8 अक्टूबर 2026
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मुंशी प्रेमचंद की 90वीं पुण्यतिथि: 'उपन्यास सम्राट' जिन्होंने समाज की कड़वी सच्चाई को साहित्य में उतारा

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मुंशी प्रेमचंद की 90वीं पुण्यतिथि: 'उपन्यास सम्राट' जिन्होंने समाज की कड़वी सच्चाई को साहित्य में उतारा

सारांश

नौ दशक बाद भी मुंशी प्रेमचंद की कलम की धार कुंद नहीं हुई। 8 अक्टूबर 1936 को वाराणसी में दम तोड़ने वाले इस 'उपन्यास सम्राट' ने 'गोदान' से 'ईदगाह' तक ऐसा साहित्य रचा जो आज भी भारतीय समाज का आईना है — किसान, दलित, स्त्री, सब उनकी कलम में जीवंत हो उठते हैं।

मुख्य बातें

मुंशी प्रेमचंद की 90वीं पुण्यतिथि 8 अक्टूबर 2026 को मनाई जा रही है; उनका निधन 8 अक्टूबर 1936 को वाराणसी में हुआ था।
जन्म 31 जुलाई 1880 को वाराणसी के लमही गाँव में; असली नाम धनपत राय श्रीवास्तव ।
प्रसिद्ध बंगाली साहित्यकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय ने उन्हें 'उपन्यास सम्राट' की उपाधि दी थी।
1908 में कहानी संग्रह 'सोज-ए-वतन' अंग्रेज़ सरकार द्वारा जब्त होने के बाद उन्होंने 'प्रेमचंद' नाम अपनाया।
1921 में गांधी के असहयोग आंदोलन के आह्वान पर सरकारी नौकरी छोड़ी; 'हंस' , 'माधुरी' , 'जागरण' पत्रिकाओं का संपादन किया।
प्रमुख रचनाओं में 'गोदान' , 'गबन' , 'निर्मला' , 'ईदगाह' , 'पूस की रात' शामिल हैं।

मुंशी प्रेमचंद की 90वीं पुण्यतिथि पर 8 अक्टूबर 2026 को देशभर में उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की जा रही है। हिंदी और उर्दू साहित्य के इस महान स्तंभ को प्रख्यात बंगाली साहित्यकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय ने 'उपन्यास सम्राट' की उपाधि दी थी — एक ऐसी उपाधि जो नौ दशक बाद भी उतनी ही सार्थक है। प्रेमचंद ने अपनी रचनाओं में गरीब किसानों, दलितों, शोषितों और महिलाओं के दर्द को ऐसी संवेदनशीलता से उकेरा जो भारतीय साहित्य में अद्वितीय है।

जन्म और प्रारंभिक जीवन

मुंशी प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले के लमही गाँव के एक कायस्थ परिवार में हुआ था। उनका असली नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। उनके पिता मुंशी अजायब राय डाकखाने में मुंशी थे और माता आनंदी देवी गृहिणी थीं।

प्रेमचंद का बचपन दुखों की छाया में बीता। मात्र 7 वर्ष की आयु में माता का निधन हो गया और 16 वर्ष में पिता का साया भी उठ गया। इन कठिन परिस्थितियों ने उन्हें तोड़ा नहीं, बल्कि समाज की वास्तविकता को और गहराई से समझने की दृष्टि दी।

शिक्षा और सरकारी सेवा

प्रेमचंद ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा लमही और एक मदरसे में प्राप्त की, जहाँ उन्होंने उर्दू और फ़ारसी भाषाओं में दक्षता हासिल की। 1898 में मैट्रिक और 1919 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बीए की डिग्री प्राप्त करने के बाद वे स्कूल शिक्षक बने और बाद में शिक्षा विभाग में सब-डिप्टी इंस्पेक्टर के पद पर नियुक्त हुए।

गौरतलब है कि 1921 में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन की पुकार पर उन्होंने अपनी सुरक्षित सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया — यह कदम उनके सिद्धांतों की मज़बूती का प्रमाण था। इसके बाद उन्होंने 'हंस', 'माधुरी' और 'जागरण' जैसी पत्रिकाओं का संपादन किया और 'सरस्वती प्रेस' की नींव रखी।

'प्रेमचंद' नाम की कहानी

शुरुआती दौर में वे अपनी रचनाएँ 'नवाब राय' नाम से प्रकाशित करते थे। किंतु 1908 में उनके कहानी संग्रह 'सोज-ए-वतन' को अंग्रेज़ी सरकार ने राष्ट्रवादी विचारों का हवाला देकर जब्त कर लिया। इसके बाद उन्होंने नया उपनाम 'प्रेमचंद' अपनाया और इसी नाम से साहित्य-जगत में अमर हो गए। कालांतर में उनके नाम के साथ 'मुंशी' भी जुड़ गया।

साहित्यिक विरासत और प्रमुख रचनाएँ

प्रेमचंद की लेखनी काल्पनिक संसार से परे भारतीय समाज की जड़ों में उतरती थी। उनकी रचनाओं में किसानों की पीड़ा, दलितों का शोषण और स्त्री-जीवन की विवशता जीवंत हो उठती है। उनके प्रमुख उपन्यासों में 'गोदान', 'गबन', 'कर्मभूमि', 'रंगभूमि', 'निर्मला', 'सेवा सदन' और 'मंगलसूत्र' शामिल हैं।

उनकी कहानियों में 'ईदगाह', 'पूस की रात', 'ठाकुर का कुआँ', 'नमक का दरोगा', 'दो बैलों की कथा', 'बड़े घर की बेटी', 'बूढ़ी काकी' और 'पंच परमेश्वर' जैसी अमर रचनाएँ हैं, जो आज भी पाठ्यक्रमों और साहित्य-चर्चाओं में प्रासंगिक बनी हुई हैं। 'मानसरोवर' उनकी कहानियों का विशाल संग्रह है।

निजी जीवन और विरासत

1895 में मात्र 15 वर्ष की आयु में परिवार के दबाव में हुई पहली शादी अधिक समय तक नहीं टिकी। 1906 में उन्होंने बाल-विधवा शिवरानी देवी से दूसरा विवाह किया, जो जीवनभर उनकी संघर्ष-यात्रा की सहयात्री बनी रहीं। शिवरानी देवी ने प्रेमचंद के निधन के बाद 'प्रेमचंद घर में' शीर्षक से उनकी जीवनी लिखी, जो उनके व्यक्तित्व की अंतरंग झलक प्रस्तुत करती है। उनके तीन बच्चे थे।

मुंशी प्रेमचंद का निधन 8 अक्टूबर 1936 को वाराणसी में हुआ। उनकी 90वीं पुण्यतिथि यह स्मरण कराती है कि समाज की सच्चाई को जो साहित्यकार अपनी कलम से उकेरता है, वह सदियों तक प्रासंगिक बना रहता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन उनकी असली प्रासंगिकता इस बात में है कि 'गोदान' का हल्कू किसान और 'ठाकुर का कुआँ' की गंगी आज भी भारतीय गाँवों में दिखती है। सवाल यह है कि क्या हम प्रेमचंद को पढ़ाते हैं या सिर्फ पढ़ते हैं — क्योंकि उनकी रचनाएँ महज साहित्य नहीं, एक सामाजिक दस्तावेज़ हैं जो जाति, वर्ग और लैंगिक शोषण की जड़ें उजागर करती हैं। मुख्यधारा की स्मृति-कवरेज अक्सर उनके उपन्यासों की सूची तक सिमट जाती है, जबकि 'सोज-ए-वतन' की ज़ब्ती और सरकारी नौकरी छोड़ने का साहस उनके राजनीतिक विचारों की गहराई बताता है — जो आज भी चर्चा का विषय होनी चाहिए।
RashtraPress
8 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मुंशी प्रेमचंद को 'उपन्यास सम्राट' क्यों कहा जाता है?
प्रख्यात बंगाली साहित्यकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय ने प्रेमचंद को 'उपन्यास सम्राट' की उपाधि दी थी। प्रेमचंद ने हिंदी और उर्दू में ऐसे उपन्यास और कहानियाँ लिखीं जो भारतीय समाज की वास्तविक पीड़ा — किसान, दलित, स्त्री — को केंद्र में रखती हैं।
मुंशी प्रेमचंद की 90वीं पुण्यतिथि कब है?
मुंशी प्रेमचंद की 90वीं पुण्यतिथि 8 अक्टूबर 2026 को मनाई जा रही है। उनका निधन 8 अक्टूबर 1936 को वाराणसी में हुआ था।
प्रेमचंद ने 'नवाब राय' से 'प्रेमचंद' नाम क्यों अपनाया?
1908 में अंग्रेज़ सरकार ने उनके कहानी संग्रह 'सोज-ए-वतन' को राष्ट्रवादी विचारों का हवाला देकर जब्त कर लिया, जिसके बाद उन्हें 'नवाब राय' नाम छोड़कर 'प्रेमचंद' उपनाम अपनाना पड़ा। इसी नाम से वे साहित्य-जगत में अमर हो गए।
मुंशी प्रेमचंद की प्रमुख रचनाएँ कौन-सी हैं?
प्रेमचंद के प्रमुख उपन्यासों में 'गोदान', 'गबन', 'निर्मला', 'रंगभूमि', 'कर्मभूमि' और 'सेवा सदन' शामिल हैं। उनकी प्रसिद्ध कहानियों में 'ईदगाह', 'पूस की रात', 'नमक का दरोगा', 'ठाकुर का कुआँ' और 'दो बैलों की कथा' अग्रणी हैं।
प्रेमचंद ने सरकारी नौकरी क्यों छोड़ी?
1921 में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के आह्वान पर प्रेमचंद ने शिक्षा विभाग में सब-डिप्टी इंस्पेक्टर की सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद उन्होंने 'हंस', 'माधुरी' और 'जागरण' जैसी पत्रिकाओं का संपादन किया और 'सरस्वती प्रेस' की स्थापना की।
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