क्या तीन साल का बच्चा, एक हादसा और 6 बिंदुओं से हुई क्रांति लुई ब्रेल की कहानी है?
सारांश
Key Takeaways
- लुई ब्रेल ने 6 बिंदुओं की लिपि का आविष्कार किया।
- ब्रेल लिपि दृष्टिहीनों के लिए महत्वपूर्ण है।
- भारत में ब्रेल लिपि का सफर 19वीं सदी में शुरू हुआ।
- लुई के काम ने दृष्टिहीनता को समझने का तरीका बदल दिया।
- आज भी ब्रेल लिपि की प्रासंगिकता बनी हुई है।
नई दिल्ली, 3 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। कभी-कभी इतिहास की महान क्रांतियां किसी भयावह घटना से जन्म लेती हैं। एक ऐसा हादसा, जो एक अंत की तरह प्रतीत होता है, आगे चलकर अनगिनत लोगों के जीवन में नई शुरुआत का कारण बन जाता है। लुई ब्रेल की कहानी कुछ ऐसी ही है। पेरिस के समीप एक छोटे से गांव में घटित एक घटना ने न केवल एक मासूम की दुनिया बदल दी, बल्कि दृष्टिहीनता को देखने का दृष्टिकोण भी हमेशा के लिए परिवर्तित कर दिया।
साल 1812 में, पेरिस के कूपवरे के एक छोटे से गांव में, तीन साल का नन्हा लुई अपने पिता की चमड़े की कार्यशाला में खेल रहा था। एक दिन, पिता के हाथ में मौजूद सुआ अचानक फिसल गया और लुई की दाहिनी आंख में लग गया।
इस संक्रमण ने 'सिम्पैथेटिक ऑप्थाल्मिया' का रूप ले लिया और देखते ही देखते, लुई की दुनिया अंधकारमय हो गई। लेकिन किसी को यह नहीं पता था कि यह 'अंधेरा' दृष्टिहीनों के लिए सबसे बड़ा 'उजाला' बनने वाला था।
लुई का जन्म 4 जनवरी 1809 को हुआ था। इस हादसे के बावजूद, उसके माता-पिता ने हार नहीं मानी और उसे स्कूल भेजा। 10 साल की उम्र में, लुई को पेरिस के 'रॉयल इंस्टीट्यूट फॉर ब्लाइंड यूथ' में छात्रवृत्ति मिली, जो दुनिया का पहला ऐसा स्कूल था। वहाँ रोमन अक्षरों का उपयोग होता था, लेकिन ये किताबें भारी और महंगी थीं। सबसे बड़ी समस्या यह थी कि छात्र पढ़ तो सकते थे, लेकिन लिख नहीं सकते थे।
1821 में, स्कूल में फ्रांसीसी सेना के कैप्टन चार्ल्स बार्बियर ने 'नाइट राइटिंग' का प्रदर्शन किया। यह 12 बिंदुओं पर आधारित एक ध्वन्यात्मक प्रणाली थी। 12 साल के लुई ने इसकी क्षमता को पहचाना, लेकिन इसकी जटिलता को भी समझा। उन्होंने अगले तीन वर्षों (1821-1824) तक निरंतर प्रयास किया। मात्र 15 साल की उम्र में, उन्होंने 12 बिंदुओं को घटाकर 6 कर दिया।
ब्रेल लिपि कोई बेतरतीब बिंदुओं का समूह नहीं है, बल्कि यह एक अद्भुत गणितीय संरचना है। एक सेल में 2 स्तंभ और 3 पंक्तियां होती हैं, जिससे कुल 6 बिंदुओं का संयोजन 64 कोड बनाता है।
अजीब बात यह थी कि इस महान आविष्कार का शुरूआती विरोध उसी स्कूल के शिक्षकों ने किया जहां लुई पढ़ते थे। पियरे-अर्मंड डफौ जैसे प्रशासकों ने ब्रेल में छपी पुस्तकों को जलवा दिया।
1844 में, जब लुई की लिपि की प्रभावशीलता का प्रदर्शन हुआ, तो पूरी दुनिया दंग रह गई। लेकिन जब 1854 में फ्रांस ने इसे आधिकारिक लिपि माना, तब तक लुई ब्रेल का 43 वर्ष की आयु में निधन हो चुका था।
भारत में ब्रेल लिपि का सफर 19वीं सदी के अंत में शुरू हुआ। आजादी से पहले, भारत में 11 अलग-अलग ब्रेल कोड थे, जिससे शिक्षा बहुत कठिन थी। 1951 में, यूनेस्को के सहयोग से 'भारती ब्रेल' को राष्ट्रीय मानक के रूप में स्थापित किया गया।
आज के समय में, लोग सोचते हैं कि ऑडियो बुक्स और स्क्रीन रीडर्स के आने से ब्रेल समाप्त हो जाएगी, लेकिन आंकड़े कुछ और ही बताते हैं। ऑडियो 'सुनना' है, जबकि ब्रेल 'पढ़ना' है। ब्रेल के बिना, दृष्टिहीनों के लिए व्याकरण, वर्तनी और गणित सीखना लगभग असंभव है।