क्या रानीगंज की लड़ाई आसान होगी? कभी कांग्रेस का गढ़ था यह क्षेत्र

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क्या रानीगंज की लड़ाई आसान होगी? कभी कांग्रेस का गढ़ था यह क्षेत्र

सारांश

रानीगंज विधानसभा सीट, जो कभी कांग्रेस का गढ़ रही है, आज भाजपा और जदयू की ताकत में है। जानिए इस सीट के इतिहास, मतदाता आंकड़े और आगामी चुनावों की तैयारियों के बारे में। क्या यह सीट फिर से कांग्रेस के हाथ में आएगी?

मुख्य बातें

रानीगंज विधानसभा सीट का इतिहास कांग्रेस के प्रभाव से शुरू हुआ।
भाजपा और जदयू ने पिछले 20 वर्षों से सीट पर कब्जा किया हुआ है।
मतदाता आंकड़े 2020 में 3,36,020 थे।
यह क्षेत्र कृषि पर आधारित है, जहां बाढ़ की समस्या भी है।
2024 के लोकसभा चुनाव में मतदाताओं की संख्या बढ़ी है।

पटना, 26 अगस्त (राष्ट्र प्रेस)। बिहार के अररिया जिले में स्थित रानीगंज विधानसभा सीट पिछले 20 वर्षों से भाजपा और जदयू का मुख्य आधार रही है। यह सीट अनुसूचित जाति (एससी) के लिए आरक्षित है और इसमें सात ग्राम पंचायतें शामिल हैं, जहां एससी वोटर एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

1957 में स्थापित रानीगंज विधानसभा सीट बिहार के अररिया जिले का एक प्रमुख ग्रामीण निर्वाचन क्षेत्र है। इस सीट पर अब तक 16 विधानसभा चुनाव हो चुके हैं, जिनमें कभी कांग्रेस और कभी भाजपा ने अपनी ताकत दिखाई है।

इस विधानसभा क्षेत्र में बीरनगर पूर्वी, बीरनगर पश्चिमी, धनैश्वरी, हरिपुर कला, खूथा बैजनाथपुर, नया भरगामा और विशहरिया जैसी सात ग्राम पंचायतें शामिल हैं। रानीगंज, अररिया जिला मुख्यालय से 27 किलोमीटर पश्चिम में स्थित है और यह बनमनखी बाजार (25 किमी), फारबिसगंज (26 किमी), मुरलीगंज (35 किमी) और पूर्णिया (46 किमी) से सड़क मार्ग से जुड़ा हुआ है।

रानीगंज सीट के प्रारंभिक इतिहास पर ध्यान दें तो यहां पर कांग्रेस का दबदबा रहा है। कांग्रेस ने 1957 से 1985 के दौरान हुए विधानसभा चुनावों में पांच बार जीत हासिल की। हालांकि, कांग्रेस की जड़ों का कमजोर होना अन्य राजनीतिक दलों की बढ़ती ताकत का कारण बना। भाजपा ने यहां तीन बार (2005 के दोनों चुनावों सहित), जनता दल और जदयू ने दो-दो बार, निर्दलीय उम्मीदवारों ने दो बार, जबकि जनता पार्टी और राजद ने एक-एक बार जीत दर्ज की।

2005 से यह सीट भाजपा और जदयू के पास रही है। 2005 में दो बार विधानसभा चुनाव हुए, और पहली बार परमानंद ऋषिदेव ने जीत हासिल की, जबकि दूसरी बार रामजीदास ऋषिदेव ने जीत दर्ज की। 2010 में भाजपा के परमानंद ऋषिदेव यहां से विधायक चुने गए। 2015 में एनडीए गठबंधन टूट गया और जदयू ने अपना उम्मीदवार मैदान में उतारा, जहां जदयू के अचमित ऋषिदेव ने भाजपा के उम्मीदवार को 14,930 मतों से हराया।

2020 में विधानसभा चुनाव में जदयू और भाजपा एक साथ आए और मिलकर चुनाव लड़ा। उस बार भी जदयू ने सीट अपने नाम की और अचमित ऋषिदेव ने राजद के अविनाश मंगला को 2,304 मतों के अंतर से हराया।

चुनाव आयोग के अनुसार, 2020 में रानीगंज में 3,36,020 पंजीकृत मतदाता थे, जिनमें 20.03 प्रतिशत अनुसूचित जाति, 3.90 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति और 31.40 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता शामिल थे। 2020 में मतदान प्रतिशत 55.35 प्रतिशत रहा, जो 2015 के 56.98 प्रतिशत से थोड़ा कम था।

हालांकि, 2024 के लोकसभा चुनाव में मतदाताओं की संख्या बढ़कर 3,47,959 हो गई है।

चुनाव आयोग के अनुसार, 2020 की मतदाता सूची के 5,714 मतदाता पलायन कर गए, जो रोजगार और औद्योगिकीकरण की कमी को दर्शाता है।

रानीगंज उत्तर बिहार के तराई क्षेत्र में स्थित एक समतल और निचला इलाका है, जो कोसी और महानंदा नदियों के नजदीक होने के कारण मानसून में जलजमाव और बाढ़ की चपेट में रहता है। ये नदियां कृषि के लिए वरदान हैं, लेकिन बाढ़ की समस्या भी उत्पन्न करती हैं। क्षेत्र की अर्थव्यवस्था पूरी तरह कृषि पर निर्भर है, जहां धान, मक्का और जूट प्रमुख फसलें हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

जहां मतदाता अपनी पहचान और अधिकारों को लेकर सजग हैं।
RashtraPress
13 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

रानीगंज विधानसभा क्षेत्र कब स्थापित हुआ?
रानीगंज विधानसभा क्षेत्र 1957 में स्थापित हुआ था।
रानीगंज विधानसभा सीट पर कौन-कौन सी पार्टियाँ प्रमुख हैं?
भाजपा, जदयू और कांग्रेस इस सीट पर प्रमुख राजनीतिक दल हैं।
2020 में रानीगंज में कितने पंजीकृत मतदाता थे?
2020 में रानीगंज में 3,36,020 पंजीकृत मतदाता थे।
रानीगंज का क्षेत्र किस प्रकार की कृषि पर निर्भर है?
रानीगंज की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से धान, मक्का और जूट जैसी फसलों पर निर्भर है।
रानीगंज में बाढ़ की समस्या क्यों होती है?
रानीगंज कोसी और महानंदा नदियों के निकट है, जिससे मानसून में जलजमाव और बाढ़ की समस्या उत्पन्न होती है।
राष्ट्र प्रेस