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नैनीताल की ग्रामीण महिलाएं स्वयं सहायता समूहों से बनीं आत्मनिर्भर, 30-35 को मिला रोज़गार

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नैनीताल की ग्रामीण महिलाएं स्वयं सहायता समूहों से बनीं आत्मनिर्भर, 30-35 को मिला रोज़गार

सारांश

नैनीताल की ग्रामीण महिलाएं स्वयं सहायता समूहों के ज़रिए घर से निकलकर बाज़ार तक पहुँची हैं। निर्मला जोशी, दीपिका मेहरा और पूजा बिष्ट जैसी महिलाएं पहाड़ी उत्पाद विदेश भेज रही हैं, बिना ब्याज ऋण ले रही हैं और 30-35 अन्य महिलाओं को रोज़गार दे रही हैं — पलायन से जूझते पहाड़ की एक उम्मीद की कहानी।

मुख्य बातें

नैनीताल जिले की ग्रामीण महिलाएं स्वयं सहायता समूहों के ज़रिए स्थानीय उत्पाद बनाकर देश-विदेश तक बेच रही हैं।
निर्मला जोशी ( ताकुला ग्राम सभा ) 2017 से भीमताल ब्लॉक के समूहों से जुड़ी हैं; उनके नेटवर्क में 18-19 समूह और करीब 30-35 महिलाएं रोज़गार पा रही हैं।
दीपिका मेहरा ( निगलाट गांव ) पिथौरागढ़, मुनस्यारी, रामनगर, कोटाबाग की महिलाओं के साथ जुड़कर बहु-जिला नेटवर्क चला रही हैं।
समूह की सदस्यता के ज़रिए महिलाओं को बिना ब्याज बैंक ऋण मिल रहा है, जिससे अचार, जूस जैसे व्यवसाय शुरू हो रहे हैं।
पूजा बिष्ट ( घुगु सिगड़ी गांव ) को समूह के माध्यम से कैंटीन-किचन का काम मिला; उनके समूह से 7-8 महिलाओं को रोज़गार मिला है।

नैनीताल जिले की ग्रामीण महिलाएं स्वयं सहायता समूहों और सरकारी स्वरोज़गार योजनाओं से जुड़कर आर्थिक आत्मनिर्भरता की राह पर तेज़ी से आगे बढ़ रही हैं। कभी घर की चारदीवारी तक सिमटी रहने वाली ये महिलाएं आज स्थानीय उत्पाद तैयार कर रही हैं, छोटे कारोबार चला रही हैं और दूसरी महिलाओं को रोज़गार से जोड़ने में भी अहम भूमिका निभा रही हैं। नमक, शहद, मसाले, अचार, राजमा, पहाड़ी उत्पाद, मिलेट्स और स्थानीय जड़ी-बूटियों पर आधारित यह उद्यमिता न केवल व्यक्तिगत आमदनी बढ़ा रही है, बल्कि पूरे परिवार की आर्थिक स्थिति को भी मज़बूत कर रही है।

महिलाओं के अनुभव और बदलाव की कहानी

ताकुला ग्राम सभा की निर्मला जोशी वर्ष 2017 से भीमताल ब्लॉक के स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी हैं। उन्होंने बताया कि शुरुआत में बाज़ार जाने, बैंक का काम निपटाने और अधिकारियों के समक्ष अपनी बात रखने में भी झिझक महसूस होती थी। समूह से जुड़ने के बाद उनका आत्मविश्वास बढ़ा और वह अपने काम को बेहतर तरीके से संचालित करने लगीं। निर्मला ने कहा कि आज वह परिवार का पालन-पोषण करने के साथ-साथ बच्चों की शिक्षा पर भी ध्यान दे पा रही हैं।

निर्मला के साथ 18 से 19 स्वयं सहायता समूह जुड़े हुए हैं, जिनमें घाट, भीमताल और हल्द्वानी ब्लॉक सहित विभिन्न क्षेत्रों की महिलाएं उत्पाद भेजती हैं। इस नेटवर्क के ज़रिए लगभग 30 से 35 महिलाओं को रोज़गार से जुड़ने का अवसर मिला है। इन उत्पादों को देश के विभिन्न हिस्सों के साथ-साथ विदेशों तक भेजने का अवसर भी मिल रहा है।

बहु-जिला नेटवर्क और उत्पादों की विविधता

निगलाट गांव की दीपिका मेहरा ने बताया कि उनका काम केवल एक जिले तक सीमित नहीं है — वह पिथौरागढ़, मुनस्यारी, रामनगर, कोटाबाग और अन्य क्षेत्रों की महिलाओं के साथ भी जुड़ी हुई हैं। विभिन्न समूहों की महिलाएं नमक, राजमा, अचार और राखियाँ जैसे उत्पाद तैयार करती हैं, जिससे आमदनी के कई स्रोत एक साथ खुलते हैं।

दीपिका ने यह भी बताया कि समूह की सदस्यता के कारण उन्हें बैंक से बिना ब्याज के ऋण की सुविधा मिलती है, जिससे अचार और जूस जैसे व्यवसाय शुरू करना संभव हुआ। उन्होंने कहा कि व्यक्तिगत स्तर पर बैंक ऋण प्राप्त करना कठिन हो सकता है, लेकिन समूह की सामूहिक साख इस बाधा को दूर करती है।

कैंटीन और किचन से मिली आजीविका

घुगु सिगड़ी गांव की पूजा बिष्ट के लिए स्वयं सहायता समूह एक नई दिशा लेकर आया। समूह के माध्यम से उन्हें कैंटीन और किचन का काम मिला, जिससे उनके परिवार की आजीविका सुचारु रूप से चल रही है। उनके समूह से सात से आठ महिलाएं जुड़ी हुई हैं, जिन्हें इसी काम के ज़रिए रोज़गार मिला है।

पूजा ने बताया कि समूह से जुड़ने से पहले उनके लिए आगे बढ़ने के अवसर बेहद सीमित थे। कैंटीन का काम मिलने के बाद रोज़गार के साथ-साथ अनुभव और कौशल बढ़ाने का मौका भी मिला। यह ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब पहाड़ी क्षेत्रों से पुरुषों का पलायन ग्रामीण अर्थव्यवस्था को कमज़ोर कर रहा है।

स्वरोज़गार की व्यापक तस्वीर

गौरतलब है कि उत्तराखंड सरकार की स्वरोज़गार योजनाओं ने पहाड़ी ज़िलों में महिलाओं के आर्थिक समावेश को एक नई गति दी है। पहाड़ी उत्पादों की घरेलू और अंतरराष्ट्रीय माँग बढ़ने के साथ-साथ ये समूह स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मज़बूती दे रहे हैं। तीनों महिलाओं ने सरकार से इस सहयोग को जारी रखने और और अधिक महिलाओं को इन योजनाओं से जोड़ने की उम्मीद जताई है।

संपादकीय दृष्टिकोण

तो स्वयं सहायता समूह महिलाओं को वह ढाँचा देते हैं जो सरकारी योजनाएं अकेले नहीं दे सकतीं — सामूहिक साख, कौशल प्रशिक्षण और बाज़ार तक पहुँच। हालाँकि, यह भी ज़रूरी है कि इन समूहों की आमदनी के आँकड़े, बाज़ार की पहुँच और ऋण चुकौती दर को पारदर्शी रूप से सामने रखा जाए, ताकि नीति-निर्माता केवल सफलता की कहानियों पर नहीं, बल्कि ज़मीनी डेटा पर योजनाएं बना सकें।
RashtraPress
14 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

नैनीताल में स्वयं सहायता समूह महिलाओं की मदद कैसे कर रहे हैं?
नैनीताल जिले में स्वयं सहायता समूह ग्रामीण महिलाओं को नमक, शहद, अचार, राजमा और पहाड़ी उत्पाद जैसे स्थानीय व्यवसाय शुरू करने, बिना ब्याज बैंक ऋण पाने और बाज़ार तक पहुँचने में मदद कर रहे हैं। इन समूहों से करीब 30-35 महिलाओं को प्रत्यक्ष रोज़गार मिला है।
नैनीताल में स्वयं सहायता समूहों से कितनी महिलाएं जुड़ी हैं?
ताकुला की निर्मला जोशी के नेटवर्क में अकेले 18-19 स्वयं सहायता समूह हैं, जिनमें घाट, भीमताल और हल्द्वानी ब्लॉक की महिलाएं शामिल हैं। इस नेटवर्क के माध्यम से लगभग 30 से 35 महिलाओं को रोज़गार मिला है।
क्या इन समूहों के उत्पाद विदेश तक जाते हैं?
हाँ, निर्मला जोशी ने बताया कि उनके समूह के उत्पादों को देश के विभिन्न हिस्सों के साथ-साथ विदेशों तक भेजने का अवसर भी मिल रहा है। इनमें नमक, शहद, मसाले, पहाड़ी नून, स्थानीय जड़ी-बूटियाँ और मोटे अनाज से बने उत्पाद शामिल हैं।
स्वयं सहायता समूह की सदस्यता से बैंक ऋण मिलना कैसे आसान होता है?
दीपिका मेहरा के अनुसार, व्यक्तिगत स्तर पर बैंक ऋण लेना कठिन हो सकता है, लेकिन स्वयं सहायता समूह की सामूहिक साख के कारण सदस्यों को बिना ब्याज के ऋण की सुविधा मिलती है। इससे अचार, जूस जैसे छोटे व्यवसाय शुरू करना संभव हो पाया है।
पूजा बिष्ट को स्वयं सहायता समूह से क्या मिला?
घुगु सिगड़ी गांव की पूजा बिष्ट को स्वयं सहायता समूह के माध्यम से कैंटीन और किचन का काम मिला, जिससे उनके परिवार की आजीविका चल रही है। उनके समूह से जुड़ी 7-8 महिलाओं को भी इसी काम के ज़रिए रोज़गार मिला है।
राष्ट्र प्रेस
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