मुंशी प्रेमचंद की 90वीं पुण्यतिथि: 'उपन्यास सम्राट' जिन्होंने समाज की कड़वी सच्चाई को साहित्य में उतारा
सारांश
मुख्य बातें
मुंशी प्रेमचंद की 90वीं पुण्यतिथि पर 8 अक्टूबर 2026 को देशभर में उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की जा रही है। हिंदी और उर्दू साहित्य के इस महान स्तंभ को प्रख्यात बंगाली साहित्यकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय ने 'उपन्यास सम्राट' की उपाधि दी थी — एक ऐसी उपाधि जो नौ दशक बाद भी उतनी ही सार्थक है। प्रेमचंद ने अपनी रचनाओं में गरीब किसानों, दलितों, शोषितों और महिलाओं के दर्द को ऐसी संवेदनशीलता से उकेरा जो भारतीय साहित्य में अद्वितीय है।
जन्म और प्रारंभिक जीवन
मुंशी प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले के लमही गाँव के एक कायस्थ परिवार में हुआ था। उनका असली नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। उनके पिता मुंशी अजायब राय डाकखाने में मुंशी थे और माता आनंदी देवी गृहिणी थीं।
प्रेमचंद का बचपन दुखों की छाया में बीता। मात्र 7 वर्ष की आयु में माता का निधन हो गया और 16 वर्ष में पिता का साया भी उठ गया। इन कठिन परिस्थितियों ने उन्हें तोड़ा नहीं, बल्कि समाज की वास्तविकता को और गहराई से समझने की दृष्टि दी।
शिक्षा और सरकारी सेवा
प्रेमचंद ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा लमही और एक मदरसे में प्राप्त की, जहाँ उन्होंने उर्दू और फ़ारसी भाषाओं में दक्षता हासिल की। 1898 में मैट्रिक और 1919 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बीए की डिग्री प्राप्त करने के बाद वे स्कूल शिक्षक बने और बाद में शिक्षा विभाग में सब-डिप्टी इंस्पेक्टर के पद पर नियुक्त हुए।
गौरतलब है कि 1921 में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन की पुकार पर उन्होंने अपनी सुरक्षित सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया — यह कदम उनके सिद्धांतों की मज़बूती का प्रमाण था। इसके बाद उन्होंने 'हंस', 'माधुरी' और 'जागरण' जैसी पत्रिकाओं का संपादन किया और 'सरस्वती प्रेस' की नींव रखी।
'प्रेमचंद' नाम की कहानी
शुरुआती दौर में वे अपनी रचनाएँ 'नवाब राय' नाम से प्रकाशित करते थे। किंतु 1908 में उनके कहानी संग्रह 'सोज-ए-वतन' को अंग्रेज़ी सरकार ने राष्ट्रवादी विचारों का हवाला देकर जब्त कर लिया। इसके बाद उन्होंने नया उपनाम 'प्रेमचंद' अपनाया और इसी नाम से साहित्य-जगत में अमर हो गए। कालांतर में उनके नाम के साथ 'मुंशी' भी जुड़ गया।
साहित्यिक विरासत और प्रमुख रचनाएँ
प्रेमचंद की लेखनी काल्पनिक संसार से परे भारतीय समाज की जड़ों में उतरती थी। उनकी रचनाओं में किसानों की पीड़ा, दलितों का शोषण और स्त्री-जीवन की विवशता जीवंत हो उठती है। उनके प्रमुख उपन्यासों में 'गोदान', 'गबन', 'कर्मभूमि', 'रंगभूमि', 'निर्मला', 'सेवा सदन' और 'मंगलसूत्र' शामिल हैं।
उनकी कहानियों में 'ईदगाह', 'पूस की रात', 'ठाकुर का कुआँ', 'नमक का दरोगा', 'दो बैलों की कथा', 'बड़े घर की बेटी', 'बूढ़ी काकी' और 'पंच परमेश्वर' जैसी अमर रचनाएँ हैं, जो आज भी पाठ्यक्रमों और साहित्य-चर्चाओं में प्रासंगिक बनी हुई हैं। 'मानसरोवर' उनकी कहानियों का विशाल संग्रह है।
निजी जीवन और विरासत
1895 में मात्र 15 वर्ष की आयु में परिवार के दबाव में हुई पहली शादी अधिक समय तक नहीं टिकी। 1906 में उन्होंने बाल-विधवा शिवरानी देवी से दूसरा विवाह किया, जो जीवनभर उनकी संघर्ष-यात्रा की सहयात्री बनी रहीं। शिवरानी देवी ने प्रेमचंद के निधन के बाद 'प्रेमचंद घर में' शीर्षक से उनकी जीवनी लिखी, जो उनके व्यक्तित्व की अंतरंग झलक प्रस्तुत करती है। उनके तीन बच्चे थे।
मुंशी प्रेमचंद का निधन 8 अक्टूबर 1936 को वाराणसी में हुआ। उनकी 90वीं पुण्यतिथि यह स्मरण कराती है कि समाज की सच्चाई को जो साहित्यकार अपनी कलम से उकेरता है, वह सदियों तक प्रासंगिक बना रहता है।