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शरत चंद्र चट्टोपाध्याय जयंती: गरीबी से निकले 'आवारा मसीहा' जिनकी कलम ने पूरे भारत को जोड़ा

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शरत चंद्र चट्टोपाध्याय जयंती: गरीबी से निकले 'आवारा मसीहा' जिनकी कलम ने पूरे भारत को जोड़ा

सारांश

गरीबी में पला, मामा के घर भटका और फिर कलम से पूरे देश को जोड़ा — शरत चंद्र चट्टोपाध्याय की जयंती पर उस साहित्यकार को याद करना ज़रूरी है जिन्होंने 'देवदास' और 'परिणीता' जैसी रचनाओं से भारतीय भाषाओं की सीमाएँ मिटा दीं।

मुख्य बातें

शरत चंद्र चट्टोपाध्याय का जन्म 15 सितंबर 1876 को हुगली जिले के देबानंदपुर में हुआ था।
पिता की अस्थिर नौकरी के कारण बचपन गरीबी में बीता; प्रारंभिक जीवन भागलपुर में मामा के घर गुजरा।
'देवदास' , 'परिणीता' , 'चरित्रहीन' और 'श्रीकांत' उनके सर्वाधिक चर्चित उपन्यास रहे।
'देवदास' पर आधारित हिंदी फिल्म तीन बार बनाई गई; 1974 में 'चरित्रहीन' पर भी फिल्म आई।
मात्र 62 वर्ष की आयु में निधन, लेकिन उनकी रचनाएँ अनेक भारतीय भाषाओं में अनूदित होकर आज भी पढ़ी जाती हैं।
रवींद्रनाथ ठाकुर और बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय उनकी साहित्यिक प्रेरणा थे।

शरत चंद्र चट्टोपाध्याय — बांग्ला साहित्य के वह अमर कथाकार, जिनकी रचनाएँ एक बार पढ़नी शुरू की जाएँ तो पूरी होने से पहले रुकती नहीं। 15 सितंबर 1876 को जन्मे इस साहित्यकार की जयंती पर देशभर में उनकी विरासत को याद किया जा रहा है। उनके शब्दों ने भाषा की दीवारें तोड़ीं और पूरे भारत में करोड़ों पाठकों के दिलों में स्थायी जगह बनाई।

संघर्षों से भरा बचपन

हुगली जिले के देबानंदपुर में मोतीलाल चट्टोपाध्याय और भुवन मोहिनी के घर जन्मे शरत चंद्र का बचपन किसी परीकथा जैसा नहीं था। पिता की अस्थिर नौकरी ने परिवार को गरीबी की कगार पर ला खड़ा किया। घर की दयनीय आर्थिक स्थिति के कारण बचपन का बड़ा हिस्सा भागलपुर में मामा के घर बीता।

यह वही भटकन और अभाव था जिसने उन्हें भीतर से समृद्ध किया। जहाँ परिवार के पास धन नहीं था, वहाँ शरत के पास शब्दों का अथाह भंडार पनपता जा रहा था। गौरतलब है कि जीवन के इसी संघर्ष ने उनकी रचनाओं को वह गहराई दी, जो पाठक को भीतर तक छू जाती है।

साहित्यिक प्रेरणा और लेखन शैली

शरत चंद्र रवींद्रनाथ ठाकुर और बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की लेखनी से गहरे प्रभावित थे। उनकी अपनी शैली में ग्रामीण जीवन की कच्ची खुशबू थी — नदियों के किनारे बसे परिवार, खेतों की मेड़ पर पलते सपने और उन सपनों में उलझी स्त्रियाँ। उनके पात्रों में महिलाएँ विशेष रूप से सशक्त और जीवंत हैं, जो उस दौर के साहित्य में दुर्लभ था।

वे अपनी बेपरवाह जीवनशैली के लिए भी जाने जाते थे। इस स्वभाव की झलक उनके आत्मकथात्मक उपन्यास 'श्रीकांत' में स्पष्ट मिलती है, जहाँ नायक की यायावरी और स्वतंत्रचेता व्यक्तित्व दरअसल लेखक की अपनी परछाईं है।

अमर रचनाएँ और सामाजिक दर्पण

'देवदास', 'परिणीता', 'चरित्रहीन' और 'श्रीकांत' — ये उपन्यास केवल साहित्यिक कृतियाँ नहीं हैं, बल्कि समाज के उन कोनों में झाँकने वाले आईने हैं जिन्हें लोग अक्सर नज़रअंदाज़ करते हैं। शरत चंद्र ने उन मुद्दों पर कलम चलाई जिन पर उस दौर में बात करना वर्जित माना जाता था — विधवाओं की पीड़ा, प्रेम की निःस्वार्थता, और समाज के दोहरे मानदंड।

यह ऐसे समय में आया जब भारतीय साहित्य मुख्यतः मिथक और इतिहास से प्रेरणा लेता था। शरत ने समकालीन यथार्थ को केंद्र में रखा और इसीलिए उनके पात्र आज भी उतने ही प्रासंगिक लगते हैं।

फिल्मों और अनुवादों में अमरता

शरत चंद्र की रचनाओं का जादू कागज़ की सीमाओं से बाहर निकलकर रुपहले परदे तक पहुँचा। 'देवदास' पर आधारित हिंदी फिल्म तीन बार बनाई गई। 1974 में उपन्यास 'चरित्रहीन' पर इसी नाम से फिल्म निर्मित हुई। कई भारतीय भाषाओं में उनके उपन्यासों के अनुवाद हुए और उन पर सफल नाटक भी खेले गए।

यह विस्तार इस बात का प्रमाण है कि उनकी कहानियाँ किसी एक भाषा या प्रांत की नहीं थीं — वे समूचे भारत की थीं।

विरासत जो आज भी ज़िंदा है

मात्र 62 वर्ष की आयु में शरत चंद्र ने इस दुनिया को अलविदा कहा, लेकिन उनकी लेखनी आज भी लाखों पाठकों के मन में साँस लेती है। 'आवारा मसीहा' कहलाए जाने वाले इस साहित्यकार की रचनाएँ हिंदी, बांग्ला और अन्य भारतीय भाषाओं में आज भी पढ़ी जाती हैं। उनकी जयंती हर वर्ष भारतीय साहित्यप्रेमियों को यह याद दिलाती है कि सच्चा लेखन समय की दीवारें नहीं मानता।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि यह प्रमाण है कि उनके विषय आज भी अनसुलझे हैं। जब भारतीय साहित्य की वैश्विक पहचान की बात होती है तो शरत का नाम अक्सर रवींद्रनाथ की छाया में दब जाता है — यह मुख्यधारा की चूक है जिसे जयंती जैसे अवसर पर सुधारा जाना चाहिए।
RashtraPress
14 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शरत चंद्र चट्टोपाध्याय का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
शरत चंद्र चट्टोपाध्याय का जन्म 15 सितंबर 1876 को पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के देबानंदपुर में हुआ था। उनके पिता का नाम मोतीलाल चट्टोपाध्याय और माता का नाम भुवन मोहिनी था।
शरत चंद्र चट्टोपाध्याय को 'आवारा मसीहा' क्यों कहा जाता है?
'आवारा मसीहा' उनकी बेपरवाह और स्वतंत्रचेता जीवनशैली का प्रतीक है। उनका यायावर स्वभाव उनके आत्मकथात्मक उपन्यास 'श्रीकांत' में भी झलकता है, जिसमें नायक की भटकन दरअसल लेखक की अपनी जीवन-यात्रा का अक्स है।
शरत चंद्र के सबसे प्रसिद्ध उपन्यास कौन से हैं?
उनके सर्वाधिक चर्चित उपन्यासों में 'देवदास', 'परिणीता', 'चरित्रहीन' और 'श्रीकांत' शामिल हैं। ये रचनाएँ समाज की वास्तविकताओं का दर्पण हैं और आज भी कई भारतीय भाषाओं में पढ़ी जाती हैं।
शरत चंद्र की रचनाओं पर कौन-कौन सी फिल्में बनी हैं?
'देवदास' उपन्यास पर हिंदी फिल्म तीन बार बनाई गई है। 1974 में उपन्यास 'चरित्रहीन' पर इसी नाम से फिल्म बनी। इसके अलावा कई भारतीय भाषाओं में उनकी रचनाओं पर फिल्में और नाटक बनाए गए हैं।
शरत चंद्र चट्टोपाध्याय का निधन कब हुआ और उनकी साहित्यिक विरासत क्या है?
शरत चंद्र का निधन 62 वर्ष की आयु में हुआ। उनकी रचनाएँ हिंदी, बांग्ला सहित अनेक भारतीय भाषाओं में अनूदित हैं और आज भी लाखों पाठकों द्वारा पढ़ी जाती हैं। वे भारतीय साहित्य में सबसे अधिक अनूदित लेखकों में गिने जाते हैं।
राष्ट्र प्रेस
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