मन की बात 137: PM मोदी ने सराहा नागालैंड की वेसालु का फूल-उद्यम और ओडिशा की मैथिली का वन-संरक्षण
सारांश
मुख्य बातें
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 30 अगस्त 2026 को मन की बात के 137वें एपिसोड में नागालैंड की वेसालु पुरो और ओडिशा की मैथिली भुए की प्रेरक कहानियाँ देशवासियों के साथ साझा कीं। वेसालु ने एक साधारण शौक को व्यावसायिक फूलों की खेती में बदल दिया, जबकि मैथिली ने इको-टूरिज्म से जुड़कर जंगल-संरक्षण को अपनी आजीविका का आधार बना लिया। दोनों महिलाओं की यात्रा ग्रामीण भारत में महिला सशक्तिकरण और पर्यावरण-चेतना का जीवंत उदाहरण है।
वेसालु पुरो: शौक से उद्यम तक
नागालैंड के फेक जिले की वेसालु पुरो एक किसान परिवार में पली-बढ़ीं। बचपन से माता-पिता को खेती करते देखा और फूलों के प्रति गहरा लगाव रहा। साल 2021 में उन्होंने यही शौक लेकर छोटे पैमाने पर फूल उगाने की शुरुआत की।
धीरे-धीरे उन्हें बाज़ार की संभावना दिखी — शादी-विवाह और त्योहारों में फूलों की माँग कभी कम नहीं होती। स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र से वैज्ञानिक खेती की ट्रेनिंग लेने के बाद उन्होंने केवल एक चौथाई एकड़ ज़मीन पर ग्लेडियोलस के हज़ारों पौधे लगाए। पहले ही प्रयास में 5,000 से अधिक फूल खिल उठे।
प्रधानमंत्री मोदी ने इस सफर को रेखांकित करते हुए कहा, 'वेसालु पुरो की यात्रा हमें बताती है कि शौक जब मेहनत और सही मार्गदर्शन से जुड़ जाता है, तो वह नई संभावनाओं का रास्ता खोल सकता है।' आज वेसालु के फूल नागालैंड से निकलकर दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों तक पहुँच रहे हैं।
मैथिली भुए: जंगल की रक्षक, आजीविका की नई राह
ओडिशा के देबरीगढ़ क्षेत्र के गाँव 'धोड़रोकुसुम' की मैथिली भुए कुछ साल पहले तक प्रतिदिन जंगल जाती थीं — जलावन की लकड़ी, महुआ, केंदु पत्ता और बाँस की कोपलें लाने के लिए। उनके परिवार की कई ज़रूरतें इसी जंगल पर टिकी थीं।
स्थिति तब बदली जब मैथिली देबरीगढ़ इको-टूरिज्म से जुड़ीं। जंगल से उनका रिश्ता अब केवल उपभोग का नहीं, संरक्षण का भी बन गया। प्रधानमंत्री ने बताया कि मैथिली की प्रेरणा से आज 60 से अधिक महिलाएँ वन-संरक्षण में सक्रिय हैं — कोई वन्यजीवों की सुरक्षा में, कोई घास के मैदानों के विकास में, तो कुछ इको-टूरिज्म गतिविधियों में।
स्वच्छता और पहचान पर PM का संदेश
इस एपिसोड में प्रधानमंत्री ने स्वच्छता को सामुदायिक पहचान से जोड़ते हुए कहा, 'हमारे गाँव हों या शहर, हमारी नदियाँ हों या तीर्थस्थल — इनकी पहचान हमारे व्यवहार से भी बनती है। और जब स्वच्छता इस व्यवहार में शामिल हो जाती है, उस स्थान की शोभा और बढ़ जाती है।'
गौरतलब है कि मन की बात कार्यक्रम नियमित रूप से देश के उन साधारण नागरिकों को मंच देता है जो असाधारण काम कर रहे हैं — यह एपिसोड भी उसी परंपरा को आगे बढ़ाता है।
आम जनता पर असर और आगे की राह
वेसालु और मैथिली की कहानियाँ ग्रामीण महिलाओं के लिए दोहरा संदेश लेकर आती हैं: स्थानीय संसाधनों का उपयोग और सरकारी प्रशिक्षण कार्यक्रमों से जुड़ाव मिलकर स्थायी आजीविका बना सकते हैं। यह ऐसे समय में आया है जब केंद्र सरकार ग्रामीण महिला उद्यमिता और वन-आधारित आजीविका योजनाओं को प्राथमिकता दे रही है। आने वाले समय में इस तरह की सफलता की कहानियाँ नीति-निर्माताओं के लिए ज़मीनी साक्ष्य का काम कर सकती हैं।