द्वारा जारी एक अधिसूचना है, जिसमें सभी स्तरों के पुलिसकर्मियों को ड्यूटी के दौरान वर्दी पहनना अनिवार्य किया गया है। जाँच, साइबर अपराध सहित पाँच विशेष विभागों को इससे छूट दी गई है।
किन विभागों को इस आदेश से छूट मिली है?
जाँच विभाग, विशेष शाखा, प्रवर्तन शाखा, विशेष कार्य बल और साइबर अपराध प्रभाग को छूट दी गई है। इन विभागों के लिए सादे कपड़ों में काम करना उनकी ड्यूटी की प्रकृति का हिस्सा है।
डीके बसु फैसला क्या है और इसका इस आदेश से क्या संबंध है?
1997 में सर्वोच्च न्यायालय ने डीके बसु बनाम पश्चिम बंगाल सरकार मामले में पुलिस गिरफ्तारी और हिरासत के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश जारी किए थे। इसमें वर्दी पहनना और नाम टैग लगाना अनिवार्य किया गया था; कोलकाता पुलिस का नया आदेश उसी फैसले पर आधारित है।
क्या कोई पुलिसकर्मी विशेष परिस्थिति में बिना वर्दी ड्यूटी कर सकता है?
हाँ, लेकिन इसके लिए उसे पहले उच्च अधिकारियों से पूर्व अनुमति लेनी होगी। बिना अनुमति के छूट प्राप्त विभागों से बाहर का कोई भी कर्मी सिविल ड्रेस में ड्यूटी नहीं कर सकता।
इस आदेश का नागरिकों पर क्या असर होगा?
इस आदेश से गिरफ्तारी या छापेमारी के दौरान नागरिक पुलिसकर्मी की पहचान आसानी से कर सकेंगे। यह संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 के तहत मनमानी हिरासत से सुरक्षा को व्यावहारिक रूप देने की दिशा में एक कदम है।
राष्ट्र प्रेस
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